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अंग ६२२ · सोरठ

अंग
622
सोरठ
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  1. संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥
  2. साहिबु गुनी गहेरा ॥
  3. सूख सहज आनंदा ॥
  4. ठाढि पाई करतारे ॥

संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥

अंग ६२१ से चला आ रहा अंश

संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥
कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥2॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥3॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥4॥3॥53॥

हिन्दी अर्थ: (हे संत जनो ! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है।(सिमरन ही) धर्म की सीढ़ी है (जिसके द्वारा मनुष्य प्रभू-चरनों में पहुँच सकता है।पर) कोई दुर्लभ भाग्यशाली ही (ये सीढ़ी) पाता है। जो मनुष्य (सिमरन के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़ता है।उसके करोड़ों जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं। हे संत जनो ! जिस परमात्मा ने (सारे संसार में अपनी) पूरी सक्ता टिका रखी है।उसकी सिफत सालाह सदा करते रहा करो। हे भाई ! वह सारे ही प्राणी स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं।जो सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाली गुरू की शिक्षा को ग्रहण करते हैं। 3। हे नानक ! (कह, जीवन के राह में से सारी) रुकावटें दूर करने वाला।सारे दुख नाश करने वाला हरि-नाम गुरू ने जिस लोगों के दिल में दृढ़ कर दिया। उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं।वह सारे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं।वह आत्मिक आनंद से अंतरात्मे टिके रहते हैं। 4। 3। 53।

साहिबु गुनी गहेरा ॥

सोरठि महला 5 ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
सभि जीअ भए दइआला ॥1॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥2॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥3॥
होए प्रभू सहाई ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥4॥4॥54॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ आप सबके मालिक हैं। आप गुणों के मालिक हैं।आप गहरे जिगरे वाले हैं। (जीवों को) दिया हुआ सारा घर-घाट आपका ही है। हे सबसे बड़े ! हे सृष्टि के पालनहार ! हे सब जीवों के रखवाले ! आप सारे जीवों पर दयावान रहते हैं।1। हे भाई ! गुरू के चरनों को दिल में बसा के मैं आत्मिक आनंद में टिका रहता हूँ। हे भाई ! प्रभू की शरण पड़ने से कहीं भी कोई डर छू नहीं सकता।रहाउ। हे प्रभू ! आपके सेवकों दिल में ही नाम बसता है। हे प्रभू ! आपने (अपने दासों के हृदय में भक्ति की) कभी ना हिलने वाली नींव रख दी है। हे प्रभू ! आप ही मेरा बल हैं।आप ही मेरा धन हैं।आपका ही मुझे आसरा है। आप मेरे सबसे बड़े मालिक हैं। 2। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने गुरू की संगति प्राप्त की है। उस उस को प्रभू ने स्वयं (संसार समुंद्र से) पार लंघा दिया है। जिस मनुष्य को प्रभू ने मेहर करके अपने नाम का स्वाद बख्शा है। उसके अंदर सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य का मददगार बनता है। सारी दुनिया उठ के उसके पैरों में आ लगती है। हे नानक ! हरेक सांस के साथ परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। 4। 4। 54।

सूख सहज आनंदा ॥

सोरठि महला 5 ॥
सूख सहज आनंदा ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
ता गति भई हमारी ॥1॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥2॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
मन पूरन होई आसा ॥
जह पेखा तह सोई ॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥3॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥4॥5॥55॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ मेरे अंदर आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। (मुझे) मन में प्यारा लगने वाला परमात्मा मिल गया है। (हे भाई ! जब से) पूरे गुरू ने (मेरे पर) मेहर की है तब से मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है।1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में टिका रहता है। उसके अंदर सदा एक रस (आत्मिक आनंद की।मानो) वीणा बजती रहती है।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू-चरनों का बलवान आसरा ले लिया। दुनिया के लोगों वाली उसकी सारी मुथाजी खत्म हो गई। उसे जगत का सहारा दातार प्रभू मिल जाता है। वह सदा बड़े प्रेम से परमात्मा के गीत गाता रहता है। 2। हे भाई ! मेरी भी प्रभू ने जम की फांसी काट दी है। मेरे मन की (ये चिरों की) आशा पूरीहो गई है। अब मैं जिधर देखता हूँ वह ही दिखाई नहीं देता। उस परमात्मा के बिना कोई और कोई हमर नहीं है 3। हे नानक ! प्रभू ने कृपा करके जिनकी रक्षा की। उनके अनेकों जन्मों के सारे दुख दूर हो गए। जिन्होंने निर्भय प्रभू का नाम सिमरा। उन्होंने वह आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया जो कभी दूर नहीं होता। 4। 5। 55।

ठाढि पाई करतारे ॥

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सोरठि महला 5 ॥
ठाढि पाई करतारे ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
गुरि पूरै है राखी ॥
सरणि सचे की ताकी ॥1॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
अपणी किरपा धारी ॥
तिनि सगली बात सवारी ॥2॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर करतार ने ठंड बरता दी। उसके परिवार को (उसकी ज्ञानेन्द्रियों को विकारों का) ताप छोड़ जाता है। हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य की मदद की। उसने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का आसरा देख लिया। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा खुद बन जाता है। उसका मन सदा के लिए सुखी हो जाता है (क्योंकि उसके अंदर) एक छिन में आत्मिक अडोलता के सुख और शांति पैदा हो जाते हैं।रहाउ। हे भाई ! (विकार रोगों का इलाज करने के लिए गुरू ने मनुष्य को) परमात्मा का नाम-दवा दी। उस नाम-दवाई ने उस मनुष्य के सारे ही (विकार-) रोग काट दिए। जब प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर की। तो उसने अपनी सारी जीवन कहानी ही सुंदर बना ली (अपना सारा जीवन ही सँवार लिया)। 2। हे भाई ! प्रभू ने (सदा ही) अपने प्यार करने वाले मूल प्राकृतिक स्वभाव (बिरद) को याद रखा है। वह हम जीवों के कोई भी गुण-अवगुण दिल से लगा के नहीं रखता। (प्रभू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर) गुरू के शबद ने अपना प्रभाव डाला।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६२२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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