सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥
करण करावनहार सुआमी आपन हाथि संजोगी ॥1॥
मन मेरे जिनि अपुना भरमु गवाता ॥ तिस कै भाणै कोइ न भूला जिनि सगलो ब्रहमु पछाता ॥ रहाउ ॥
संत संगि जा का मनु सीतलु ओहु जाणै सगली ठांढी ॥
हउमै रोगि जा का मनु बिआपित ओहु जनमि मरै बिललाती ॥2॥
गिआन अंजनु जा की नेत्री पड़िआ ता कउ सरब प्रगासा ॥
अगिआनि अंधेरै सूझसि नाही बहुड़ि बहुड़ि भरमाता ॥3॥
सुणि बेनंती सुआमी अपुने नानकु इहु सुखु मागै ॥
जह कीरतनु तेरा साधू गावहि तह मेरा मनु लागै ॥4॥6॥
तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥
संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ सरब कुसल तब थीआ ॥1॥
संतन बिनु अवरु न दाता बीआ ॥
जो जो सरणि परै साधू की सो पारगरामी कीआ ॥ रहाउ ॥
कोटि पराध मिटहि जन सेवा हरि कीरतनु रसि गाईऐ ॥
ईहा सुखु आगै मुख ऊजल जन का संगु वडभागी पाईऐ ॥2॥
रसना एक अनेक गुण पूरन जन की केतक उपमा कहीऐ ॥
अगम अगोचर सद अबिनासी सरणि संतन की लहीऐ ॥3॥
निरगुन नीच अनाथ अपराधी ओट संतन की आही ॥
बूडत मोह ग्रिह अंध कूप महि नानक लेहु निबाही ॥4॥7॥
जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥
दास अपुने कउ तू विसरहि नाही चरण धूरि मनि भाई ॥1॥
तेरी अकथ कथा कथनु न जाई ॥
गुण निधान सुखदाते सुआमी सभ ते ऊच बडाई ॥ रहाउ ॥
सो सो करम करत है प्राणी जैसी तुम लिखि पाई ॥
सेवक कउ तुम सेवा दीनी दरसनु देखि अघाई ॥2॥
सरब निरंतरि तुमहि समाने जा कउ तुधु आपि बुझाई ॥
गुर परसादि मिटिओ अगिआना प्रगट भए सभ ठाई ॥3॥
सोई गिआनी सोई धिआनी सोई पुरखु सुभाई ॥
कहु नानक जिसु भए दइआला ता कउ मन ते बिसरि न जाई ॥4॥8॥
सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥
सुधु न होईऐ काहू जतना ओड़कि को न पहूचे ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मुझे नानक को पूरा गुरू मिल गया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।