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अंग 610

अंग
610
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक कउ गुरु पूरा भेटिओ सगले दूख बिनासे ॥4॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मुझे नानक को पूरा गुरू मिल गया है।मेरे सारे दुख दूर हो गए हैं। 4। 5।
सोरठि महला 5 ॥
सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥
करण करावनहार सुआमी आपन हाथि संजोगी ॥1॥
मन मेरे जिनि अपुना भरमु गवाता ॥ तिस कै भाणै कोइ न भूला जिनि सगलो ब्रहमु पछाता ॥ रहाउ ॥
संत संगि जा का मनु सीतलु ओहु जाणै सगली ठांढी ॥
हउमै रोगि जा का मनु बिआपित ओहु जनमि मरै बिललाती ॥2॥
गिआन अंजनु जा की नेत्री पड़िआ ता कउ सरब प्रगासा ॥
अगिआनि अंधेरै सूझसि नाही बहुड़ि बहुड़ि भरमाता ॥3॥
सुणि बेनंती सुआमी अपुने नानकु इहु सुखु मागै ॥
जह कीरतनु तेरा साधू गावहि तह मेरा मनु लागै ॥4॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! आत्मिक सुख मानने वाले को हरेक मनुष्य आत्मिक सुख भोगता हुआ दिखाई देता है।(विकारों के) रोग में फंसे हुए के ख्याल में सारी दुनिया ही विकारी है। (अपने अंदर से मेर-तेर गवा चुके मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) मालिक प्रभू ही सब कुछ करने की समर्था वाला है जीवों से करवाने की ताकत रखने वाला है।(जीवों के लिए आत्मिक सुख और आत्मिक दुख का) मेल उसने अपने हाथ में रखा हुआ है। 1। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने अपने अंदर से मेर-तेर गवा ली जिसने सब जीवों में परमात्मा बसता पहचान लिया। उसके ख्याल में कोई जीव गलत राह पर नहीं जा रहा।रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में रहके जिस मनुष्य का मन (विकारों की ओर से) शांत हो जाता है।वह सारी दुनिया को ही शांत-चित्त समझता है। पर जिस मनुष्य का मन अहंम्-रोग में फसा रहता है।वह सदा दुखी रहता है।वह (अहम् में) जनम ले के आत्मिक मौत सहता रहता है। 2। हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ का सुर्मा जिस मनुष्य की आँखों में पड़ जाता है।उसको आत्मिक जीवन की सारी समझ पड़ जाती है।पर। ज्ञान-हीन मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार में (सही जीवन के बारे में) कुछ नहीं सूझता।वह बार-बार भटकता रहता है। 3। हे मेरे मालिक ! (मेरी) विनती सुन (आपका दास) नानक (आपके दर से) ये सुख माँगता है (कि) जहाँ संत-जन आपकी सिफत-सालाह के गीत गाते हों।वहाँ मेरा मन लगा रहे। 4। 6।
सोरठि महला 5 ॥
तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥
संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ सरब कुसल तब थीआ ॥1॥
संतन बिनु अवरु न दाता बीआ ॥
जो जो सरणि परै साधू की सो पारगरामी कीआ ॥ रहाउ ॥
कोटि पराध मिटहि जन सेवा हरि कीरतनु रसि गाईऐ ॥
ईहा सुखु आगै मुख ऊजल जन का संगु वडभागी पाईऐ ॥2॥
रसना एक अनेक गुण पूरन जन की केतक उपमा कहीऐ ॥
अगम अगोचर सद अबिनासी सरणि संतन की लहीऐ ॥3॥
निरगुन नीच अनाथ अपराधी ओट संतन की आही ॥
