Lulla Family

अंग ६२३ · सोरठ

अंग
623
सोरठ
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. तिनि सगली लाज राखी ॥3॥
  2. विचि करता पुरखु खलोआ ॥
  3. पारब्रहमि निबाही पूरी ॥
  4. गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥

तिनि सगली लाज राखी ॥3॥

अंग ६२२ से चला आ रहा अंश

तिनि सगली लाज राखी ॥3॥
बोलाइआ बोली तेरा ॥
तू साहिबु गुणी गहेरा ॥
जपि नानक नामु सचु साखी ॥
अपुने दास की पैज राखी ॥4॥6॥56॥

हिन्दी अर्थ: शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली (उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया)। 3। हे प्रभू !जब आप प्रेरणा देते हैं तब ही मैं आपकी सिफत-सालाह कर सकता हूं। आप हमारे मालिक हैं।आप गुणों का खजाना हैं।आप गहरे जिगरे वाले हैं। हे नानक ! सदा स्थिर प्रभू का नाम जपा कर।यही सदा हामी भरने वाला है। प्रभू अपने सेवक की (सदा) इज्जत रखता आया है। 4। 6। 56।

विचि करता पुरखु खलोआ ॥

सोरठि महला 5 ॥
विचि करता पुरखु खलोआ ॥
वालु न विंगा होआ ॥
मजनु गुर आंदा रासे ॥
जपि हरि हरि किलविख नासे ॥1॥
संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥
जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥1॥ रहाउ ॥
जै जै कारु जगु गावै ॥
मन चिंदिअड़े फल पावै ॥
सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥2॥
संत सरोवर नावै ॥
सो जनु परम गति पावै ॥
मरै न आवै जाई ॥
हरि हरि नामु धिआई ॥3॥
इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥
जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥
बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥
सभ चिंता गणत मिटाई ॥4॥7॥57॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ सर्व-व्यापक करतार खुद उसकी सहायता करता है। (उसकी आत्मिक राशि-पूँजी का) रक्ती भर भी नुकसान नहीं होता। (हे भाई ! साध-संगति में जिस मनुष्य का) आत्मिक स्नान गुरू ने सफल कर दिया। वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जप-जप के (अपने सारे) पाप नाश कर लेता है।1। हे संत जनो ! साध-संगति (एक) सुंदर (स्थान) है। जो मनुष्य (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है (मन को नाम-जल से पवित्र करता है)।उसके जीवन का (विकारों से) पार-उतारा हो जाता है।वह अपनी सारी कुल को भी (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1।रहाउ। सारा जगत उसकी शोभा के गीत गाता है। वह मनुष्य मन-वांछित फल हासिल कर लेता है। (हे भाई ! वह मनुष्य इस सत्संग-सरोवर में आत्मिक) स्नान कर के अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को पूर्ण-तौर पर बचा लेता है। (जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में टिक के) अपने परमात्मा की आराधना करता है।2। हे भाई ! जो मनुष्य संतो के सरोवर में (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है। वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के मिलाप की इस विचार को वही मनुष्य समझता है जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है। हे नानक ! (कह) हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है। वह अपनी हरेक किस्म की चिंता-फिक्र दूर कर लेता है। 4। 7। 57।

