Lulla Family

अंग 621

अंग
621
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अटल बचनु नानक गुर तेरा सफल करु मसतकि धारिआ ॥2॥21॥49॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) हे गुरू ! आपका (ये) बचन कभी टलने वाला नहीं (कि परमात्मा ही जीव का लोक-परलोक में रक्षक है)।हे गुरू ! आप अपना बरकत भरा हाथ (हम जीवों के) माथे पर रखता है। 2। 21। 49।
सोरठि महला 5 ॥
जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥
अपुने सेवक की आपे राखै पूरन भई बडाई ॥1॥
पारब्रहमु पूरा मेरै नालि ॥
गुरि पूरै पूरी सभ राखी होए सरब दइआल ॥1॥ रहाउ ॥
अनदिनु नानकु नामु धिआए जीअ प्रान का दाता ॥
अपुने दास कउ कंठि लाइ राखै जिउ बारिक पित माता ॥2॥22॥50॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! सारे जीव उस (परमात्मा) के ही पैदा किए हुए हैं; वह परमात्मा ही संत जनों का मददगार रहता है। अपने सेवक की (इज्जत) परमात्मा खुद ही रखता है (उसकी कृपा से ही सेवक की) इज्जत पूरे तौर पर बनी रहती है। 1। हे भाई ! पूर्ण-परमात्मा (सदा) मेरे अंग-संग (मददगार) है। पूरे गुरू ने अच्छी तरह मेरी (इज्जत) रख ली है।गुरू सारे जीवों पर ही दयावान रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! नानक (तो उस परमात्मा का) नाम हर वक्त सिमरता रहता है जो जीवन देने वाला है जो सांसें देने वाला है। हे भाई ! जैसे माता-पिता अपने बच्चों का ध्यान रखते हैं।वैसे ही परमात्मा अपने सेवक को (अपने) गले से लगा के रखता है। 2। 22। 50।
सोरठि महला 5 घरु 3 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥
सिकदारहु नह पतीआइआ ॥
उमरावहु आगै झेरा ॥
मिलि राजन राम निबेरा ॥1॥
अब ढूढन कतहु न जाई ॥
गोबिद भेटे गुर गोसाई ॥ रहाउ ॥
आइआ प्रभ दरबारा ॥
ता सगली मिटी पूकारा ॥
लबधि आपणी पाई ॥
ता कत आवै कत जाई ॥2॥
तह साच निआइ निबेरा ॥
ऊहा सम ठाकुरु सम चेरा ॥
अंतरजामी जानै ॥
बिनु बोलत आपि पछानै ॥3॥
सरब थान को राजा ॥
तह अनहद सबद अगाजा ॥
तिसु पहि किआ चतुराई ॥
मिलु नानक आपु गवाई ॥4॥1॥51॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 3 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! नगर के पँचों को मिल के (कामादिक वैरियों पर पड़ रहा) सहम दूर नहीं किया जा सकता। सिकदारों (आगुओं)। लोगों से भी तसल्ली नहीं मिल सकती (कि ये वैरी तंग नहीं करेंगे) सरकारी हाकिमों के आगे भी ये झगड़ा (पेश करने से कुछ नहीं बनता) प्रभू पातशह को मिल के फैसला हो जाता है (और। कामादिक वैरियों का डर खत्म हो जाता है)। 1। तब (कामादिक वैरियों को पड़ रहे सहम से बचने के लिए) किसी और जगह (आसरा) तलाशने की जरूरत नहीं रह गई। जब गोबिंद को।गुरू को सृष्टि के पति को मिल पड़ें।रहाउ। हे भाई ! जब मनुष्य प्रभू की हजूरी में पहुँचता है (चित्त जोड़ता है)। तब इसकी (कामादिक वैरियों के विरुद्ध) सारी शिकायत समाप्त हो जाती है। तब मनुष्य वह वस्तु हासिल कर लेता है जो सदा इसकी अपनी ही बनी रहती है। तब विकारों के चक्कर में पड़ के भटकने से बच जाता है। 2। हे भाई ! प्रभू की हजूरी में सदा कायम रहने वाले न्याय के अनुसार (कामादिक आदि के साथ हो रही टक्कर का) फैसला हो जाता है। उस दरगाह में (जुल्म करने वालों का कोई लिहाज नहीं किया जाता) मालिक और नौकर को एक समान ही समझा जाता है। हरेक के दिल की जानने वाला प्रभू (हजूरी में पहुँचे हुए सवालिए के दिल की) जानता है। (उसके) बोले बिना वह प्रभू स्वयं (उसके दिल की पीड़ा को) समझ लेता है। 3। हे भाई ! प्रभू सब जगहों का मालिक है। उससे मिलाप-अवस्था में मनुष्य के अंदर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी एक-रस पूरा प्रभाव डाल लेती है (और।मनुष्य पर कामादिक वैरी अपना जोर नहीं डाल सकते)।(पर। हे भाई ! उससे मिलने के लिए) उसके साथ कोई चालाकी नहीं की जा सकती। हे नानक ! (कह, हे भाई ! अगर उससे मिलना है तो) स्वै भाव गवा के (उसको) मिल। 4। 1। 51।
