अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली (उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया)। 3। हे प्रभू !जब आप प्रेरणा देता है तब ही मैं आपकी सिफत-सालाह कर सकता हूं। आप हमारा मालिक है।आप गुणों का खजाना है।आप गहरे जिगरे वाला है। हे नानक ! सदा स्थिर प्रभू का नाम जपा कर।यही सदा हामी भरने वाला है। प्रभू अपने सेवक की (सदा) इज्जत रखता आया है। 4। 6। 56।
सोरठि महला 5 ॥ विचि करता पुरखु खलोआ ॥ वालु न विंगा होआ ॥ मजनु गुर आंदा रासे ॥ जपि हरि हरि किलविख नासे ॥1॥ संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥ जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥1॥ रहाउ ॥ जै जै कारु जगु गावै ॥ मन चिंदिअड़े फल पावै ॥ सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥2॥ संत सरोवर नावै ॥ सो जनु परम गति पावै ॥ मरै न आवै जाई ॥ हरि हरि नामु धिआई ॥3॥ इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥ जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥ बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥ सभ चिंता गणत मिटाई ॥4॥7॥57॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ सर्व-व्यापक करतार खुद उसकी सहायता करता है। (उसकी आत्मिक राशि-पूँजी का) रक्ती भर भी नुकसान नहीं होता। (हे भाई ! साध-संगति में जिस मनुष्य का) आत्मिक स्नान गुरू ने सफल कर दिया। वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जप-जप के (अपने सारे) पाप नाश कर लेता है।1। हे संत जनो ! साध-संगति (एक) सुंदर (स्थान) है। जो मनुष्य (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है (मन को नाम-जल से पवित्र करता है)।उसके जीवन का (विकारों से) पार-उतारा हो जाता है।वह अपनी सारी कुल को भी (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1।रहाउ। सारा जगत उसकी शोभा के गीत गाता है। वह मनुष्य मन-वांछित फल हासिल कर लेता है। (हे भाई ! वह मनुष्य इस सत्संग-सरोवर में आत्मिक) स्नान कर के अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को पूर्ण-तौर पर बचा लेता है। (जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में टिक के) अपने परमात्मा की आराधना करता है।2। हे भाई ! जो मनुष्य संतो के सरोवर में (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है। वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के मिलाप की इस विचार को वही मनुष्य समझता है जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है। हे नानक ! (कह) हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है। वह अपनी हरेक किस्म की चिंता-फिक्र दूर कर लेता है। 4। 7। 57।
सोरठि महला 5 ॥ पारब्रहमि निबाही पूरी ॥ काई बात न रहीआ ऊरी ॥ गुरि चरन लाइ निसतारे ॥ हरि हरि नामु सम॑ारे ॥1॥ अपने दास का सदा रखवाला ॥ करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥1॥ रहाउ ॥ वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥ जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥ हरि भगति भाइ चितु लागा ॥ जपि जीवहि से वडभागा ॥2॥ हरि अंम्रित बाणी गावै ॥ साधा की धूरी नावै ॥ अपुना नामु आपे दीआ ॥ प्रभ करणहार रखि लीआ ॥3॥ हरि दरसन प्रान अधारा ॥ इहु पूरन बिमल बीचारा ॥ करि किरपा अंतरजामी ॥ दास नानक सरणि सुआमी ॥4॥8॥58॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! सदा से ही) परमात्मा ने अपने सेवक से प्रीति आखिर तक निभाई है। सेवक को किसी बात की कोई कमी नहीं रहती। गुरू ने (सेवकों को सदा ही) चरणों से लगा के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाया है। सेवक सदा परमात्मा का नाम अपने दिल में संभाल के रखता है।1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का सदा रक्षक बना रहता है। जैसे माँ-बाप (बच्चों को) पालते हैं।वैसे ही प्रभू कृपा करके अपने सेवकों को अपने बनाए रखता है। 1।रहाउ। हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने (वह) गुरू पा लिया। जिस (गुरू) ने (उनके वास्ते) जम के देश को ले जाने वाला रास्ता मिटा दिया (क्योंकि गुरू की कृपा से) उनका मन परमात्मा की भक्ति में प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। वे भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेते हैं। 2। (हे भाई ! परमात्मा का सेवक) परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी गाता रहता है सेवक गुरमुखों के चरणों की धूड़ में स्नान करता रहता है (सवै भाव मिटा के संत जनों की शरण पड़ा रहता है)। परमात्मा ने खुद ही (अपने सेवक को) अपना नाम बख्शा है। सृजनहार प्रभू ने खुद ही (सदा से अपने सेवक को विकारों से) बचाया है। 3। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन ही (सेवक की) जिंदगी का आसरा हैं, (प्रभू के सेवक का) ये पवित्र और पूर्ण विचार बना रहता है हे सबके दिलों की जानने वाले ! हे स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर। हे दास नानक ! (आप भी प्रभू दर पर अरदास कर।और कह)मैं आपकी शरण आया हूँ। 4। 8। 58।
सोरठि महला 5 ॥ गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥ हरि संगि सहाई पाइआ ॥ जह जाईऐ तहा सुहेले ॥ करि किरपा प्रभि मेले ॥1॥ हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥ मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥1॥ रहाउ ॥ नाराइण प्राण अधारा ॥ हम संत जनां रेनारा ॥ पतित पुनीत करि लीने ॥ करि किरपा हरि जसु दीने ॥2॥ पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥ सद जीअ संगि रखवाला ॥ हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥ बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥3॥ जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥ हरि रसु तिन ही जाता ॥ जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥ सुखु नानक सरणी पाइआ ॥4॥9॥59॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (परमात्मा के) चरणों में जोड़ दिया। उसने वह परमात्मा पा लिया जो हर वक्त अंग-संग बसता है।और (जीवन का) मददगार है। (अगर प्रभू चरणों में जुड़े रहें तो) जहाँ भी जाएं। वहीं सुखी रह सकते हैं (पर जिन्हें चरणों में मिलाया है) प्रभू ने (खुद ही) कृपा करके मिलाया है। 1। हे भाई ! सदा प्यार से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो। (सिफत सालाह की बरकति से) मन मांगे फल (प्रभू के दर से) प्राप्त करते रहोगे।परमात्मा जीवन के साथ (बसता) साथी (प्रतीत होता रहेगा)। 1।रहाउ। परमात्मा जीवन का आसरा है। मैं तो संत जनों की धूड़ बना रहता हूँ। विकारों में गिरे हुओं को (भी) पवित्र जीवन वाला बना लेते हैं। संत जन कृपा करके परमात्मा की सिफत सालाह की दाति देते हैं।2। परमात्मा खुद (सिफत सालाह करने वालों की) रक्षा करता है। सदा उनके प्राणों के साथ रक्षक बना रहता है। हे भाई ! दिन-रात (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। (सिफत सालाह की बरकति से) दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।3। जिसे सृजनहार सर्व-व्यापक प्रभू खुद (ये दाति) देता है। उस मनुष्य ने ही परमात्मा के नाम का स्वाद समझा है (कद्र जानी है)। जम दूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते। हे नानक ! परमात्मा की शरण पड़ा रह के वह आत्मिक आनंद लेता रहता है। 4। 9। 49।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली (उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।