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अंग ६१ · सिरी राग

अंग
61
सिरी राग
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  1. साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥
  2. त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥

साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥

अंग ६० से चला आ रहा अंश

साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तूं मै तुझ बिनु कवनु भतारु ॥3॥
अखर पड़ि पड़ि भुलीऐ भेखी बहुतु अभिमानु ॥
तीरथ नाता किआ करे मन महि मैलु गुमानु ॥
गुर बिनु किनि समझाईऐ मनु राजा सुलतानु ॥4॥
प्रेम पदारथु पाईऐ गुरमुखि ततु वीचारु ॥
सा धन आपु गवाइआ गुर कै सबदि सीगारु ॥
घर ही सो पिरु पाइआ गुर कै हेति अपारु ॥5॥
गुर की सेवा चाकरी मनु निरमलु सुखु होइ ॥
गुर का सबदु मनि वसिआ हउमै विचहु खोइ ॥
नामु पदारथु पाइआ लाभु सदा मनि होइ ॥6॥
करमि मिलै ता पाईऐ आपि न लइआ जाइ ॥
गुर की चरणी लगि रहु विचहु आपु गवाइ ॥
सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥7॥
भुलण अंदरि सभु को अभुलु गुरू करतारु ॥
गुरमति मनु समझाइआ लागा तिसै पिआरु ॥
नानक साचु न वीसरै मेले सबदु अपारु ॥8॥12॥

हिन्दी अर्थ: हरि के गुणों की बरकति से हरि-नाम के आसरे से सदा स्थिर प्रभू में (जुड़ने से) अडोल अवस्था में (टिके रहने से) बहुत शोभा (भी मिलती है)। (मैं आपका दास विनती करता हूं- हे प्रभू) जैसे आपकी रजा हो सके, मुझे अपने चरणों में रख। आपके बिना मेरा खसम सांई और कोई नहीं।3। विद्या पढ़ पढ़ के (भी विद्या के अहंकार के कारण) कुमार्ग पर ही पड़ता है (गृहस्थ-त्यागियों के) भेषों से भी (मन में) बड़ा गुमान पैदा होता है। तीर्तों पर स्नान करने से भी कुछ नहीं संवार सकता। क्योंकि, मन में (इस) अहंकार की मैल टिकी रहती है (कि मैं तीर्थ स्नानी हूँ)। (हरेक भटके हुए रास्ते में) मन (इस शरीर नगरी का) राजा बना रहता है, सुल्तान बना रहता है। गुरू के बिनां इसको किसी और ने मति नहीं दी (कोई इसे समझा नहीं सका)।4। (हे बाबा !) गुरू की शरण पड़ के अपने मूल प्रभू (के गुणों) को विचार। गुरू की शरण पड़ने से ही (प्रभू चरणों से) प्रेम पैदा करने वाला नाम धन मिलता है। जिस जीव स्त्री ने स्वै भाव दूर किया है, गुरू के शबद में (जुड़ के आत्मिक जीवन को स्वैभाव दूर करने का) श्रृंगार किया है। उसने गुरू के बख्शे प्रेम से अपने हृदय रूपी घर में उस बेअंत प्रभू पति को ढूंढ लिया है।5। गुरू की बताई हुई सेवा करने से चाकरी करने सेमन पवित्र हो जाता है, आत्मिक आनंद मिलता है। जिस मनुष्य के मन में गुरू का शबद (उपदेश) बस जाता है, वह अपने अंदर से अहम् दूर कर लेता है। जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ के) नाम-धन हासिल कर लिया है, उसके मन में सदा लाभ होता है। (उसके मन में आत्मक गुणों की सदैव बढ़होतरी ही होती है)।6। परमात्मा मिलता है तो अपनी मेहर से मिलता है। मनुष्य के अपने उद्यम से नहीं मिल सकता। (इस वास्ते, हे भाई !) अपने अंदर से स्वैभाव दूर करके गुरू के चरणों में टिका रह। (गुरू की शरण की बरकति से) सदा कायम रहने वाले प्रभू के रंग में रंगे रहें, तब वह सदा स्थिर प्रभू मिल जाता है।7। (हे बाबा ! माया ऐसी प्रबल है कि इसके चक्कर में फंस के) हरेक जीव गलती खा जाता है। सिर्फ गुरू है करतार है जो (ना माया के असर में आता है, और) ना गलती खाता है। जिस मनुष्य ने गुरू का मति पर चल कर अपने मन को समझा लिया है, उसके अंदर (परमात्मा का) प्रेम बन जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू का शबद अपार प्रभू मिला देता है उसे सदा स्थिर प्रभू कभी भूलता नहीं।8।12।

