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अंग 620

अंग
620
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सोरठि महला 5 ॥
दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥
पारब्रहमि प्रभि किरपा धारी अपणा बिरदु समारिआ ॥1॥
होई राजे राम की रखवाली ॥
सूख सहज आनद गुण गावहु मनु तनु देह सुखाली ॥ रहाउ ॥
पतित उधारणु सतिगुरु मेरा मोहि तिस का भरवासा ॥
बखसि लए सभि सचै साहिबि सुणि नानक की अरदासा ॥2॥17॥45॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य पर पारब्रहम प्रभू ने मेहर (की निगाह) की।(उसको गुरू मिला के) प्रभू ने (उसके पीछे किए) पाप (उसके अंदर से) दूर कर दिए। (इस तरह) प्रभू खुद ही सारे संसार को (विकारों से) बचाता है।अपना मूल प्यार भरा स्वभाव (बिरद) याद रखता है। 1। हे भाई ! प्रभू-पातशाह (जिस मनुष्य की पापों से) रक्षा करता है। उसका मन सुखी हो जाता है।उसका शरीर सुखी हो जाता है।(हे भाई ! आप भी) परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाया करो।(आपको भी) सुख मिलेंगे।आत्मिक अडोलता के आनंद मिलेंगे।रहाउ। हे भाई ! मेरा गुरू विकारियों को (विकारों से) बचाने वाला है।मुझे भी उस का (ही) सहारा है। जिस सदा रहने वाले मालिक ने सारे जीव (गुरू की शरण में डाल के) बख्श लिए हैं (जो सदा स्थिर प्रभू विकारियों को भी गुरू की शरण में डाल कर बख्शता ।वह प्रभू नानक की आरजू भी सुनने वाला है। 2। 17। 45।
सोरठि महला 5 ॥
बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥
गुर पूरे की सरणी उबरे कारज सगल सवारे ॥1॥
हरि जनि सिमरिआ नाम अधारि ॥
तापु उतारिआ सतिगुरि पूरै अपणी किरपा धारि ॥ रहाउ ॥
सदा अनंद करह मेरे पिआरे हरि गोविदु गुरि राखिआ ॥
वडी वडिआई नानक करते की साचु सबदु सति भाखिआ ॥2॥18॥46॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! पारब्रहम परमेश्वर ने (जिस सेवक पर) बख्शिश की।उसके सारे रोग उसने दूर कर दिए। जो भी मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं।वे दुख-कलेशों से बच जाते हैं।गुरू उनके सारे काम सवार देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के जिस सेवक ने परमात्मा का नाम सिमरा।नाम के आसरे में (अपने आप को चलाया)। पूरे गुरू ने अपनी कृपा करके (उसका) ताप उतार दिया।रहाउ। हे मेरे प्यारे (भाई !) (गुरू की शरण पड़ कर) हम (भी) सदा आनंद पाते हैं।हरि गोबिंद को गुरू ने (ही ताप से) बचाया है। हे नानक ! सृजनहार करतार बड़ी ताकतों का मालिक है।उस सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का शबद (ही) उचारना चाहिए।(गुरू ने यह) सही बचन उचारा है (ठीक उपदेश दिया है)। 2। 18। 46।
सोरठि महला 5 ॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥
सतिगुरि तापु गवाइआ भाई ठांढि पई संसारि ॥
अपणे जीअ जंत आपे राखे जमहि कीओ हटतारि ॥1॥
हरि के चरण रिदै उरि धारि ॥
सदा सदा प्रभु सिमरीऐ भाई दुख किलबिख काटणहारु ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की सरणी ऊबरै भाई जिनि रचिआ सभु कोइ ॥
करण कारण समरथु सो भाई सचै सची सोइ ॥
