जिह जन ओट गही प्रभ तेरी से सुखीए प्रभ सरणे ॥ जिह नर बिसरिआ पुरखु बिधाता ते दुखीआ महि गनणे ॥2॥ जिह गुर मानि प्रभू लिव लाई तिह महा अनंद रसु करिआ ॥ जिह प्रभू बिसारि गुर ते बेमुखाई ते नरक घोर महि परिआ ॥3॥ जितु को लाइआ तित ही लागा तैसो ही वरतारा ॥ नानक सह पकरी संतन की रिदै भए मगन चरनारा ॥4॥4॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जिन मनुष्यों ने आपका आसरा लिया।वे आपकी शरण में रह के सुख पाते हैं।पर। हे भाई ! जिन मनुष्यों को सर्व-व्यापक करतार भूल जाता है।वे मनुष्य दुखियों में गिने जाते हैं। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की आज्ञा मान के परमात्मा में सुरति जोड़ ली।उन्होंने बड़ा आनंद बड़ा रस पाया। पर जो मनुष्य परमात्मा को भुला के गुरू की ओर से मुँह मोड़ के रखते हैं वे भयानक नर्क में पड़े रहते हैं। 3। हे नानक ! (जीवों के क्या वश।) जिस काम में परमात्मा किसी जीव को लगाता है उसी काम में वह लगा रहता है।हरेक जीव वैसा ही काम करता है। जिन मनुष्यों ने (प्रभू की प्रेरणा से) संत-जनों का आसरा लिया है वे अंदर से प्रभू के चरणों में मस्त रहते हैं। 4। 4। 15।
सोरठि महला 5 ॥ राजन महि राजा उरझाइओ मानन महि अभिमानी ॥ लोभन महि लोभी लोभाइओ तिउ हरि रंगि रचे गिआनी ॥1॥ हरि जन कउ इही सुहावै ॥ पेखि निकटि करि सेवा सतिगुर हरि कीरतनि ही त्रिपतावै ॥ रहाउ ॥ अमलन सिउ अमली लपटाइओ भूमन भूमि पिआरी ॥ खीर संगि बारिकु है लीना प्रभ संत ऐसे हितकारी ॥2॥ बिदिआ महि बिदुअंसी रचिआ नैन देखि सुखु पावहि ॥ जैसे रसना सादि लुभानी तिउ हरि जन हरि गुण गावहि ॥3॥ जैसी भूख तैसी का पूरकु सगल घटा का सुआमी ॥ नानक पिआस लगी दरसन की प्रभु मिलिआ अंतरजामी ॥4॥5॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ (हे भाई ! जैसे) राज के कामों में राजा मगन रहता है।जैसे मान बढ़ाने वाले कामों में आदर-मान का भूखा मनुष्य लगा रहता है। जैसे लालची मनुष्य लालच बढ़ाने वाले कामों में फसा रहता है।वैसे ही आत्मिक जीवन की समझ वाला मनुष्य प्रभू के प्रेम रंग में मस्त रहता है। 1। परमात्मा के भक्त को यही काम अच्छा लगता है। (भक्त परमात्मा को) अंग-संग देख के और गुरू की सेवा करके परमात्मा की सिफत सालाह में ही प्रसन्न रहता है।रहाउ। हे भाई ! नशों का प्रेमी मनुष्य नशों से चिपका रहता है।जमीन के मालिक को जमीन प्यारी लगती है। बच्चा दूध में परचा रहता है।इसी तरह संत जन परमात्मा से प्यार करते हैं। 2। हे भाई ! विद्वान मनुष्य विद्या (पढ़ने-पढ़ाने) में खुश रहता है।आँखें (पदार्थ) देख-देख के सुख भोगती हैं। हे भाई ! जैसे जीभ (स्वादिष्ट पदार्थों के) स्वाद (चखने) में खुश रहती है।वैसे ही प्रभू के भक्त प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाते हैं। 3। हे भाई ! सारे शरीरों के मालिक प्रभू जैसे जैसी किसी जीव की लालसा हो वैसी वैसी ही पूरी करने वाला है। हे नानक ! (जिस मनुष्य को) परमात्मा के दर्शन की प्यास लगती है।उस मनुष्य को दिल की जानने वाला परमात्मा (खुद) आ के मिलता है। 4। 5। 16।