बूडत मोह ग्रिह अंध कूप महि नानक लेहु निबाही ॥4॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जब कोई मनुष्य अपना शरीर अपना मन।अपना धन संत जनों के हवाले कर देता है (भाव।हरेक किस्म के अपनत्व को मिटा देता है)। और संतों की कृपा से परमात्मा का नाम सिमरन करने लग जाता है।तब उसको सारे (आत्मिक) सुख मिल जाते हैं। 1। हे भाई ! संत जनों के बिना परमात्मा के नाम की दाति देने वाला और कोई नहीं। जो जो मनुष्य गुरू की (संत जनों की) शरण पड़ता है।वह संसार-समुंद्र से पार लांघने के काबिल हो जाता है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के सेवक की (बताई) सेवा करने से करोड़ों पाप मिट जाते हैं।और प्रेम से परमात्मा की सिफत सालाह की जा सकती है। इस लोक में आत्मिक आनंद मिला रहता है।परलोक में भी सुर्खरू हो जाते हैं।पर।हे भाई ! प्रभू के सेवक की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है। 2। हे भाई ! (मेरी) एक जीभ है (संत जन) अनेकों गुणों से भरपूर होते हैं।संत जनों की वडिआई कितनी बताई जाए। संतों की शरण पड़ने से ही वह परमात्मा मिल सकता है जो कभी नाश होने वाला नहीं।जो अपहुँच है।जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 3। हे नानक ! (अरदास कर और कह) मैं गुण-हीन हूँ।नीच हूँ।निआसरा हूँ।विकारी हूँ।मैंने संतों का पल्ला पकड़ा है (हे संत जनो !) गृहस्त के मोह के अंधे कूएं में डूब रहे का साथ आखिर तक निभाओ। 4। 7।
सोरठि महला 5 घरु 1 ॥
जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥
दास अपुने कउ तू विसरहि नाही चरण धूरि मनि भाई ॥1॥
तेरी अकथ कथा कथनु न जाई ॥
गुण निधान सुखदाते सुआमी सभ ते ऊच बडाई ॥ रहाउ ॥
सो सो करम करत है प्राणी जैसी तुम लिखि पाई ॥
सेवक कउ तुम सेवा दीनी दरसनु देखि अघाई ॥2॥
सरब निरंतरि तुमहि समाने जा कउ तुधु आपि बुझाई ॥
गुर परसादि मिटिओ अगिआना प्रगट भए सभ ठाई ॥3॥
सोई गिआनी सोई धिआनी सोई पुरखु सुभाई ॥
कहु नानक जिसु भए दइआला ता कउ मन ते बिसरि न जाई ॥4॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 1 ॥ हे करतार ! जिस मनुष्य के हृदय में आप आ बसता है।उसकी आप हरेक आस पूरी कर देता है। अपने सेवक को आप कभी नहीं बिसारता (आपका सेवक आपको कभी नहीं भुलाता)।उसके मन को आपके चरणों की धूड़ प्यारी लगती है। 1। आप कैसा है।कितना बड़ा है, ये बयान नहीं किया जा सकता। हे सारे गुणों के खजाने ! हे सुख देने वाले मालिक ! आपकी वडिआई सबसे ऊँची है (आप सबसे बड़ा है)। रहाउ। हे प्रभू !) जीव वही वही कर्म करता है जैसी जैसी (आज्ञा) तूने (उसके माथे पर) लिख के रख दी है। अपने सेवक को तूने अपनी सेवा-भक्ति की दाति बख्शी हुई है।(वह सेवक) आपका दर्शन करके तृप्त हुआ रहता है। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप खुद समझ देता है उसको आप सारे ही जीवों में एक-रस समाया हुआ दिखता है। गुरू की कृपा से (उस मनुष्य के अंदर से) अज्ञानता (का अंधकार) मिट जाता है।उसकी शोभा हर जगह पसर जाती है। 3। हे नानक ! कह, वही मनुष्य ज्ञानवान है।वही मनुष्य सुरति अभ्यासी है।वही मनुष्य प्यार भरे स्वभाव वाला है। जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद दयावान होता है।उस मनुष्य को मन से परमात्मा कभी नहीं भूलता। 4। 8।
सोरठि महला 5 ॥
सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥
सुधु न होईऐ काहू जतना ओड़कि को न पहूचे ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! सारी दुनिया मोह में फंसी हुई है (इसके कारण) कभी (जीव) अहंकार में आ जाते हैं।कभी घबरा जाते हैं। अपने किसी प्रयत्न से (मोह की मैल से) पवित्र नहीं हुआ जा सकता।कोई भी मनुष्य (अपने प्रयत्नों से मोह के) उस पार नहीं पहुँच सकता। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मुझे नानक को पूरा गुरू मिल गया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।