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अंग ६२८ · सोरठ

अंग
628
सोरठ
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  1. संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥
  2. ऐथै ओथै रखवाला ॥
  3. सतिगुर पूरे भाणा ॥
  4. गरीबी गदा हमारी ॥
  5. गुरि पूरै पूरी कीनी ॥
  6. सोरठि महला 5 ॥

संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥

अंग ६२७ से चला आ रहा अंश

संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥
पारब्रहमु पूरन परमेसरु रवि रहिआ सभनी जाई ॥ रहाउ ॥
धुर की बाणी आई ॥
तिनि सगली चिंत मिटाई ॥
दइआल पुरख मिहरवाना ॥
हरि नानक साचु वखाना ॥2॥13॥77॥

हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! (उस मनुष्य को) सब जगहों में सुख ही प्रतीत होता है। (जिस मनुष्य को ये यकीन हो जाता है कि) पारब्रहम पूरन परमेश्वर हर जगह पर मौजूद हैरहाउ। हे संत जनो ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी जिस मनुष्य के अंदर आ बसी। उसने अपनी सारी चिंता दूर कर ली। हे नानक ! दया का श्रोत प्रभू उस मनुष्य पर मेहरवान हुआ रहता है। वह मनुष्य उस सदा कायम रहने वाले प्रभू का नाम (हमेशा) उचारता है। 2। 13। 77।

ऐथै ओथै रखवाला ॥

सोरठि महला 5 ॥
ऐथै ओथै रखवाला ॥
प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥
दास अपने आपि राखे ॥
घटि घटि सबदु सुभाखे ॥1॥
गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥
दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥
आपि सहाई होआ ॥
सचे दा सचा ढोआ ॥
तेरी भगति वडिआई ॥
पाई नानक प्रभ सरणाई ॥2॥14॥78॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई !(शरण आए की) इस लोक और परलोक में रक्षा करने वाला है। गुरू प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। (हे भाई ! प्रभू) अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है (सेवकों को ये भरोसा रहता है कि) प्रभू हरेक शरीर में (स्वयं ही) बचन बिलास कर रहा है। 1। हे भाई ! मैं (अपने) गुरू के चरणों से सदके जाता हूँ। (गुरू की कृपा से ही) मैं (अपने) हरेक सांस के साथ दिन रात (उस परमात्मा को) याद करता रहता हूँ जो सब जगहों में भरपूर है।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) परमात्मा स्वयं मददगार बनता है (गुरू की मेहर से) सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली सिफत सालाह की दाति मिलती है। तब ही आपकी भक्ति आपकी सिफत सालाह प्राप्त होती है हे नानक ! (कह) जब हे प्रभू ! (गुरू की कृपा से) आपकी शरण में आते है2। 14। 78।

सतिगुर पूरे भाणा ॥

सोरठि महला 5 ॥
सतिगुर पूरे भाणा ॥
ता जपिआ नामु रमाणा ॥
गोबिंद किरपा धारी ॥
प्रभि राखी पैज हमारी ॥1॥
हरि के चरन सदा सुखदाई ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि बिरथी आस न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
क्रिपा करे जिसु प्रानपति दाता सोई संतु गुण गावै ॥
प्रेम भगति ता का मनु लीणा पारब्रहम मनि भावै ॥2॥
आठ पहर हरि का जसु रवणा बिखै ठगउरी लाथी ॥
संगि मिलाइ लीआ मेरै करतै संत साध भए साथी ॥3॥
करु गहि लीने सरबसु दीने आपहि आपु मिलाइआ ॥
कहु नानक सरब थोक पूरन पूरा सतिगुरु पाइआ ॥4॥15॥79॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई !) जब गुरू को अच्छा लगता है (जब गुरू प्रसन्न होता है) तब ही परमात्मा का नाम जपा जा सकता है। परमात्मा ने मेहर की (गुरू मिलाया ! गुरू की कृपा से हमने नाम जपा। तो) परमात्मा ने हमारी लाज रख ली (विष ठॅग बूटी से बचा लिया)। 1। हे भाई ! परमात्मा के चरण सदा सुख देने वाले हैं। (जो मनुष्य हरी के चरणों का आसरा लेते हैं।वह) जो कुछ (परमात्मा से) मांगते हैं वही फल प्राप्त कर लेते हैं।(परमात्मा की सहायत पर रखी हुई कोई भी) आस ख़ाली नहीं जाती। 1।रहाउ। (पर। हे भाई ! जीवन का मालिक दातार प्रभू जिस मनुष्य पर मेहर करता है वह संत (स्वभाव बन जाता है।और) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। उस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में मस्त हो जाता है।वह मनुष्य परमात्मा को (भी) प्यारा लगने लगता है। 2। हे भाई ! आठों पहर (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह करने से विकारों की ठॅगबूटी का असर खत्म हो जाता है (जिस मनुष्य ने सिफत सालाह में मन जोड़ा) ईश्वर ने (उसको) अपने साथ मिला लिया। संत जन उसके संगी-साथी बन गए। 3। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जिस भी मनुष्य ने प्रभू-चरणों की आराधना की) प्रभू ने उसका हाथ पकड़ के उसको सब कुछ बख्श दिया।प्रभू ने उसको अपना आप ही मिला दिया। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया।उसके सारे काम सफल हो गए। 4। 15। 79।

