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अंग ६२७ · सोरठ

अंग
627
सोरठ
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  1. जि करावै सो करणा ॥
  2. हरि नामु रिदै परोइआ ॥
  3. गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥
  4. पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥
  5. सदा सदा हरि जापे ॥
  6. अपना गुरू धिआए ॥
  7. परमेसरि दिता बंना ॥

जि करावै सो करणा ॥

अंग ६२६ से चला आ रहा अंश

जि करावै सो करणा ॥
नानक दास तेरी सरणा ॥2॥7॥71॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! हम जीव वही कुछ कर सकते हैं जो कुछ परमात्मा हमसे करवाता है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आपके दास आपकी ही शरण पड़े रहते हैं। 2। 7। 71।

हरि नामु रिदै परोइआ ॥

सोरठि महला 5 ॥
हरि नामु रिदै परोइआ ॥
सभु काजु हमारा होइआ ॥
प्रभ चरणी मनु लागा ॥
पूरन जा के भागा ॥1॥
मिलि साधसंगि हरि धिआइआ ॥
आठ पहर अराधिओ हरि हरि मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ रहाउ ॥
परा पूरबला अंकुरु जागिआ ॥
राम नामि मनु लागिआ ॥
मनि तनि हरि दरसि समावै ॥
नानक दास सचे गुण गावै ॥2॥8॥72॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जब परमात्मा का नाम अच्छी तरह दिल में बसा लिया जाता है। तब हम जीवों का सारा जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है। हे भाई !उसका मन परमात्मा के चरणों में लीन रहता है। जिस मनुष्य के भाग्य अच्छी तरह जाग पड़ते हैं। 1। (हे भाई ! जिस भी मनुष्य ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा का नाम सिमरन किया। आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का नाम याद किया।उसने हरेक मन-मांगी मुरादें पा लीं।रहाउ। हे दास नानक ! (कह, साध-संगति में मिल के जब किसी मनुष्य के) अनेकों पूर्बले जन्मों के संस्कारों के बीज अंकुरित हो जाते हैं (पूर्बले संस्कार जाग जाते हैं।तब उसका) मन परमात्मा के नाम में लगने लग जाता है। वह मनुष्य मन से तन से परमात्मा के दीदार में मस्त रहता है। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाता रहता है। 2। 8। 72।

गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥

सोरठि महला 5 ॥
गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥
कारज सभि सवारिआ ॥
मंदा को न अलाए ॥
सभ जै जै कारु सुणाए ॥1॥
संतहु साची सरणि सुआमी ॥
जीअ जंत सभि हाथि तिसै कै सो प्रभु अंतरजामी ॥ रहाउ ॥
करतब सभि सवारे ॥
प्रभि अपुना बिरदु समारे ॥
पतित पावन प्रभ नामा ॥
जन नानक सद कुरबाना ॥2॥9॥73॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने) गुरू को मिल के परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया। उसने अपने सारे काम सवार लिए। वह मनुष्य (किसी को) कोई बुरे बोल नहीं बोलता। वह सारी दुनिया को प्रभू की सिफत सालाह ही सुनाता रहता है। 1। हे संत जनो ! मालिक प्रभू का आसरा पक्का आसरा है (क्योंकि) सारे जीव उस प्रभू के हाथ में हैं।और वह प्रभू हरेक जीव के दिल की जानने वाला है।रहाउ। हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने प्रभू का पक्का आसरा लिया।प्रभू ने उसके) सारे काम सवार दिए। प्रभू ने अपना ये बिरद (प्यार करने वाला स्वभाव) हमेशा ही याद रखा हुआ है। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। हे दास नानक ! (कह, मैं उससे) सदा सदके जाता हूँ। 2। 9। 73।

पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥

सोरठि महला 5 ॥
पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥
इहु लहुड़ा गुरू उबारिआ ॥
अनद करहु पित माता ॥
परमेसरु जीअ का दाता ॥1॥
सुभ चितवनि दास तुमारे ॥
राखहि पैज दास अपुने की कारज आपि सवारे ॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु परउपकारी ॥
पूरन कल जिनि धारी ॥
नानक सरणी आइआ ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥2॥10॥74॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा ने इस छोटे बच्चे (हरगोबिंद) को सजाया और सँवारा। (साध-संगति की अरदास सुन के) गुरूने इसको बचा लिया है। (गुरू परमात्मा की मेहर के सदका इस के) माता-पिता बेशक खुशी मनाएं। परमात्मा ही जीवन का दाता है (रक्षक है)।1। हे प्रभू ! आपके सेवक सब का भला मांगते हैं। (अपने सेवकों की मांग के मुताबिक) आप काम सँवार के सेवकों की इज्जत रख लेते हैं।रहाउ। हे भाई !वही सबकी भलाई करने वाला है। जिस मेरे प्रभू ने सारे जगत में अपनी शक्ति टिकाई हुई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जो भी मनुष्य (उस प्रभू की) शरण आ पड़ता है। वह मन-मांगी मुरादें पा लेता है। 2। 10। 74।

सदा सदा हरि जापे ॥

सोरठि महला 5 ॥
सदा सदा हरि जापे ॥
प्रभ बालक राखे आपे ॥
सीतला ठाकि रहाई ॥
बिघन गए हरि नाई ॥1॥
मेरा प्रभु होआ सदा दइआला ॥
अरदासि सुणी भगत अपुने की सभ जीअ भइआ किरपाला ॥ रहाउ ॥
प्रभ करण कारण समराथा ॥
हरि सिमरत सभु दुखु लाथा ॥
अपणे दास की सुणी बेनंती ॥
सभ नानक सुखि सवंती ॥2॥11॥75॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही (सिर्फ) परमात्मा का नाम जपा करो। प्रभू जी खुद ही बालकों के रखवाले हैं। (बालक हरगोबिंद से प्रभू ने स्वयं ही) सीतला (चेचक) रोक ली है। परमात्मा की सिफत सालाह की बरकति से खतरे दूर हो गए हैं। 1। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा ही दयावान रहता है। सारे ही जीवों पर वह दयालु रहता है।वह अपने भक्त की आरजू (हमेशा) सुनता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू जगत का मूल है।और।सब ताकतों का मालिक है। प्रभू का नाम सिमरने से हरेक दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! प्रभू ने (हमेशा ही) अपने सेवकों की विनती सुनी है (प्रभू जी की मेहर से ही) सारी दुनिया सुखी बसती है। 2। 11। 75।

अपना गुरू धिआए ॥

सोरठि महला 5 ॥
अपना गुरू धिआए ॥
मिलि कुसल सेती घरि आए ॥
नामै की वडिआई ॥
तिसु कीमति कहणु न जाई ॥1॥
संतहु हरि हरि हरि आराधहु ॥
हरि आराधि सभो किछु पाईऐ कारज सगले साधहु ॥ रहाउ ॥
प्रेम भगति प्रभ लागी ॥
सो पाए जिसु वडभागी ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
तिनि सरब सुखा फल पाइआ ॥2॥12॥76॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! जो मनुष्य अपने गुरू का ध्यान धरता है। वह (गुरू चरणों में) जुड़ के आत्मिक आनंद से अपने हृदय-घर में टिक जाता है (बाहर भटकने से बच जाता है)। ये नाम की ही बरकति है (कि मनुष्य अन्य आसरों की तलाश छोड़ देता है)। (पर) इस (हरी-नाम) का मूल्य नहीं आँका जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिलता)। 1। हे संत जनो ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरा करो। परमात्मा का नाम सिमर के हरेक चीज प्राप्त की जाती है।(आप भी परमात्मा का नाम सिमर के अपने) सारे काम सवारो।रहाउ। (हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू का ध्यान धरता है) प्रभू की प्यार भरी भक्ति में उसका मन लग जाता है। पर ये दाति वही मनुष्य हासिल करता है जिसके बड़े भाग्य हों। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरा है। उसने सारे सुख देने वाले (फल) प्राप्त कर लिए हैं। 2। 12। 76।

परमेसरि दिता बंना ॥

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सोरठि महला 5 ॥
परमेसरि दिता बंना ॥
दुख रोग का डेरा भंना ॥
अनद करहि नर नारी ॥
हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य के आत्मिक जीवन के लिए) परमेश्वर ने (विकारों के रास्ते पर) रुकावट खड़ी कर दी। (उस मनुष्य के अंदर से) परमेश्वर ने दुखों और रोगों का डेरा ही खत्म कर दिया। सारे जीव आत्मिक आनंद पाते हैं। जिन जीवों पर प्रभू ने (ये) कृपा कर दी हैं। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६२७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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