हरि के नाम की वडिआई ॥
आठ पहर गुण गाई ॥
गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥
प्रभ की अकथ कहाणी ॥
जन बोलहि अंम्रित बाणी ॥
नानक दास वखाणी ॥
गुर पूरे ते जाणी ॥2॥2॥66॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥
पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥
सरब निधान सुख पाइआ ॥
गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥1॥
अपने सतिगुर की वडिआई ॥
मन इछे फल पाई ॥
संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥
सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥2॥3॥67॥
गुर का सबदु रखवारे ॥
चउकी चउगिरद हमारे ॥
राम नामि मनु लागा ॥
जमु लजाइ करि भागा ॥1॥
प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥
बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥
नानक प्रभु अबिनासी ॥
ता की सेव न बिरथी जासी ॥
अनद करहि तेरे दासा ॥
जपि पूरन होई आसा ॥2॥4॥68॥
गुर अपुने बलिहारी ॥
जिनि पूरन पैज सवारी ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥
प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥1॥
संतहु तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥
प्रभि अपनै वर दीने ॥
सगल जीअ वसि कीने ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
ता सगले दूख मिटाइआ ॥2॥5॥69॥
तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥
वाजे अनहद तूरे ॥
सरब कलिआण प्रभि कीने ॥
करि किरपा आपि दीने ॥1॥
बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥
सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥
जो मंगहि सो लेवहि ॥
प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥
हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥
जन नानक साचु सुभाखिआ ॥2॥6॥70॥
सोई कराइ जो तुधु भावै ॥
मोहि सिआणप कछू न आवै ॥
हम बारिक तउ सरणाई ॥
प्रभि आपे पैज रखाई ॥1॥
मेरा मात पिता हरि राइआ ॥
करि किरपा प्रतिपालण लागा करंी तेरा कराइआ ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत तेरे धारे ॥
प्रभ डोरी हाथि तुमारे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (जब किसी भाग्यशाली को) सुखों का समुंद्र गुरू मिल गया।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।