पारब्रहमु जपि सदा निहाल ॥ रहाउ ॥ अंतरि बाहरि थान थनंतरि जत कत पेखउ सोई ॥ नानक गुरु पाइओ वडभागी तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥2॥11॥39॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (उसकी मेहर से) परमात्मा का नाम जप के मैं सदा प्रसन्न-चित्त रहता हूँ।रहाउ। हे भाई ! अब अपने अंदर और बाहर (सारे जगत में)।हर जगह में।मैं जहाँ भी देखता हूँ उस परमात्मा को ही (बसता देखता हॅू)। हे नानक ! (मुझे) बड़े भाग्यों से गुरू मिला है (ऐसी दाति बख्शिश कर सकने वाला) गुरू के बराबर का और कोई नहीं। 2। 11। 39।
सोरठि महला 5 ॥ सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥ राखनहारै राखिओ बारिकु सतिगुरि तापु उतारिआ ॥1॥ उबरे सतिगुर की सरणाई ॥ जा की सेव न बिरथी जाई ॥ रहाउ ॥ घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा प्रभ अपुने भए दइआला ॥ नानक बिघनु न लागै कोऊ मेरा प्रभु होआ किरपाला ॥2॥12॥40॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य ने) परमात्मा के चरणों के दर्शन कर लिए।उसके अंदर सुख-खुशी-आनंद और आत्मिक अडोलता की लहर चल पड़ी। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ा) गुरू ने उसका ताप (दुख-कलेश) उतार दिया।रक्षा करने की समर्था वाले गुरू ने उस बालक को (विघनों से) बचा लिया (उसे यूँ बचाया जैसे पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है)। 1। हे भाई ! उस गुरू की शरण जो मनुष्य पड़ते हैं वह (आत्मिक जीवन के रास्ते में आने वाली रुकावटों से) बच जाते हैं। जिस गुरू की की हुई सेवा ख़ाली नहीं जाती। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसके) हृदय में आत्मिक आनंद बना रहता है।बाहर (दुनिया से बर्ताव-व्यवहार करते हुए) भी उसे आत्मिक सुख मिला रहता है।उस पर प्रभू सदा दयावान रहता है। हे नानक ! उस मनुष्य की जिंदगी के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आती।उस पर परमात्मा कृपालु हुआ रहता है। 2। 12। 40।
सोरठि महला 5 ॥ साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥ मिटि गई चिंता सिमरि अनंता सागरु तरिआ भाई ॥1॥ हिरदै हरि के चरण वसाई ॥ सुखु पाइआ सहज धुनि उपजी रोगा घाणि मिटाई ॥ रहाउ ॥ किआ गुण तेरे आखि वखाणा कीमति कहणु न जाई ॥ नानक भगत भए अबिनासी अपुना प्रभु भइआ सहाई ॥2॥13॥41॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की संगति में रहने से मन में उद्यम पैदा होता है।(मनुष्य) श्रेष्ठ नाम जपने लग जाता है।परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने लग पड़ता है। बेअंत प्रभू का सिमरन करके मनुष्य की चिंता मिट जाती है।मनुष्य संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 1। हे भाई ! अपने हृदय में परमात्मा के चरण टिकाए रख (विनम्रता में रह के परमात्मा का सिमरन किया कर)।(जिसने भी ये उद्यम किया है।उसने) आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया।(उसके अंदर) आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो गई।(उसने अपने अंदर से) रोगों के ढेर मिटा लिए।रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपके कौन-कौन से गुण बयान करके बताऊँ।आपका मूल्य बताया नहीं जा सकता (आप किसी दुनियावी पर्दाथ के बदले में नहीं मिल सकता)। हे नानक ! प्यारा प्रभू जिन मनुष्यों का मददगार बनता है।वह भक्त-जन आत्मिक मौत से रहित हो जाते हैं। 2। 13। 41।
