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अंग 626

अंग
626
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुख सागरु गुरु पाइआ ॥ ता सहसा सगल मिटाइआ ॥1॥
हरि के नाम की वडिआई ॥
आठ पहर गुण गाई ॥
गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥
प्रभ की अकथ कहाणी ॥
जन बोलहि अंम्रित बाणी ॥
नानक दास वखाणी ॥
गुर पूरे ते जाणी ॥2॥2॥66॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (जब किसी भाग्यशाली को) सुखों का समुंद्र गुरू मिल गया। तब उसने अपना सारा सहम दूर कर लिया। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करनी। आठों पहर परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने- (ये दाति) पूरे गुरू से ही मिलती है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के स्वरूप की बातचीत बताई नहीं जा सकती। प्रभू के सेवक आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी उचारते रहते हैं। हे नानक ! वही सेवक ये बाणी उचारते हैं। जिन्होंने पूरे गुरू से ये समझ हासिल की है। 2। 2। 66।
सोरठि महला 5 ॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥
पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥
सरब निधान सुख पाइआ ॥
गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥1॥
अपने सतिगुर की वडिआई ॥
मन इछे फल पाई ॥
संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥
सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥2॥3॥67॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ गुरू ने उस मनुष्य को आगे आने वाले जीवन राह में सुख बख्श दिया। बीते समय में भी उसे गुरू ने सुख आनंद दिया। 1। उसने सारे (आत्मिक) खजाने सारे आनंद प्राप्त कर लिए। हे संत जनो ! जिस मनुष्य ने अपने गुरू को (अपने) हृदय में बसा लिया। हे संत जनो ! (देखो) अपने गुरू की ऊँची आत्मिक अवस्था। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह) मन-मांगी मुरादें प्राप्त कर लेता है। गुरू की ये उदारता दिनो दिन बढ़ती चली जाती है।रहाउ। हे संत जनो ! (जो भी जीव गुरू की शरण पड़ते हैं वह) सारे ही जीव दया-भरपूर (हृदय वाले) हो जाते हैं।प्रभू उन्हें अपने बना लेता है। हे नानक ! (अंदर पैदा हो चुकी) आत्मिक अडोलता और प्रीति के कारण उन्हें सृष्टि का पालक-प्रभू मिल जाता है।वह सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में मगन रहते हैं। 2। 3। 67।
सोरठि महला 5 ॥
गुर का सबदु रखवारे ॥
चउकी चउगिरद हमारे ॥
राम नामि मनु लागा ॥
जमु लजाइ करि भागा ॥1॥
प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥
बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥
नानक प्रभु अबिनासी ॥
ता की सेव न बिरथी जासी ॥
अनद करहि तेरे दासा ॥
जपि पूरन होई आसा ॥2॥4॥68॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! विकारों के मुकाबले में) गुरू का शबद ही हम जीवों का रखवाला है। शबद ही (हमें विकारों से बचाने के लिए) हमारे चारों तरफ पहरा है। (गुरू के शबद की बरकति से जिस मनुष्य का) मन परमात्मा के नाम में जुड़ता है।उससे (विकार तो एक तरफ रहे।) जम (भी) शर्मिंदा हो के भाग जाता है। 1। हे प्रभू जी ! मेरे लिए तो आप ही सुखों का दाता है। (हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू के नाम में मन जोड़ता है) सर्व-व्यापक सृजनहार प्रभू (उसके माया के मोह आदि के सारे) बंधन काट के उसके मन को पवित्र कर देता है।रहाउ। हे नानक ! (कह) अविनाशी प्रभू (ऐसा उदार-चित्त है कि) उसकी की हुई सेवा-भक्ति व्यर्थ नहीं जाती। हे प्रभू ! आपके सेवक (सदा) आत्मिक आनंद भोगते हैं। आपका नाम जप के उनकी हरेक मनोकामना पूरी हैं जाती है। 2। 4। 68।
