गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥7॥
नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥
मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥
मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥8॥16॥
मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥
मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥1॥
दुनीआ कैसि मुकामे ॥
करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥1॥ रहाउ ॥
जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥
पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥2॥
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥
दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥3॥
सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥
घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥4॥
सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥
नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥5॥
अलाहु अलखु अगंमु कादरु करणहारु करीमु ॥
सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥6॥
मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥
असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥7॥
दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥
मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥8॥17॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥
आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥
हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥1॥
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥
जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥2॥
देखि कुटंबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये सारा जगत काजल की कोठरी (के समान) है (जो भी इसके मोह में फंसता है, उसका) तन मन शरीर राख में मिल जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।