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अंग 622

अंग
622
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥
कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥2॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥3॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥4॥3॥53॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे संत जनो ! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है।(सिमरन ही) धर्म की सीढ़ी है (जिसके द्वारा मनुष्य प्रभू-चरनों में पहुँच सकता है।पर) कोई दुर्लभ भाग्यशाली ही (ये सीढ़ी) पाता है। जो मनुष्य (सिमरन के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़ता है।उसके करोड़ों जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं। हे संत जनो ! जिस परमात्मा ने (सारे संसार में अपनी) पूरी सक्ता टिका रखी है।उसकी सिफत सालाह सदा करते रहा करो। हे भाई ! वह सारे ही प्राणी स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं।जो सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाली गुरू की शिक्षा को ग्रहण करते हैं। 3। हे नानक ! (कह, जीवन के राह में से सारी) रुकावटें दूर करने वाला।सारे दुख नाश करने वाला हरि-नाम गुरू ने जिस लोगों के दिल में दृढ़ कर दिया। उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं।वह सारे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं।वह आत्मिक आनंद से अंतरात्मे टिके रहते हैं। 4। 3। 53।
सोरठि महला 5 ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
सभि जीअ भए दइआला ॥1॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥2॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥3॥
होए प्रभू सहाई ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥4॥4॥54॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ आप सबका मालिक है। आप गुणों का मालिक है।आप गहरे जिगरे वाला है। (जीवों को) दिया हुआ सारा घर-घाट आपका ही है। हे सबसे बड़े ! हे सृष्टि के पालनहार ! हे सब जीवों के रखवाले ! आप सारे जीवों पर दयावान रहता है।1। हे भाई ! गुरू के चरनों को दिल में बसा के मैं आत्मिक आनंद में टिका रहता हूँ। हे भाई ! प्रभू की शरण पड़ने से कहीं भी कोई डर छू नहीं सकता।रहाउ। हे प्रभू ! आपके सेवकों दिल में ही नाम बसता है। हे प्रभू ! तूने (अपने दासों के हृदय में भक्ति की) कभी ना हिलने वाली नींव रख दी है। हे प्रभू ! आप ही मेरा बल है।आप ही मेरा धन है।आपका ही मुझे आसरा है। आप मेरा सबसे बड़ा मालिक है। 2। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने गुरू की संगति प्राप्त की है। उस उस को प्रभू ने स्वयं (संसार समुंद्र से) पार लंघा दिया है। जिस मनुष्य को प्रभू ने मेहर करके अपने नाम का स्वाद बख्शा है। उसके अंदर सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य का मददगार बनता है। सारी दुनिया उठ के उसके पैरों में आ लगती है। हे नानक ! हरेक सांस के साथ परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। 4। 4। 54।
सोरठि महला 5 ॥
सूख सहज आनंदा ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
ता गति भई हमारी ॥1॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥2॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
मन पूरन होई आसा ॥
जह पेखा तह सोई ॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥3॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥4॥5॥55॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ मेरे अंदर आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। (मुझे) मन में प्यारा लगने वाला परमात्मा मिल गया है। (हे भाई ! जब से) पूरे गुरू ने (मेरे पर) मेहर की है तब से मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है।1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में टिका रहता है। उसके अंदर सदा एक रस (आत्मिक आनंद की।मानो) वीणा बजती रहती है।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू-चरनों का बलवान आसरा ले लिया। दुनिया के लोगों वाली उसकी सारी मुथाजी खत्म हो गई। उसे जगत का सहारा दातार प्रभू मिल जाता है। वह सदा बड़े प्रेम से परमात्मा के गीत गाता रहता है। 2। हे भाई ! मेरी भी प्रभू ने जम की फांसी काट दी है। मेरे मन की (ये चिरों की) आशा पूरीहो गई है। अब मैं जिधर देखता हूँ वह ही दिखाई नहीं देता। उस परमात्मा के बिना कोई और कोई हमर नहीं है 3। हे नानक ! प्रभू ने कृपा करके जिनकी रक्षा की। उनके अनेकों जन्मों के सारे दुख दूर हो गए। जिन्होंने निर्भय प्रभू का नाम सिमरा। उन्होंने वह आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया जो कभी दूर नहीं होता। 4। 5। 55।
सोरठि महला 5 ॥
ठाढि पाई करतारे ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
गुरि पूरै है राखी ॥
सरणि सचे की ताकी ॥1॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
अपणी किरपा धारी ॥
तिनि सगली बात सवारी ॥2॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर करतार ने ठंड बरता दी। उसके परिवार को (उसकी ज्ञानेन्द्रियों को विकारों का) ताप छोड़ जाता है। हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य की मदद की। उसने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का आसरा देख लिया। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा खुद बन जाता है। उसका मन सदा के लिए सुखी हो जाता है (क्योंकि उसके अंदर) एक छिन में आत्मिक अडोलता के सुख और शांति पैदा हो जाते हैं।रहाउ। हे भाई ! (विकार रोगों का इलाज करने के लिए गुरू ने मनुष्य को) परमात्मा का नाम-दवा दी। उस नाम-दवाई ने उस मनुष्य के सारे ही (विकार-) रोग काट दिए। जब प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर की। तो उसने अपनी सारी जीवन कहानी ही सुंदर बना ली (अपना सारा जीवन ही सँवार लिया)। 2। हे भाई ! प्रभू ने (सदा ही) अपने प्यार करने वाले मूल प्राकृतिक स्वभाव (बिरद) को याद रखा है। वह हम जीवों के कोई भी गुण-अवगुण दिल से लगा के नहीं रखता। (प्रभू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर) गुरू के शबद ने अपना प्रभाव डाला।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे संत जनो ! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।