त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥

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सिरीरागु महला 1 ॥
त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥
धनि जोबनि जगु ठगिआ लबि लोभि अहंकारि ॥
मोह ठगउली हउ मुई सा वरतै संसारि ॥1॥
मेरे प्रीतमा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥
मै तुझ बिनु अवरु न भावई तूं भावहि सुखु होइ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु सालाही रंग सिउ गुर कै सबदि संतोखु ॥
जो दीसै सो चलसी कूड़ा मोहु न वेखु ॥
वाट वटाऊ आइआ नित चलदा साथु देखु ॥2॥
आखणि आखहि केतड़े गुर बिनु बूझ न होइ ॥
नामु वडाई जे मिलै सचि रपै पति होइ ॥
जो तुधु भावहि से भले खोटा खरा न कोइ ॥3॥
गुर सरणाई छुटीऐ मनमुख खोटी रासि ॥
असट धातु पातिसाह की घड़ीऐ सबदि विगासि ॥
आपे परखे पारखू पवै खजानै रासि ॥4॥
तेरी कीमति ना पवै सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥
कहणै हाथ न लभई सचि टिकै पति पाइ ॥
गुरमति तूं सालाहणा होरु कीमति कहणु न जाइ ॥5॥
जितु तनि नामु न भावई तितु तनि हउमै वादु ॥
गुर बिनु गिआनु न पाईऐ बिखिआ दूजा सादु ॥
बिनु गुण कामि न आवई माइआ फीका सादु ॥6॥
आसा अंदरि जंमिआ आसा रस कस खाइ ॥
आसा बंधि चलाईऐ मुहे मुहि चोटा खाइ ॥
अवगणि बधा मारीऐ छूटै गुरमति नाइ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ पुत्र, रिश्तेदार, घर, स्त्री (आदि के मोह) के कारण मोहनी माया की तृष्णा जीवों में व्याप रही है। धन ने, जवानी ने, लोभ ने, अहंकार ने (सारे) जगत को लूट लिया है। मोह की ठग-बूटी ने मुझे भी ठग लिया है यही मोह ठॅग बूटी सारे संसार पर अपना जोर डाल रही है।1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (इस ठॅग बूटी से बचाने के लिए) मुझे आपके बिनां और कोई (स्मर्थ) नहीं (दिखता)। मुझे आपके बिनां कोई और प्यारा नहीं लगता। जब आप मुझे प्यारे लगते हैं, तब मुझे आत्मिक सुख मिलता है।1।रहाउ। (हे मन !) गुरू के शबद से संतोख धारण करके (तृष्णा के पंजे में से निकल के) प्रेम से (परमात्मा के) नाम की सिफत सलाह कर। इस नाशवंत मोह को ना देख। ये तो जो कुछ दिखाई दे रहा है सभ नाश हो जाएगा। (यहां जीव) रास्ते का मुसाफिर (बन के) आया है, यह सारा साथ नित्य चलने वाला समझ।2। बताने को तो बेअंत जीव बता देते हैं (कि माया की तृष्णा से इस प्रकार बच सकते हैं, पर) गुरू के बगैर सही समझ नहीं पड़ती। (गुरू की शरण पड़ के) अगर परमात्मा का नाम मिल जाए, परमात्मा की सिफत सलाह मिल जाए अगर (मनुष्य का मन) सदा स्थिर प्रभू (के प्यार) में रंगा जाए, तो उस लोक (परलोक में) इज्जत मिलती है। (पर, हे प्रभू ! अपने प्रयास से कोई जीव) ना खरा बन सकता है, ना ही खोटा रह जाता है। जो आपको प्यारे लगते हैं वही भले हैं।3। गुरू की शरण पड़ के ही (तृष्णा के पंजे में से) निजात पायी जाती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य खोटी पूँजी ही जोड़ता है। परमात्मा की रची हुई ये आठ धातुओं वाली मानस काया अगर गुरू के शबद (की टकसाल) में घढ़ी जाए (सुचज्जी बनाई जाए, तो ही यह) खिलती है (आत्मिक उल्लास में आती है)। परखने वाला प्रभू खुद ही (इसकी मेहनत मुश्क्कत को) परख लेता है और (इसके आत्मिक गुणों का) सरमाया (उसके) खजाने में (कबूल) पड़ता है।4। (हे प्रभू !) मैंने सारी सृष्टि अच्छी तरह परख कर देख ली है, मुझे आपके बराबर कोई नहीं दिखता (जो मुझे माया के पंजे से बचा सके। आप बेअंत गुणों के मालिक हैं) ये बयान करने से आपके गुण की थाह नहीं पाई जा सकती। जो जीव सदा स्थिर स्वरूप में टिकता है उसको इज्जत मिलती है। गुरू की मति ले के ही आपकी सिफत सलाह की जा सकती है। पर, आपके बराबर का ढूंढने के वास्ते कोई बोल नहीं बोला जा सकता।5। जिस शरीर को परमात्मा का नाम प्यारा नहीं लगता, उस शरीर में अहम् बढ़ता है, उस शरीर में तृष्णा का बखेड़ा भी बढ़ता है। गुरू के बिनां परमात्मा से जान पहिचान नहीं बन सकती। माया का प्रभाव पड़ के परमात्मा के बिनां और तरफ का स्वाद मन में उपजता है। आत्मिक गुणों से वंचित रह कर यह मानस देह व्यर्थ जाती है और अंत को माया वाला स्वाद भी बे-रस हो जाता है।6। जीव आशा (तृष्णा) में बंधा हुआ जन्म लेता है (जब तक जगत में जीता है) आशा के प्रभाव में ही (मीठे) कसैले (आदिक) रसों (वाले पदार्थ) खाता रहता है। (उम्र खत्म हो जाने पर) आशा (तृष्णा) के (बंधन में) बंधा हुआ यहां से भेजा जाता है। (सारी उम्र आशा तृष्णा में ही फंसे रहने करके) मुड़ मुड़ मुंह पर चोटें खाता है। विकारमयी जीवन के कारण (आशा तृष्णा में) जकड़ा हुआ मार खाता है। यदि गुरू की शिक्षा लेकर प्रभू के नाम में जुड़ें, तो ही (आसा तृष्णा के जाल में से) खलासी पा सकता है।7।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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