बिनु गुर पूरे जनम मरणु न रहई फिरि आवत बारो बारा ॥ रहाउ ॥
ओहु जु भरमु भुलावा कहीअत तिन महि उरझिओ सगल संसारा ॥
पूरन भगतु पुरख सुआमी का सरब थोक ते निआरा ॥2॥
निंदउ नाही काहू बातै एहु खसम का कीआ ॥
जा कउ क्रिपा करी प्रभि मेरै मिलि साधसंगति नाउ लीआ ॥3॥
पारब्रहम परमेसुर सतिगुर सभना करत उधारा ॥
कहु नानक गुर बिनु नही तरीऐ इहु पूरन ततु बीचारा ॥4॥9॥
खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥
किलबिख काटे निमख अराधिआ गुरमुखि पारि उतारा ॥1॥
हरि रसु पीवहु पुरख गिआनी ॥
सुणि सुणि महा त्रिपति मनु पावै साधू अंम्रित बानी ॥ रहाउ ॥
मुकति भुगति जुगति सचु पाईऐ सरब सुखा का दाता ॥
अपुने दास कउ भगति दानु देवै पूरन पुरखु बिधाता ॥2॥
स्रवणी सुणीऐ रसना गाईऐ हिरदै धिआईऐ सोई ॥
करण कारण समरथ सुआमी जा ते ब्रिथा न कोई ॥3॥
वडै भागि रतन जनमु पाइआ करहु क्रिपा किरपाला ॥
साधसंगि नानकु गुण गावै सिमरै सदा गोुपाला ॥4॥10॥
करि इसनानु सिमरि प्रभु अपना मन तन भए अरोगा ॥
कोटि बिघन लाथे प्रभ सरणा प्रगटे भले संजोगा ॥1॥
प्रभ बाणी सबदु सुभाखिआ ॥
गावहु सुणहु पड़हु नित भाई गुर पूरै तू राखिआ ॥ रहाउ ॥
साचा साहिबु अमिति वडाई भगति वछल दइआला ॥
संता की पैज रखदा आइआ आदि बिरदु प्रतिपाला ॥2॥
हरि अंम्रित नामु भोजनु नित भुंचहु सरब वेला मुखि पावहु ॥
जरा मरा तापु सभु नाठा गुण गोबिंद नित गावहु ॥3॥
सुणी अरदासि सुआमी मेरै सरब कला बणि आई ॥
प्रगट भई सगले जुग अंतरि गुर नानक की वडिआई ॥4॥11॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥
सुणि मीता जीउ हमारा बलि बलि जासी हरि दरसनु देहु दिखाई ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! गुरू की शरण पड़ने से ही (मोह से) खलासी हो सकती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।