गरीबी गदा हमारी ॥

सोरठि महला 5 ॥
गरीबी गदा हमारी ॥
खंना सगल रेनु छारी ॥
इसु आगै को न टिकै वेकारी ॥
गुर पूरे एह गल सारी ॥1॥
हरि हरि नामु संतन की ओटा ॥
जो सिमरै तिस की गति होवै उधरहि सगले कोटा ॥1॥ रहाउ ॥
संत संगि जसु गाइआ ॥
इहु पूरन हरि धनु पाइआ ॥
कहु नानक आपु मिटाइआ ॥
सभु पारब्रहमु नदरी आइआ ॥2॥16॥80॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! विनम्रता भरा स्वभाव हमारी गदा है। सबकी चरण-धूड़ बने रहना हमारे पास खंडा हैं इ स (गदा) के आगे इस (खंडे) के आगे कोई भी कुकर्मी टिक नहीं सकता। (हमें) पूरे गुरू ने ये बात समझा दी है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम संत जनों का आसरा है। जो भी मनुष्य (परमात्मा का नाम) सिमरता है।उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है।(नाम की बरकति से) सारे करोड़ों ही जीव (विकारों से) बच जाते हैं। 1।रहाउ। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने संत जनों की संगति में (बैठ के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। उसने ये हरी-नाम धन प्राप्त कर लिया है जो कभी खत्म नहीं होता। उस मनुष्य ने (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है उसे हर जगह परमात्मा ही (बसता) दिख गया है। 2। 16। 80।

गुरि पूरै पूरी कीनी ॥

सोरठि महला 5 ॥
गुरि पूरै पूरी कीनी ॥
बखस अपुनी करि दीनी ॥
नित अनंद सुख पाइआ ॥
थाव सगले सुखी वसाइआ ॥1॥
हरि की भगति फल दाती ॥
गुरि पूरै किरपा करि दीनी विरलै किन ही जाती ॥ रहाउ ॥
गुरबाणी गावह भाई ॥
ओह सफल सदा सुखदाई ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ ॥2॥17॥81॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने पूरी कृपा की। उसको गुरू ने अपने दर से प्रभू की भक्ति की दाति दे दी। वह मनुष्य सदा आत्मिक आनंद लेने लग पड़ा। गुरू ने उसकी सारी ज्ञानेन्द्रियों को (विकारों से बचा के) शांति में टिका दिया। 1। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति सारे फल देने वाली है। पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर कर दी (उसने प्रभू की भक्ति करनी आरम्भ कर दी।पर।हे भाई !) किसी दुर्लभ मनुष्य ने ही परमात्मा की भक्ति की कद्र समझी है।रहाउ। हे भाई ! आएँ हम भी गुरू की बाणी गाया करें। गुरू की बाणी सदा ही सारे फल देने वाली सुख देने वाली है। हे नानक ! (कह) (उसी मनुष्य ने गुरबाणी के द्वारा परमात्मा का) नाम सिमरा है जिसने पूर्बले जनम में लिखा भक्ति का लेख प्राप्त किया है। 2। 17। 81।

सोरठि महला 5 ॥

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सोरठि महला 5 ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६२८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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