सोरठि महला 5 ॥
हिरदै नामु वसाइहु ॥
घरि बैठे गुरू धिआइहु ॥
गुरि पूरै सचु कहिआ ॥
सो सुखु साचा लहिआ ॥1॥
अपुना होइओ गुरु मिहरवाना ॥
अनद सूख कलिआण मंगल सिउ घरि आए करि इसनाना ॥ रहाउ ॥
साची गुर वडिआई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
सिरि साहा पातिसाहा ॥
गुर भेटत मनि ओमाहा ॥2॥
सगल पराछत लाथे ॥
मिलि साधसंगति कै साथे ॥
गुण निधान हरि नामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥3॥
गुरि कीनो मुकति दुआरा ॥
सभ स्रिसटि करै जैकारा ॥
नानक प्रभु मेरै साथे ॥
जनम मरण भै लाथे ॥4॥2॥52॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! अपने दिल में परमात्मा का नाम बसाए रखो। अंतरात्मे टिक के गुरू का ध्यान धरा करो। जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने सदा-स्थिर हरी-नाम (के सिमरन) का उपदेश दिया। उसने वह आत्मिक आनंद पा लिया जो सदा कायम रहता है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर प्यारा गुरू दयावान होता है। वह मनुष्य नाम-जल से मन को पवित्र करके आत्मिक आनंद सुख खुशियों से भरपूर हो के अंतरात्मे टिक जाते हैं (विकार आदि से भटकना हट जाती है)।रहाउ। हे भाई ! गुरू की आत्मिक उच्चता सदा स्थिर रहने वाली है। उसकी कद्र-कीमत बताई नहीं जा सकती। गुरू (दुनिया के) शाहों के सिर पर पातशाह है। गुरू को मिल के मन में (हरी नाम सिमरन का) चाव पैदा हो जाता है। 2। हे भाई ! सारे पाप उतर जाते हैं गुरू की संगति में मिल के । (गुरू की संगति की बरकति से) सारे गुणों के खजाने हरी नाम को जप जप के (जिंदगी के) सारे मनोरथ सफल हो जाते हैं। 3। हे भाई ! गुरू ने (हरी-नाम सिमरन का एक ऐसा) दरवाजा तैयार कर दिया है (जो विकारों से) खलासी (करा देता है)। (गुरू की इस दाति के कारण) सारी सृष्टि (गुरू की) शोभा करती है। हे नानक ! (कह, गुरू की कृपा से हरी का नाम हृदय में बसाने से) परमात्मा मेरे अंग-संग (बसता प्रतीत हो रहा है) मेरे जनम-मरण के सारे डर उतर गए हैं। 4। 2। 52।
सोरठि महला 5 ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥
प्रभि पूरी लोच हमारी ॥
करि इसनानु ग्रिहि आए ॥
अनद मंगल सुख पाए ॥1॥
संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥
ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे संत जनो ! जब से) पूरे गुरू ने मेहर की है। प्रभू ने हमारी (नाम सिमरन की) तमन्ना पूरी कर दी है। (नाम सिमरन की बरकति से) आत्मिक स्नान करके हम अंतरात्मे टिके रहते हैं। आत्मिक आनंद आत्मिक खुशियां आत्मिक सुख भोग रहे हैं। 1। हे संत जनो ! परमात्मा के नाम में (जुड़ने से ही संसार समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। (इस वास्ते) उठते-बैठते हर वक्त नाम सिमरन करना चाहिए।(हरी-नाम सिमरन की ये) नेक कमाई हर समय करनी चाहिए। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) हे गुरू ! आपका (ये) बचन कभी टलने वाला नहीं (कि परमात्मा ही जीव का लोक-परलोक में रक्षक है)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।