सोरठि महला 5 ॥ हम मैले तुम ऊजल करते हम निरगुन तू दाता ॥ हम मूरख तुम चतुर सिआणे तू सरब कला का गिआता ॥1॥ माधो हम ऐसे तू ऐसा ॥ हम पापी तुम पाप खंडन नीको ठाकुर देसा ॥ रहाउ ॥ तुम सभ साजे साजि निवाजे जीउ पिंडु दे प्राना ॥ निरगुनीआरे गुनु नही कोई तुम दानु देहु मिहरवाना ॥2॥ तुम करहु भला हम भलो न जानह तुम सदा सदा दइआला ॥ तुम सुखदाई पुरख बिधाते तुम राखहु अपुने बाला ॥3॥ तुम निधान अटल सुलितान जीअ जंत सभि जाचै ॥ कहु नानक हम इहै हवाला राखु संतन कै पाछै ॥4॥6॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्रभू ! हम जीव विकारों की मैल से भरे रहते हैं।आप हमें पवित्र करने वाला है।हम गुण-हीन हैं।आप हमें गुण बख्शने वाला है। हम जीव मूर्ख हैं।आप दाना है।आप समझदार है आप (हमें अच्छा बना सकने वाले) सारे हुनर जानने वाला है। 1। हे प्रभू ! हम जीव ऐसे (विकारी) हैं।और आप ऐसा (उपकारी) है। हम पाप कमाने वाले हैं।आप हमारे पापों का नाश करने वाला है।हे ठाकुर ! आपका देश सुंदर है (वह देश-साध-संगति सोहणा है जहाँ तु बसता है)।रहाउ। हे प्रभू ! तूने जिंद शरीर प्राण दे के सारे जीवों को पैदा किया है।पैदा करके सब पर बख्शिश करता है। हे मेहरवान ! हम गुण-हीन हैं।हममें कोई गुण नहीं हैं।आप हमें गुणों की दाति बख्शता है। 2। हे प्रभू ! आप हमारे लिए भलाई करता है।पर हम आपकी की हुई भलाई की कद्र नहीं जानते।फिर भी आप हम पर सदा दयावान रहता है। हे सर्व-व्यापक सृजनहार ! आप हमें सुख देने वाला है।आप (हमारी) अपने बच्चों की रखवाली करता है। 3। हे प्रभू जी ! आप सारे गुणों के खजाने हैं।आप सदा कायम रहने वाले बादशाह हैं।सारे जीव (आपके दर से) माँगते हैं। हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) हम जीवों का तो यही हाल है।आप हमें संत-जनों के आसरे में रख। 4। 6। 17।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 2 ॥ माँ के पेट में हमें अपना सिमरन दे के वहाँ हमारी रक्षा करने वाला है। हे (संसार समुंद्र से) पार लंघा सकने की समर्था रखने वाले !(विकारों की) आग के समुंद्र में गहरी लहरों में गिरे हुए को भी मुझे पार लंघा ले। 1। हे प्रभू ! आप मेरे सिर पर रखवाला है इस लोक में। परलोक में मुझे आपका ही आसरा है।रहाउ। हे प्रभू ! आपके पैदा किए पदार्थों को (ये जीव) मेरु पर्वत समान समझते हैं।पर आपको।जो आप सब को पैदा करने वाला है।को एक तीले समान समझते हैं। हे प्रभू ! आप सबको दातें देने वाला है।सारी दुनिया आपके ही दर से माँगने वाली है।आप अपनी रजा में सबको दान देता है। 2। हे प्रभू ! आपके करिश्में हैरान कर देने वाले हैं।एक छिन में आप कुछ का कुछ बना देता है। हे अपहुँच ! हे बेअंत ! आप सबसे ऊँचा है। आप सुंदर है।आप बड़े जिगरे वाला है।आप सारे संसार में गुप्त बस रहा है। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जिन मनुष्यों ने आपका आसरा लिया।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।