सोरठि महला 5 ॥
गुर अपुने बलिहारी ॥
जिनि पूरन पैज सवारी ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥
प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥1॥
संतहु तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥
प्रभि अपनै वर दीने ॥
सगल जीअ वसि कीने ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
ता सगले दूख मिटाइआ ॥2॥5॥69॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ। जिसने (प्रभू के नाम की दाति दे के) पूरी तरह से (मेरी) इज्जत रख ली है। वह मन-मांगी मुरादें प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! जो भी मनुष्य सदा अपने प्रभू का ध्यान धरता है 1। हे संत जनो ! उस परमात्मा के बिना (जीवों का) कोई और (रक्षक) नहीं। वही परमात्मा जगत का मूल है।रहाउ। हे संत जनो ! प्यारे प्रभू ने (जीवों को) सब वर दिए हुए हैं। सारे जीवों को उसने अपने वश में किया हुआ है। हे दास नानक ! (कह, जब भी किसी ने) परमात्मा का नाम सिमरा। तब उसने अपने सारे दुख दूर कर लिए। 2। 5। 69।
सोरठि महला 5 ॥
तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥
वाजे अनहद तूरे ॥
सरब कलिआण प्रभि कीने ॥
करि किरपा आपि दीने ॥1॥
बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥
सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥
जो मंगहि सो लेवहि ॥
प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥
हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥
जन नानक साचु सुभाखिआ ॥2॥6॥70॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ पूरे गुरू ने (हरी नाम की दवा दे के जिस मनुष्य के अंदर से) ताप दूर कर दिया। (उसके अंदर आत्मिक आनंद के।मानो) एक-रस बाजे बजने लग पड़े। प्रभू ने पूर्ण कल्याण किया है और कृपा करके खुद ही वह सारे सुख आनंद बख्श दिए है । 1। (जिसने भी परमात्मा का नाम सिमरा) गुरू ने खुद (उसकी हरेक) पीड़ा दूर कर दी। हे भाई ! सारे सिख संत परमात्मा का नाम सिमर सिमर के आनंद भरपूर हुए रहते हैं।रहाउ। हे प्रभू ! (आपके दर से आपके संत जन) जो कुछ माँगते हैं।वह हासिल कर लेते हैं। आप अपने संतों को (खुद सब कुछ) देता है। (हे भाई ! बालक) हरि गोबिंद को (भी) प्रभू ने (खुद) बचाया है (किसी देवी आदि ने नहीं)। हे दास नानक ! (कह) मैं तो सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम ही उचारता हूँ। 2। 6। 70।
सोरठि महला 5 ॥
सोई कराइ जो तुधु भावै ॥
मोहि सिआणप कछू न आवै ॥
हम बारिक तउ सरणाई ॥
प्रभि आपे पैज रखाई ॥1॥
मेरा मात पिता हरि राइआ ॥
करि किरपा प्रतिपालण लागा करंी तेरा कराइआ ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत तेरे धारे ॥
प्रभ डोरी हाथि तुमारे ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्रभू पातशाह ! आप मुझसे वही काम करवाया कर जो तूझे अच्छा लगता है। मुझे कोई समझदारी वाली बात करनी नहीं आती। हे प्रभू ! हम (आपके) बच्चे आपकी शरण आए हैं। हे भाई ! (शरण पड़े जीव की) प्रभू ने खुद ही इज्जत (हमेशा) रखवाई है। 1। हे प्रभू पातशाह ! आप ही मेरी माँ है।आप ही मेरा पिता है। मेहर करके आप खुद ही मेरी पालना कर रहा है।हे प्रभू ! मैं वही कुछ करता हूँ।जो आप मुझसे करवाता है।रहाउ। सारे जीव आपके ही आसरे हैं। हे प्रभू ! (हम जीवों की जिंदगी की) डोर आपके हाथ में है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (जब किसी भाग्यशाली को) सुखों का समुंद्र गुरू मिल गया।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।