गुरि पूरै कीती पूरी ॥
प्रभु रवि रहिआ भरपूरी ॥
खेम कुसल भइआ इसनाना ॥
पारब्रहम विटहु कुरबाना ॥1॥
गुर के चरन कवल रिद धारे ॥
बिघनु न लागै तिल का कोई कारज सगल सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
मिलि साधू दुरमति खोए ॥
पतित पुनीत सभ होए ॥
रामदासि सरोवर नाते ॥
सभ लाथे पाप कमाते ॥2॥
गुन गोबिंद नित गाईऐ ॥
साधसंगि मिलि धिआईऐ ॥
मन बांछत फल पाए ॥
गुरु पूरा रिदै धिआए ॥3॥
गुर गोपाल आनंदा ॥
जपि जपि जीवै परमानंदा ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
प्रभ अपना बिरदु रखाइआ ॥4॥10॥60॥
दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥
सेज इकेली नीद नहु नैनह पिरु परदेसि सिधाइओ ॥1॥
हुणि नही संदेसरो माइओ ॥
एक कोसरो सिधि करत लालु तब चतुर पातरो आइओ ॥ रहाउ ॥
किउ बिसरै इहु लालु पिआरो सरब गुणा सुखदाइओ ॥
मंदरि चरि कै पंथु निहारउ नैन नीरि भरि आइओ ॥2॥
हउ हउ भीति भइओ है बीचो सुनत देसि निकटाइओ ॥
भांभीरी के पात परदो बिनु पेखे दूराइओ ॥3॥
भइओ किरपालु सरब को ठाकुरु सगरो दूखु मिटाइओ ॥
कहु नानक हउमै भीति गुरि खोई तउ दइआरु बीठलो पाइओ ॥4॥
सभु रहिओ अंदेसरो माइओ ॥
जो चाहत सो गुरू मिलाइओ ॥
सरब गुना निधि राइओ ॥ रहाउ दूजा ॥11॥61॥
गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥
करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥
नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥1॥
हरि जीउ निमाणिआ तू माणु ॥
निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंदु तेरी कुदरति कउ कुरबाणु ॥ रहाउ ॥
जैसा बालकु भाइ सुभाई लख अपराध कमावै ॥
करि उपदेसु झिड़के बहु भाती बहुड़ि पिता गलि लावै ॥
पिछले अउगुण बखसि लए प्रभु आगै मारगि पावै ॥2॥
हरि अंतरजामी सभ बिधि जाणै ता किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
कहणै कथनि न भीजै गोबिंदु हरि भावै पैज रखाईऐ ॥
अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! पूरे गुरू ने (आत्मिक जीवन में) सफलता दी है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।