गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! हम जीव वही कुछ कर सकते हैं जो कुछ परमात्मा हमसे करवाता है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आपके दास आपकी ही शरण पड़े रहते हैं। 2। 7। 71।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जब परमात्मा का नाम अच्छी तरह दिल में बसा लिया जाता है। तब हम जीवों का सारा जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है। हे भाई !उसका मन परमात्मा के चरणों में लीन रहता है। जिस मनुष्य के भाग्य अच्छी तरह जाग पड़ते हैं। 1। (हे भाई ! जिस भी मनुष्य ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा का नाम सिमरन किया। आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का नाम याद किया।उसने हरेक मन-मांगी मुरादें पा लीं।रहाउ। हे दास नानक ! (कह, साध-संगति में मिल के जब किसी मनुष्य के) अनेकों पूर्बले जन्मों के संस्कारों के बीज अंकुरित हो जाते हैं (पूर्बले संस्कार जाग जाते हैं।तब उसका) मन परमात्मा के नाम में लगने लग जाता है। वह मनुष्य मन से तन से परमात्मा के दीदार में मस्त रहता है। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाता रहता है। 2। 8। 72।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने) गुरू को मिल के परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया। उसने अपने सारे काम सवार लिए। वह मनुष्य (किसी को) कोई बुरे बोल नहीं बोलता। वह सारी दुनिया को प्रभू की सिफत सालाह ही सुनाता रहता है। 1। हे संत जनो ! मालिक प्रभू का आसरा पक्का आसरा है (क्योंकि) सारे जीव उस प्रभू के हाथ में हैं।और वह प्रभू हरेक जीव के दिल की जानने वाला है।रहाउ। हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने प्रभू का पक्का आसरा लिया।प्रभू ने उसके) सारे काम सवार दिए। प्रभू ने अपना ये बिरद (प्यार करने वाला स्वभाव) हमेशा ही याद रखा हुआ है। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। हे दास नानक ! (कह, मैं उससे) सदा सदके जाता हूँ। 2। 9। 73।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा ने इस छोटे बच्चे (हरगोबिंद) को सजाया और सँवारा। (साध-संगति की अरदास सुन के) गुरूने इसको बचा लिया है। (गुरू परमात्मा की मेहर के सदका इस के) माता-पिता बेशक खुशी मनाएं। परमात्मा ही जीवन का दाता है (रक्षक है)।1। हे प्रभू ! आपके सेवक सब का भला मांगते हैं। (अपने सेवकों की मांग के मुताबिक) आप काम सवार के सेवकों की इज्जत रख लेता है।रहाउ। हे भाई !वही सबकी भलाई करने वाला है। जिस मेरे प्रभू ने सारे जगत में अपनी शक्ति टिकाई हुई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जो भी मनुष्य (उस प्रभू की) शरण आ पड़ता है। वह मन-मांगी मुरादें पा लेता है। 2। 10। 74।
सोरठि महला 5 ॥ सदा सदा हरि जापे ॥ प्रभ बालक राखे आपे ॥ सीतला ठाकि रहाई ॥ बिघन गए हरि नाई ॥1॥ मेरा प्रभु होआ सदा दइआला ॥ अरदासि सुणी भगत अपुने की सभ जीअ भइआ किरपाला ॥ रहाउ ॥ प्रभ करण कारण समराथा ॥ हरि सिमरत सभु दुखु लाथा ॥ अपणे दास की सुणी बेनंती ॥ सभ नानक सुखि सवंती ॥2॥11॥75॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही (सिर्फ) परमात्मा का नाम जपा करो। प्रभू जी खुद ही बालकों के रखवाले हैं। (बालक हरगोबिंद से प्रभू ने स्वयं ही) सीतला (चेचक) रोक ली है। परमात्मा की सिफत सालाह की बरकति से खतरे दूर हो गए हैं। 1। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा ही दयावान रहता है। सारे ही जीवों पर वह दयालु रहता है।वह अपने भक्त की आरजू (हमेशा) सुनता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू जगत का मूल है।और।सब ताकतों का मालिक है। प्रभू का नाम सिमरने से हरेक दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! प्रभू ने (हमेशा ही) अपने सेवकों की विनती सुनी है (प्रभू जी की मेहर से ही) सारी दुनिया सुखी बसती है। 2। 11। 75।
सोरठि महला 5 ॥ अपना गुरू धिआए ॥ मिलि कुसल सेती घरि आए ॥ नामै की वडिआई ॥ तिसु कीमति कहणु न जाई ॥1॥ संतहु हरि हरि हरि आराधहु ॥ हरि आराधि सभो किछु पाईऐ कारज सगले साधहु ॥ रहाउ ॥ प्रेम भगति प्रभ लागी ॥ सो पाए जिसु वडभागी ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ तिनि सरब सुखा फल पाइआ ॥2॥12॥76॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! जो मनुष्य अपने गुरू का ध्यान धरता है। वह (गुरू चरणों में) जुड़ के आत्मिक आनंद से अपने हृदय-घर में टिक जाता है (बाहर भटकने से बच जाता है)। ये नाम की ही बरकति है (कि मनुष्य अन्य आसरों की तलाश छोड़ देता है)। (पर) इस (हरी-नाम) का मूल्य नहीं आँका जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिलता)। 1। हे संत जनो ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरा करो। परमात्मा का नाम सिमर के हरेक चीज प्राप्त की जाती है।(आप भी परमात्मा का नाम सिमर के अपने) सारे काम सवारो।रहाउ। (हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू का ध्यान धरता है) प्रभू की प्यार भरी भक्ति में उसका मन लग जाता है। पर ये दाति वही मनुष्य हासिल करता है जिसके बड़े भाग्य हों। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरा है। उसने सारे सुख देने वाले (फल) प्राप्त कर लिए हैं। 2। 12। 76।
सोरठि महला 5 ॥ परमेसरि दिता बंना ॥ दुख रोग का डेरा भंना ॥ अनद करहि नर नारी ॥ हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य के आत्मिक जीवन के लिए) परमेश्वर ने (विकारों के रास्ते पर) रुकावट खड़ी कर दी। (उस मनुष्य के अंदर से) परमेश्वर ने दुखों और रोगों का डेरा ही खत्म कर दिया। सारे जीव आत्मिक आनंद पाते हैं। जिन जीवों पर प्रभू ने (ये) कृपा कर दी हैं। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! हम जीव वही कुछ कर सकते हैं जो कुछ परमात्मा हमसे करवाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।