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अंग 625

अंग
625
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती ॥
पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती ॥
हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती ॥4॥12॥62॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मालिक-प्रभू दयावान हो के कृपालु हो के खुद ही (जिस मनुष्य की) विनती सुन लेता है। उसे पूरा गुरू मिला देता है (इस तरह।उस मनुष्य के) मन की हरेक चिंता समाप्त हो जाती है। हे दास नानक ! (कह, जिस मनुष्य के) मुँह में परमात्मा नाम-दवा डाल देता है।वह मनुष्य आत्मिक आनंद में जीवन व्यतीत करता है। 4। 12। 62।
सोरठि महला 5 ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥
गुन गावत धिआवत प्रभु अपना कारज सगले सांठे ॥1॥
जगजीवन नामु तुमारा ॥
गुर पूरे दीओ उपदेसा जपि भउजलु पारि उतारा ॥ रहाउ ॥
तूहै मंत्री सुनहि प्रभ तूहै सभु किछु करणैहारा ॥
तू आपे दाता आपे भुगता किआ इहु जंतु विचारा ॥2॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणी कीमति कहणु न जाई ॥
पेखि पेखि जीवै प्रभु अपना अचरजु तुमहि वडाई ॥3॥
धारि अनुग्रहु आपि प्रभ स्वामी पति मति कीनी पूरी ॥
सदा सदा नानक बलिहारी बाछउ संता धूरी ॥4॥13॥63॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपका नाम सिमर सिमर के (सिमरन करने वाले मनुष्य) प्रसन्नचित्त हैं जाते हैं।(उनके अंदर से) सारे दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। (हे भाई ! भाग्यशाली मनुष्य) अपने प्रभू के गुण गाते हुए और उसका ध्यान धरते हुए अपने सारे काम सँवार लेते हैं। 1। हे प्रभू ! आपका नाम जगत (के जीवों) को आत्मिक जीवन देने वाला है। पूरे सतिगुरू ने (जिस मनुष्य को आपका नाम सिमरने का) उपदेश दिया।(वह मनुष्य) नाम ज पके संसार समुंद्र से पार लांघ गया।रहाउ। हे प्रभू ! आप खुद ही अपना सलाहकार है। सब कुछ आप ही करने वाला है आप खुद ही (हरेक जीव को) दातें देने वाला है।आप खुद ही (हरेक जीव में बैठ के पदार्थों को) भोगने वाला है।इस जीव की कोई बिसात नहीं। 2। हे प्रभू ! मैं आपके गुण कह के बयान के लायक नहीं हूँ आपकी कद्र-कीमति बताई नहीं जा सकती। आपका बड़प्पन हैरान कर देने वाला है।(हे भाई ! मनुष्य) अपने प्रभू के दर्शन कर करके आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। 3। हे प्रभू ! हे स्वामी ! आप स्वयं ही (जीव पर) कृपा करके उसको (लोक-परलोक में) आदर देता है।उसे पूर्ण बुद्धि दे देता है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं सदा ही आपसे कुर्बान जाता हूँ।मैं (आपके दर से) संत जनों की चरण-धूड़ माँगता हूँ। 4। 13। 63।
सोरठि मः 5 ॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥
प्रभि सभे काज सवारे ॥
हरि अपणी किरपा धारी ॥
प्रभ पूरन पैज सवारी ॥1॥
अपने दास को भइओ सहाई ॥
सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥
करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥
पिछै लगि चली माइआ ॥
तोटि न कतहू आवै ॥
मेरे पूरे सतगुर भावै ॥2॥
सिमरि सिमरि दइआला ॥
सभि जीअ भए किरपाला ॥
जै जै कारु गुसाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥3॥
तू भारो सुआमी मोरा ॥
इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥
जन नानक एकु धिआइआ ॥
सरब फला पुंनु पाइआ ॥4॥14॥64॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि मः 5 ॥ हे भाई ! जो पूरे गुरू की शरण पड़ता है। (यकीन जानिए कि) परमात्मा ने उसके सारे काम सवार दिए हैं। प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर (की निगाह) की। और (लोक-परलोक में) उसकी लाज अच्छी तरह रख ली। 1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवकों का मददगार बनता है। करतार ने (सदा से ही अपने भक्तों की) सारी मनोकामनाएं पूरी की हैं।सेवक को (किसी किस्म की) कोई कमी नहीं रहती।रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) सर्वव्यापक करतार ने (उसको गुरू के द्वारा) गुप्त नाम-खजाना दिलवा दिया। (उसकी माया की लालसा नहीं रह जाती) माया उसके पीछे-पीछे चलती फिरती है। (माया की ओर से उसे) कहीं भी कमी महसूस नहीं होती। मेरे पूरे सतिगुरू को (उस भाग्यशाली मनुष्य के लिए यही बात) अच्छी लगती है। 2। हे भाई ! दया के घर परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (सिमरन करने वाले) सारे ही जीव उस दया-स्वरूप प्रभू का रूप बन जाते हैं। (इस वास्ते हे भाई !) उस सृष्टि के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करते रहा करो। जिस ने (जीवों को अपने साथ मिलाने की) ये सुंदर योजना बना दी है। 3। हे प्रभू ! आप मेरा बड़ा मालिक है। आपका नाम-पदार्थ (जो मुझे गुरू के माध्यम से मिला है) आपकी ही बख्शिश है। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा को सिमरना शुरू कर दिया। उसने सारे फल देने वाली (ईश्वरीय) कृपा पा ली। 4। 14। 64।
सोरठि महला 5 घरु 3 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामदास सरोवरि नाते ॥
सभि उतरे पाप कमाते ॥
निरमल होए करि इसनाना ॥
गुरि पूरै कीने दाना ॥1॥
सभि कुसल खेम प्रभि धारे ॥
सही सलामति सभि थोक उबारे गुर का सबदु वीचारे ॥ रहाउ ॥
साधसंगि मलु लाथी ॥
पारब्रहमु भइओ साथी ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
आदि पुरख प्रभु पाइआ ॥2॥1॥65॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 3 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में (साध-संगति में नाम-अमृत से) स्नान करते हैं। उनके (पिछले) किए हुए पाप उतर जाते हैं। (हरी नाम जल से) स्नान करके वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। पर ये कृपा पूरे गुरू ने ही की हुई होती है। 1। प्रभू ने (उसके हृउय में) सारे आत्मिक सुख आनंद पैदा कर दिए। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबद को अपनी सोच मंडल में टिका के आत्मिक जीवन के सारे गुण (विकारों के जाल में फसने से) ठीक ठाक बचा लिए। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में (टिकने से) विकारों की मैल दूर हो जाती है। (साध-संगति की बरकति से) परमात्मा मददगार बन जाता है। हे नानक ! (जिस मनुष्य ने रामदास सरोवर में आ के) परमात्मा का नाम सिमरा। उसने उस प्रभू को पा लिया जो सबका आदि है और सर्व-व्यापक है। 2। 1। 65।
सोरठि महला 5 ॥
जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस हृदय-घर में परमात्मा आ बसा है। प्रीतम प्रभू ने वह हृदय-घर (आत्मिक गुणों से) भरपूर कर दिया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मालिक-प्रभू दयावान हो के कृपालु हो के खुद ही (जिस मनुष्य की) विनती सुन लेता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।