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अंग 60

अंग
60
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मन रे किउ छूटहि बिनु पिआर ॥
गुरमुखि अंतरि रवि रहिआ बखसे भगति भंडार ॥1॥ रहाउ ॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर ॥
जिउ अधिकउ तिउ सुखु घणो मनि तनि सांति सरीर ॥
बिनु जल घड़ी न जीवई प्रभु जाणै अभ पीर ॥2॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह ॥
सर भरि थल हरीआवले इक बूंद न पवई केह ॥
करमि मिलै सो पाईऐ किरतु पइआ सिरि देह ॥3॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल दुध होइ ॥
आवटणु आपे खवै दुध कउ खपणि न देइ ॥
आपे मेलि विछुंनिआ सचि वडिआई देइ ॥4॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर ॥
खिनु पलु नीद न सोवई जाणै दूरि हजूरि ॥
मनमुखि सोझी ना पवै गुरमुखि सदा हजूरि ॥5॥
मनमुखि गणत गणावणी करता करे सु होइ ॥
ता की कीमति ना पवै जे लोचै सभु कोइ ॥
गुरमति होइ त पाईऐ सचि मिलै सुखु होइ ॥6॥
सचा नेहु न तुटई जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥
गिआन पदारथु पाईऐ त्रिभवण सोझी होइ ॥
निरमलु नामु न वीसरै जे गुण का गाहकु होइ ॥7॥
खेलि गए से पंखणूं जो चुगदे सर तलि ॥
घड़ी कि मुहति कि चलणा खेलणु अजु कि कलि ॥
जिसु तूं मेलहि सो मिलै जाइ सचा पिड़ु मलि ॥8॥
बिनु गुर प्रीति न ऊपजै हउमै मैलु न जाइ ॥
सोहं आपु पछाणीऐ सबदि भेदि पतीआइ ॥
गुरमुखि आपु पछाणीऐ अवर कि करे कराइ ॥9॥
मिलिआ का किआ मेलीऐ सबदि मिले पतीआइ ॥
मनमुखि सोझी ना पवै वीछुड़ि चोटा खाइ ॥
नानक दरु घरु एकु है अवरु न दूजी जाइ ॥10॥11॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हे मन ! (प्रभू के साथ) प्यार पाने के बगैर आप (माया के हमलों से) बच नहीं सकता। (पर, ये प्यार गुरू की शरण पड़े बगैर नहीं मिलता) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर (गुरू की कृपा से ऐसी प्यार-सांझ बनती है कि) परमात्मा हर वक्त मौजूद रहता है, गुरू उन्हें प्रभू भक्ति के खजाने ही बख्श देता है।1।रहाउ। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर, जैसा मछली का पानी के साथ है। पानी जितना ही बढ़ता है, मछली को उतना ही सुख आनंद मिलता है। उसके मन में तन में शरीर में ठंड पड़ती है। पानी के बगैर एक घड़ी भी जी नहीं सकती। मछली के दिल की यह वेदना परमात्मा (स्वयं) जानता है।1। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर, जैसा पपीहे का बरसात के साथ है। (पानी से) सरोवर भरे हुए होते हैं, धरती (पानी की बरकत से) हरी भरी हो जाती है। पर यदि (स्वाति नक्षत्र में पड़ी वर्षा की) एक बूँद (पपीहे के मुंह में) ना पड़े, तो उसको इस सारे पानी से कोई सरोकार नहीं। (पर, हे मन ! आपके भी क्या बस ! परमात्मा) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है, (नहीं तो) पूर्बला कमाया हुआ सिर पर शरीर पर झेलना ही पड़ता है।3। हे मन ! हरि के साथ ऐसा प्यार बना, जैसा पानी और दूध का है। (पानी दूध में आ मिलता है, दूध की शरण पड़ता है, (दूध उसकों अपना रूप बना लेता है। जब उस पानी मिले दूध को आग पर रखते हैं तो) उबाला (पानी) स्वयं ही बर्दाश्त करता है, दूध को जलने नहीं देता। (इसी तरह यदि जीव अपने आप को कुर्बान करे, तो प्रभू) विछुड़े जीवों कोअपने सदा स्थिर नाम में मिला के (लोक परलोक में) आदर सत्कार देता है।4। हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर, जैसा कि चकवी का (प्यार) सूरज से है। (जब सूरज डूब जाता है, चकवी की नजरों से परे हो जाता है, तो वह चकवी) एक छिन भर एक पल भर नींद (के बस में आ के) नहीं सोती, दूर (छुपे सूर्य) को अपने अंग-संग समझती है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है, उसको परमात्मा अपने अंग संग दिखाई देता है, पर अपने मन के पीछे चलने वाले को ये बात समझ नहीं आती।5। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपनी ही प्रशंसा करता रहता है (पर जीव के भी क्या वश?) वही कुछ होता है जो करतार (स्वयं) करता (कराता) है। (करतार की मेहर के बिनां) यदि कोई जीव (अपनी उस्ततें छोड़ने का प्रयत्न भी करे, और परमात्मा के गुणों की कद्र पहचानने का उद्यम करे, तो भी) उस प्रभू के गुणों की कद्र नहीं पड़ सकती। (परमात्मा के गुणों की कद्र) तभी पड़ती है, जब गुरू की शिक्षा प्राप्त हो। (गुरू की मति मिलने से ही मनुष्य प्रभू के सदा स्थिर नाम में जुड़ता है और आत्मिक आनंद का सुख पाता है।