पारब्रहमि निबाही पूरी ॥

सोरठि महला 5 ॥
पारब्रहमि निबाही पूरी ॥
काई बात न रहीआ ऊरी ॥
गुरि चरन लाइ निसतारे ॥
हरि हरि नामु सम॑ारे ॥1॥
अपने दास का सदा रखवाला ॥
करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥
जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥
हरि भगति भाइ चितु लागा ॥
जपि जीवहि से वडभागा ॥2॥
हरि अंम्रित बाणी गावै ॥
साधा की धूरी नावै ॥
अपुना नामु आपे दीआ ॥
प्रभ करणहार रखि लीआ ॥3॥
हरि दरसन प्रान अधारा ॥
इहु पूरन बिमल बीचारा ॥
करि किरपा अंतरजामी ॥
दास नानक सरणि सुआमी ॥4॥8॥58॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! सदा से ही) परमात्मा ने अपने सेवक से प्रीति आखिर तक निभाई है। सेवक को किसी बात की कोई कमी नहीं रहती। गुरू ने (सेवकों को सदा ही) चरणों से लगा के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाया है। सेवक सदा परमात्मा का नाम अपने दिल में संभाल के रखता है।1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का सदा रक्षक बना रहता है। जैसे माँ-बाप (बच्चों को) पालते हैं।वैसे ही प्रभू कृपा करके अपने सेवकों को अपने बनाए रखता है। 1।रहाउ। हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने (वह) गुरू पा लिया। जिस (गुरू) ने (उनके वास्ते) जम के देश को ले जाने वाला रास्ता मिटा दिया (क्योंकि गुरू की कृपा से) उनका मन परमात्मा की भक्ति में प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। वे भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेते हैं। 2। (हे भाई ! परमात्मा का सेवक) परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी गाता रहता है सेवक गुरमुखों के चरणों की धूड़ में स्नान करता रहता है (सवै भाव मिटा के संत जनों की शरण पड़ा रहता है)। परमात्मा ने खुद ही (अपने सेवक को) अपना नाम बख्शा है। सृजनहार प्रभू ने खुद ही (सदा से अपने सेवक को विकारों से) बचाया है। 3। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन ही (सेवक की) जिंदगी का आसरा हैं, (प्रभू के सेवक का) ये पवित्र और पूर्ण विचार बना रहता है हे सबके दिलों की जानने वाले ! हे स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर। हे दास नानक ! (आप भी प्रभू दर पर अरदास कर।और कह)मैं आपकी शरण आया हूँ। 4। 8। 58।

गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥

सोरठि महला 5 ॥
गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥
हरि संगि सहाई पाइआ ॥
जह जाईऐ तहा सुहेले ॥
करि किरपा प्रभि मेले ॥1॥
हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥
मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
नाराइण प्राण अधारा ॥
हम संत जनां रेनारा ॥
पतित पुनीत करि लीने ॥
करि किरपा हरि जसु दीने ॥2॥
पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥
सद जीअ संगि रखवाला ॥
हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥
बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥3॥
जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥
हरि रसु तिन ही जाता ॥
जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥
सुखु नानक सरणी पाइआ ॥4॥9॥59॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (परमात्मा के) चरणों में जोड़ दिया। उसने वह परमात्मा पा लिया जो हर वक्त अंग-संग बसता है।और (जीवन का) मददगार है। (अगर प्रभू चरणों में जुड़े रहें तो) जहाँ भी जाएं। वहीं सुखी रह सकते हैं (पर जिन्हें चरणों में मिलाया है) प्रभू ने (खुद ही) कृपा करके मिलाया है। 1। हे भाई ! सदा प्यार से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो। (सिफत सालाह की बरकति से) मन मांगे फल (प्रभू के दर से) प्राप्त करते रहोगे।परमात्मा जीवन के साथ (बसता) साथी (प्रतीत होता रहेगा)। 1।रहाउ। परमात्मा जीवन का आसरा है। मैं तो संत जनों की धूड़ बना रहता हूँ। विकारों में गिरे हुओं को (भी) पवित्र जीवन वाला बना लेते हैं। संत जन कृपा करके परमात्मा की सिफत सालाह की दाति देते हैं।2। परमात्मा खुद (सिफत सालाह करने वालों की) रक्षा करता है। सदा उनके प्राणों के साथ रक्षक बना रहता है। हे भाई ! दिन-रात (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। (सिफत सालाह की बरकति से) दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।3। जिसे सृजनहार सर्व-व्यापक प्रभू खुद (ये दाति) देता है। उस मनुष्य ने ही परमात्मा के नाम का स्वाद समझा है (कद्र जानी है)। जम दूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते। हे नानक ! परमात्मा की शरण पड़ा रह के वह आत्मिक आनंद लेता रहता है। ४।९।५९।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६२३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English