नानक प्रभू धिआईऐ भाई मनु तनु सीतलु होइ ॥2॥19॥47॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर मेरे मालिक प्रभू जी दयावान होते हैं।वह सदा कायम रहने वाले दरबार में (उसकी पहुँच हो जाती है।उसकी सुरति प्रभू-चरणों में जुड़ने लग जाती है।प्रभू की कृपा से जब) गुरू ने (उसका दुखों व पापों का) ताप दूर कर दिया (तो उसके वास्ते सारे) संसार में शांति बरत जाती है (जगत का कोई दुख-पाप उसे छू नहीं सकता)। हे भाई ! प्रभू आप ही अपने सेवकों की (दुख-पाप से) रक्षा करता है।आत्मिक मौत उन्हें छू नहीं सकती (जम उन पर अपना प्रभाव डालने का प्रयत्न त्याग देता है)। 1। हे भाई ! परमात्मा के चरण अपने हृदय में टिकाए रख। हे भाई ! परमात्मा को सदा सदा ही सिमरना चाहिए।वह परमात्मा ही सारे दुखों पापों को नाश करने वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा ने हरेक जीव को पैदा किया है (जो मनुष्य) उसकी शरण पड़ता है वह (दुखों-पापों से) बच जाता है। हे भाई ! वह परमात्मा सारे जगत का मूल है।सब ताकतों का मालिक है।उस सदा कायम रहने वाले प्रभू की शोभा भी सदा कायम रहने वाली है। हे नानक ! (कह) हे भाई ! उस प्रभू का सिमरन करना चाहिए।(सिमरन की बरकति से) मन शांत हो जाता है।तन शांत हो जाता है। 2। 19। 47।
सोरठि महला 5 ॥
संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥
सुख सागर प्रभु विसरउ नाही मन चिंदिअड़ा फलु पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरि पूरै तापु गवाइआ अपणी किरपा धारी ॥
पारब्रहम प्रभ भए दइआला दुखु मिटिआ सभ परवारी ॥1॥
सरब निधान मंगल रस रूपा हरि का नामु अधारो ॥
नानक पति राखी परमेसरि उधरिआ सभु संसारो ॥2॥20॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! (अरदास करो कि) मैं सदा परमात्मा का नाम सिमरत रहूँ। सुखों का समुंद्र परमात्मा मुझे कभी ना भूले।मैं (उसके दर से) मन-इच्छित फल प्राप्त करता रहूँ। 1।रहाउ। हे संत जनो ! पूरे गुरू ने (बालक हरि गोबिंद का) ताप (बुखार) उतार दिया।गुरू ने अपनी कृपा की है। परमात्मा दयावान हुआ है।सारे परिवार का दुख मिट गया है। 1। हे संत जनो ! परमात्मा का नाम ही (हमारा) आसरा है।नाम ही सारी खुशियों-रसों-रूपों का खजाना है। हे नानक ! (कह) परमेश्वर ने (हमारी) इज्जत रख ली है परमेश्वर ही सारे संसार की रक्षा करने वाला है। 2। 20। 48।
सोरठि महला 5 ॥
मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥
धारि क्रिपा प्रभ हाथ दे राखिआ हरि गोविदु नवा निरोआ ॥1॥ रहाउ ॥
तापु गइआ प्रभि आपि मिटाइआ जन की लाज रखाई ॥
साधसंगति ते सभ फल पाए सतिगुर कै बलि जांई ॥1॥
हलतु पलतु प्रभ दोवै सवारे हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा गुरू (मेरा) सहायक बना है। (गुरू की शरण की बरकति से) प्रभू ने कृपा करके (अपना) हाथ दे के (बाल हरि गोबिंद को) बचा लिया है।(अब बालक) हरि गोबिंद बिल्कुल ठीक-ठाक हो गया है। 1। (हे भाई ! बालक हरि गोबिंद का) ताप उतर गया है।प्रभू ने खुद उतारा है।प्रभू ने अपने सेवक की इज्जत रख ली है। हे भाई ! गुरू की संगति से (मैंने) सारे फल प्राप्त किए हैं।मैं (सदा) गुरू से (ही) कुर्बान जाता हूँ। 1। (हे भाई ! जो भी मनुष्य प्रभु का पल्लू पकड़ के रखता है।उसका) ये लोक और परलोक दोनों ही परमात्मा सवार देता है।हम जीवों का कोई गुण अथवा अवगुण परमात्मा चित्त में नहीं रखता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य पर पारब्रहम प्रभू ने मेहर (की निगाह) की।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।