कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥2॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥3॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥4॥3॥53॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
सभि जीअ भए दइआला ॥1॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥2॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥3॥
होए प्रभू सहाई ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥4॥4॥54॥
सूख सहज आनंदा ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
ता गति भई हमारी ॥1॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥2॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
मन पूरन होई आसा ॥
जह पेखा तह सोई ॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥3॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥4॥5॥55॥
ठाढि पाई करतारे ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
गुरि पूरै है राखी ॥
सरणि सचे की ताकी ॥1॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
अपणी किरपा धारी ॥
तिनि सगली बात सवारी ॥2॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे संत जनो ! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।