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अंग 62

अंग
62
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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सरबे थाई एकु तूं जिउ भावै तिउ राखु ॥
गुरमति साचा मनि वसै नामु भलो पति साखु ॥
हउमै रोगु गवाईऐ सबदि सचै सचु भाखु ॥8॥
आकासी पातालि तूं त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥
आपे भगती भाउ तूं आपे मिलहि मिलाइ ॥
नानक नामु न वीसरै जिउ भावै तिवै रजाइ ॥9॥13॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (जीवों के भी क्या वश? हे प्रभू !) सब जीवों में तो आप स्वयं ही बसता है। जैसी आपकी मर्जी हो, हे प्रभू ! आप स्वयं ही (जीवों को आसा तृष्णा के जाल से) बचा। हे प्रभू ! आपका सदा स्थिर नाम ही (जीव का) भला साथी है, आपका नाम ही जीव की इज्जत है, आपका नाम, गुरू की मति ले के ही, जीव के मन में बस सकता है। (हे भाई !) गुरू के सच्चे शबद के द्वारा सदा स्थिर नाम सिमर। नाम सिमरने से ही अहंकार का रोग दूर होता है।8। हे प्रभू ! आकाश में पाताल में तीनों ही भवनों में आप स्वयं ही व्यापक है। आप खुद ही (जीवों को अपनी) भक्ति बख्शता है, अपना प्रेम बख्शता है। आप खुद ही जीवों को अपने साथ मिला के मिलाता है। हे नानक ! (प्रभू के दर पे अरदास कर) और कह, (हे प्रभू !) जैसे आपको ठीक लगे, वैसे आपकी रजा वर्तती है। (पर मेहर कर) मुझे आपका नाम कभी ना भूले।9।13।
सिरीरागु महला 1 ॥
राम नामि मनु बेधिआ अवरु कि करी वीचारु ॥
सबद सुरति सुखु ऊपजै प्रभ रातउ सुख सारु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं मै हरि नामु अधारु ॥1॥
मन रे साची खसम रजाइ ॥
जिनि तनु मनु साजि सीगारिआ तिसु सेती लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
तनु बैसंतरि होमीऐ इक रती तोलि कटाइ ॥
तनु मनु समधा जे करी अनदिनु अगनि जलाइ ॥
हरि नामै तुलि न पुजई जे लख कोटी करम कमाइ ॥2॥
अरध सरीरु कटाईऐ सिरि करवतु धराइ ॥
तनु हैमंचलि गालीऐ भी मन ते रोगु न जाइ ॥
हरि नामै तुलि न पुजई सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥3॥
कंचन के कोट दतु करी बहु हैवर गैवर दानु ॥
भूमि दानु गऊआ घणी भी अंतरि गरबु गुमानु ॥
राम नामि मनु बेधिआ गुरि दीआ सचु दानु ॥4॥
मनहठ बुधी केतीआ केते बेद बीचार ॥
केते बंधन जीअ के गुरमुखि मोख दुआर ॥
सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥5॥
सभु को ऊचा आखीऐ नीचु न दीसै कोइ ॥
इकनै भांडे साजिऐ इकु चानणु तिहु लोइ ॥
करमि मिलै सचु पाईऐ धुरि बखस न मेटै कोइ ॥6॥
साधु मिलै साधू जनै संतोखु वसै गुर भाइ ॥
अकथ कथा वीचारीऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
पी अंम्रितु संतोखिआ दरगहि पैधा जाइ ॥7॥
घटि घटि वाजै किंगुरी अनदिनु सबदि सुभाइ ॥
विरले कउ सोझी पई गुरमुखि मनु समझाइ ॥
नानक नामु न वीसरै छूटै सबदु कमाइ ॥8॥14॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम में परोया जाए, (उसके संबंध में) मैं और क्या विचार करूँ (मैं और क्या बताऊँ? इस में कोई शक नहीं कि) जो मनुष्य प्रभू के (नाम में) रंगा जाता है, उसको श्रेष्ठ (आत्मिक) सुख मिलता है। जिसकी सुरति शबद के (विचार में) जुड़ी हुई है, उसके अंदर आनंद पैदा होता है। (हे प्रभू !) जैसी भी आपकी रजा हो, मुझे भी आप (अपने चरणों में) रख। आपका नाम (मेरे जीवन का) आसरा बन जाए।1। हे मेरे मन ! खसम प्रभू की रजा में चलना सही कार है। (हे मन !) आप उस प्रभू (के चरणों) से लिव जोड़, जिसने ये शरीर और मन पैदा करके इन्हें सुंदर बनाया है।1।रहाउ। अगर अपने शरीर को काट काट के एक एक रक्ती भर तोल तोल के आग में हवन कर दिया जाय। अगर मैं अपने शरीर व मन को हवन सामग्री बनां दूं और हर रोज इन्हें आग में जलाऊँ। यदि इस प्रकार के अन्य लाखों करोड़ों कर्म किए जाएं, तो भी कोई कर्म परमात्मा के नाम की बराबरी तक नहीं पहुँच सकता।2। यदि सिर के ऊपर आरा रखा के शरीर को दो फाड़ चिरवा लिया जाय, यदि शरीर को हिमालय पर्वत (की बरफ) में गला दिया जाए, तो भी मन में से (अहम् आदिक) रोग दूर नहीं होते। (कर्मकाण्डों की) सारी (ही मर्यादा) मैंने अच्छी तरह परख के देख ली है। कोई करम प्रभु सिमरन की बराबरी तक नहीं पहुँचता।