दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥
पारब्रहमि प्रभि किरपा धारी अपणा बिरदु समारिआ ॥1॥
होई राजे राम की रखवाली ॥
सूख सहज आनद गुण गावहु मनु तनु देह सुखाली ॥ रहाउ ॥
पतित उधारणु सतिगुरु मेरा मोहि तिस का भरवासा ॥
बखसि लए सभि सचै साहिबि सुणि नानक की अरदासा ॥2॥17॥45॥
बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥
गुर पूरे की सरणी उबरे कारज सगल सवारे ॥1॥
हरि जनि सिमरिआ नाम अधारि ॥
तापु उतारिआ सतिगुरि पूरै अपणी किरपा धारि ॥ रहाउ ॥
सदा अनंद करह मेरे पिआरे हरि गोविदु गुरि राखिआ ॥
वडी वडिआई नानक करते की साचु सबदु सति भाखिआ ॥2॥18॥46॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥
सतिगुरि तापु गवाइआ भाई ठांढि पई संसारि ॥
अपणे जीअ जंत आपे राखे जमहि कीओ हटतारि ॥1॥
हरि के चरण रिदै उरि धारि ॥
सदा सदा प्रभु सिमरीऐ भाई दुख किलबिख काटणहारु ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की सरणी ऊबरै भाई जिनि रचिआ सभु कोइ ॥
करण कारण समरथु सो भाई सचै सची सोइ ॥
नानक प्रभू धिआईऐ भाई मनु तनु सीतलु होइ ॥2॥19॥47॥
संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥
सुख सागर प्रभु विसरउ नाही मन चिंदिअड़ा फलु पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरि पूरै तापु गवाइआ अपणी किरपा धारी ॥
पारब्रहम प्रभ भए दइआला दुखु मिटिआ सभ परवारी ॥1॥
सरब निधान मंगल रस रूपा हरि का नामु अधारो ॥
नानक पति राखी परमेसरि उधरिआ सभु संसारो ॥2॥20॥48॥
मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥
धारि क्रिपा प्रभ हाथ दे राखिआ हरि गोविदु नवा निरोआ ॥1॥ रहाउ ॥
तापु गइआ प्रभि आपि मिटाइआ जन की लाज रखाई ॥
साधसंगति ते सभ फल पाए सतिगुर कै बलि जांई ॥1॥
हलतु पलतु प्रभ दोवै सवारे हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य पर पारब्रहम प्रभू ने मेहर (की निगाह) की।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।