सोरठि मः 5 ॥ गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥ आठ पहर आराधहु सुआमी पूरन घाल हमारी ॥1॥ हरि जीउ तू सुख संपति रासि ॥ राखि लैहु भाई मेरे कउ प्रभ आगै अरदासि ॥ रहाउ ॥ जो मागउ सोई सोई पावउ अपने खसम भरोसा ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ मिटिओ सगल अंदेसा ॥2॥14॥42॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस भी मनुष्य पर प्यारे प्रभू ने मेहर की उसके सारे कलेश और रोग दूर हो गए। (हे भाई !) मालिक प्रभू को आठों पहर याद करते रहा करो।हम जीवों की (ये) मेहनत (अवश्य) सफल होती है। 1। हे प्रभू जी ! आप ही मुझे आत्मिक आनंद का धन-सरमाया देने वाला है। हे प्रभू ! मुझे (कलेशों-अंदेशों से) बचा ले।हे प्रभू ! मेरी आपके आगे यही आरजू है।रहाउ। हे भाई ! मैं तो जो कुछ (प्रभू से) माँगता हूँ।वही कुछ प्राप्त कर लेता हूँ।मुझे अपने मालिक प्रभू पर (पूरा) ऐतबार (बन चुका) है। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है।उसकी सारी चिंता-फिकर दूर हो जाती हैं। 2। 14। 42।
सोरठि महला 5 ॥ सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥ ताप रोग गए गुर बचनी मन इछे फल पाइआ ॥1॥ मेरा गुरु पूरा सुखदाता ॥ करण कारण समरथ सुआमी पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥ अनंद बिनोद मंगल गुण गावहु गुर नानक भए दइआला ॥ जै जै कार भए जग भीतरि होआ पारब्रहमु रखवाला ॥2॥15॥43॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।वह) बार बार गुरू सतिगुरू (की बाणी) को याद करके अपना हरेक किस्म का दुख दूर कर लेता है। गुरू के बचनों पर चल के उसके सारे कलेश।सारे रोग दूर हो जाते हैं।वह मन-मांगे फल प्राप्त कर लेता है। 1। हे भाई ! मेरा गुरू सब गुणों से भरपूर है।सारे सुख बख्शने वाला है। गुरू उस सर्व-व्यापक सृजनहार का रूप है जो सारे जगत का मूल है।जो सब ताकतों का मालिक है।रहाउ। हे नानक ! (कह, हे भाई ! अगर आपके पर) सतिगुरू जी दयावान हुए हैं।तो आप प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाता रहा कर।(सिफत सालाह की बरकति से आपके अंदर) आनंद-खुशियां व सुख बने रहेंगे। (सिफत सालाह के सदके) जगत में शोभा मिलती है।(ये निष्चय बना रहता है कि) परमात्मा (सदा सिर पर) रखवाला है। 2। 15। 43।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा हम जीवों के किए बुरे कर्मों का कोई ख्याल नहीं करता।वह अपने मूल (प्यार भरे) स्वभाव (बिरद) को याद रखता है (वह बल्कि।हमें गुरू से मिलवा के। हमें) अपने बना के (अपना) हाथ दे के (हमें विकारों से) बचाता है।(जिस भाग्यशाली को गुरू मिल जाता है।वह) सदा ही आत्मिक आनंद लेता है। 1। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला मालिक प्रभू सदा दयावान रहता है। (कुकर्मों की ओर जा रहे लोगों को बचा के वह गुरू से मिलाता है।जिसे पूरा गुरू मिल गया।उसके विकारों के रास्ते में) मेरे पूरे गुरू ने रुकावट खड़ी कर दी (और।इस तरह उसके अंदर) सारे आत्मिक आनंद पैदा हो गए।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा ने प्राण डाल के (हमारा) शरीर पैदा किया है।जो (हर वक्त) हमें खुराक और पोशाक दे रहा है। वह परमात्मा (संसार समुंद्र की विकार-लहरों से) अपने सेवक की इज्जत (गुरू को मिला के) बचाता है।हे नानक ! (कह, मैं उस परमात्मा से) सदा सदके जाता हूँ। 2। 16। 44।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(उसकी मेहर से) परमात्मा का नाम जप के मैं सदा प्रसन्न-चित्त रहता हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।