3। यदि मैं सोने के किले दान करूँ, बहुत सारे बढ़िया घोड़े व हाथी दान करूँ, जमीन दान करूँ, बहुत सारी गाऐं दान करूँ, फिर भी (बल्कि इस दान का ही) मन में अहंकार गुमान बन जाता है। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने सदा स्थिर प्रभू (का नाम जपने की) बख्शिश की है, उसका मन परमात्मा के नाम में परोया रहता है (और यही है सही करनी)।4। अनेकों ही लोगों की अक्ल (तप आदि कर्मों की ओर प्रेरती है जो) मन के हठ से (किये जाते हैं), अनेकों ही लोग वेद आदि धर्म-पुस्तकों के अर्थ-विचार करते हैं (और इस वाद-विवाद को ही जीवन का सही राह समझते हैं), ऐसे और भी अनेकों ही कर्म हैं जो जीवात्मा के वास्ते फांसी का रूप बन जाते हैं, (पर अहंकार आदि बंधनों से) निजात का दरवाजा गुरू के सन्मुख होने से ही मिलता है (क्योंकि, गुरू प्रभू का सिमरन की हिदायत करता है) हरेक कर्म सदा स्थिर प्रभू के नाम सिमरन से नीचे है, घटिआ है। सिमरन रूपी कर्म सब कर्मों धर्मों से श्रेष्ठ है।5। (पर कर्म काण्ड के जाल में फंसे उच्च जाति के लोगों को भी निंदना ठीक नहीं है), हरेक जीव को ठीक ही कहना चाहिए। (जगत में) कोई नीच नहीं दिखाई नहीं देता, क्योंकि, एक करतार ने ही सारे जीव रचे हैं और तीनों लोकों (के जीवों) में उसे (करतार की ज्योति) का ही प्रकाश है। सिमरन (का खैर) प्रभू की गुरू की मेहर से ही मिलता है और धुर से ही प्रभू की हुकम अनुसार जिस मनुष्य को सिमरन की दात मिलती है, कोई पक्ष उस (दात) के राह में रोक नहीं डाल सकता।6। जो गुरमुख मनुष्य गुरमुखों की संगति में मिल बैठता है, गुरू आशै के अनुसार चलने से (उसके मन में) संतोष आ बसता है। (क्योंकि) यदि मनुष्य सतिगुरू के उपदेश में लीन रहे तो बेअंत गुणों वाले करतार की सिफत-सालाह की जा सकती है। और, सिफत सलाह रूपी अंमृत पीने से मन संतोष ग्रहण कर लेता है और (जगत में से) आदर सत्कार कमा के प्रभू की हजूरी में पहुँचता है।7। गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के स्वभाव में हरवक्त एक-मेक होने से यह यकीन बन जाता है कि (रॅबी रौंअ की) वीणा हरेक शरीर में बज रही है। पर ये समझ किसी विरले को ही पड़ती है, जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने मन को ऐसे समझा लेता है हे नानक ! उसको परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता। वह गुरू के उपदेश को कमा के (गुरू के शबद मुताबिक जीवन बना के, अहम् आदि रोगों से) बचा रहता है।8।14।
सिरीरागु महला 1 ॥
चिते दिसहि धउलहर बगे बंक दुआर ॥
करि मन खुसी उसारिआ दूजै हेति पिआरि ॥
अंदरु खाली प्रेम बिनु ढहि ढेरी तनु छारु ॥1॥
भाई रे तनु धनु साथि न होइ ॥
राम नामु धनु निरमलो गुरु दाति करे प्रभु सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु धनु निरमलो जे देवै देवणहारु ॥
आगै पूछ न होवई जिसु बेली गुरु करतारु ॥
आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ जैसे बड़े चाव से बनाए हुए चित्रित किए हुए महल-माढियां (सुंदर) दिखाई देते हैं, उनके सफेद बांके दरवाजे होते हैं। (पर यदि वे अंदर से खाली रहें तो गिर के ढेरी हो जाते हैं, वैसे ही माया के मोह में प्यार में (ये शरीर) पालते हैं, पर यदि हृदय नाम से वंचित है, प्रेम के बगैर है, तो ये शरीर भी गिर के ढेरी हो जाता है (व्यर्थ जाता है।)।1। हे भाई ! यह शरीर यह धन (जगत से चलने के वक्त) साथ नहीं निभता। परमात्मा का नाम ऐसा पवित्र धन है (जो सदा साथ निभता है, पर ये मिलता उसको ही है) जिसे गुरू देता है जिसको वह परमात्मा दात करता है।1।रहाउ। परमात्मा का नाम पवित्र धन है (तब ही मिलता है) अगर देने के स्मर्थ हरि खुद दे। (नाम धन हासिल करने में) जिस मनुष्य का सहयोगी गुरू खुद बने, करतार खुद बने, परलोक में उस पर कोई एतराज नहीं होता। पर माया के मोह से प्रभू स्वयं ही बचाए तो बच सकते हैं। प्रभू खुद ही बख्शिश करने वाला है।2।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जीवों के भी क्या वश? हे प्रभू !) सब जीवों में तो आप स्वयं ही बसता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।