6। (प्रभू चरणों में जोड़ने वाला) यदि वह गुरू मिल जाए, तो (उसकी मेहर के सदका प्रभू के साथ ऐसा) पक्का प्यार (पड़ता है जो कभी भी) टूटता नहीं। (गुरू की कृपा से) परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने वाला नाम पदार्थ मिलता है। ये समझ भी पड़ती है कि प्रभू तीनों भवनों में मौजूद है। यदि मनुष्य (गुरू की मेहर सदका) परमात्मा के गुणों (के सौदे) को खरीदने वाला बन जाए, तो इस को प्रभू का पवित्र नाम (फिर कभी) नहीं भूलता।7। (हे मन ! देख) जो जीव पंछी इस (संसार) सरोवर पर (चोगा) चुगते हैं वह (आपो अपनी जीवन) खेल खेलकर चले जाते हैं। हरेक जीव पंछी ने घड़ी पल की खेल खेलके यहाँ से चले जाना है। यह, खेल एक-दो दिनों में ही (जल्दी ही) खत्म हो जाती है। (हे मन ! प्रभू के दर पे सदा अरदास कर और कह, हे प्रभू !) जिसको आप खुद मिलाता है, वही आपके चरणों में जुड़ता है। वह यहां से सच्ची जीवन बाजी जीत के जाता है।8। गुरू (की शरण पड़े) बिनां (प्रभू चरणों में) प्रीत पैदा नहीं होती (क्योंकि मनुष्य के अपने प्रयास से ही मन में से) अहंकार की मैल दूर हो सकती है। जब मनुष्य का मन गुरू के शबद में भेदा जाता है, गुरू के शबद में पतीज जाता है, तब ये पता चलता है कि मेरा और प्रभू का स्वभाव मेल खाता है या नहीं। गुरू की शरण पड़ के ही मनुष्य अपने आप को (अपनी असलियत को) पहचानता है। (गुरू की शरण के बिनां) जीव अन्य कोई प्रयासा कर करा नहीं सकता।9। जो जीव गुरू के शबद में पतीज के प्रभू चरणों में मिलते हैं, उनके अंदर कोई ऐसा विछोड़ा नहीं रह जाता जिसको दूर करके उन्हें पुनः प्रभू से जोड़ा जाए। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे कोये समझ नहीं पड़ती, वह प्रभू चरणों से विछुड़ के (माया के मोह की) चोटें खाता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू चरणों में मिल गया है उसका प्रभू ही एक आसरा दृढ़ (दिखता) है। प्रभू के बिना उसे और कोई सहारा नहीं (दिखाई देता) अन्य कोई जगह नहीं दिखती।10।11।
सिरीरागु महला 1 ॥
मनमुखि भुलै भुलाईऐ भूली ठउर न काइ ॥
गुर बिनु को न दिखावई अंधी आवै जाइ ॥
गिआन पदारथु खोइआ ठगिआ मुठा जाइ ॥1॥
बाबा माइआ भरमि भुलाइ ॥
भरमि भुली डोहागणी ना पिर अंकि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
भूली फिरै दिसंतरी भूली ग्रिहु तजि जाइ ॥
भूली डूंगरि थलि चड़ै भरमै मनु डोलाइ ॥
धुरहु विछुंनी किउ मिलै गरबि मुठी बिललाइ ॥2॥
विछुड़िआ गुरु मेलसी हरि रसि नाम पिआरि ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाली स्त्री (जीवन के) सही रास्ते से भटक जाती है, माया उसे गलत रास्ते पे डाल देती है। राह से भटकी हुई (गुरू के बिना) कोइ (ऐसा) स्थान नहीं मिलता (जो उसको रास्ता दिखा दे)। गुरू के बिना और कोई भी (सही रास्ता) दिख नहीं सकता। (माया में) अंधी हुई जीव स्त्री भटकती फिरती है। जिस भी जीव ने (माया के प्रलोभन में फस के) परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा करने वाले नाम-धन को गवा लिया है, वह ठगा जाता है, वह (आत्मिक जीवन की ओर से) लूटा जाता है।1। हे भाई ! माया (जीवों को) छलावे में डाल के गलत रास्ते पे डाल देती है। जो भाग्यहीन जीव स्त्री भुलावे में पड़कर गलत रास्ते पड़ जाती है, वह (कभी भी) प्रभू पति के चरणों में लीन नहीं हो सकती।1।रहाउ। जीवन के राह से भटकी हुई जीव स्त्री गृहस्थ त्याग के देस-देसांतरों में घूमती फिरती है। भटकी हुई कभी किसी पहाड़ (की गुफा) में बैठती है कभी किसी टीले पे चढ़ बैठती है। भटकती फिरती है, उसका मन (माया के असर में) डोलता है। (अपने किए कर्मों के कारण) धर से ही प्रभू के हुकम अनुसार विछुड़ी हुई (प्रभू चरणों में) जुड़ नहीं सकती। वह तो (त्याग आदि के) अहंकार आदि में लूटी जा रही है, और (विछोड़े में) तड़पती है।2। प्रभू से विछुड़ों को गुरू हरि नाम के आनंद में जोड़ के, नाम के प्यार में जोड़ के (पुनः प्रभू के साथ) मिलाता है।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! (प्रभू के साथ) प्यार पाने के बगैर आप (माया के हमलों से) बच नहीं सकता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।