अंग
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सोरठ
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रतनु लुकाइआ लूकै नाही जे को रखै लुकाई ॥4॥
रतनु लुकाइआ लूकै नाही जे को रखै लुकाई ॥4॥
सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥
जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥5॥9॥
सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥
जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥5॥9॥
हिन्दी अर्थ: (हाँ अगर किसी को ये नाम-रत्न हासिल हो जाए।तो) अगर वह मनुष्य (इस रत्न को अपने अंदर) छुपा के रखना चाहे।तो छुपाने से ये रत्न नहीं छुपता (उसके आत्मिक जीवन से रत्न-प्राप्ति के लक्षण दिख पड़ते हैं)। 4। हे प्रभू ! ये सारा जगत आपका ही बनाया हुआ है।आप सब जीवों के दिल की जानने वाले हैं।आप सबकी सार लेने वाले मालिक हैं। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) वही मनुष्य आपका नाम हासिल कर सकता है जिसको आप ये दाति बख्शते हैं।और कोई भी ऐसा जीव नहीं (जो आपकी कृपा के बिना आपका नाम प्राप्त कर सके)। 5। 9।
किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥
सोरठि महला 5 घरु 1 तितुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥
जो जो दीसै वडा वडेरा सो सो खाकू रलसी ॥
निरभउ निरंकारु भव खंडनु सभि सुख नव निधि देसी ॥1॥
हरि जीउ तेरी दाती राजा ॥
माणसु बपुड़ा किआ सालाही किआ तिस का मुहताजा ॥ रहाउ ॥
जिनि हरि धिआइआ सभु किछु तिस का तिस की भूख गवाई ॥
ऐसा धनु दीआ सुखदातै निखुटि न कब ही जाई ॥
अनदु भइआ सुख सहजि समाणे सतिगुरि मेलि मिलाई ॥2॥
मन नामु जपि नामु आराधि अनदिनु नामु वखाणी ॥
उपदेसु सुणि साध संतन का सभ चूकी काणि जमाणी ॥
जिन कउ क्रिपालु होआ प्रभु मेरा से लागे गुर की बाणी ॥3॥
कीमति कउणु करै प्रभ तेरी तू सरब जीआ दइआला ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै किआ हम बाल गुपाला ॥
राखि लेहु नानकु जनु तुमरा जिउ पिता पूत किरपाला ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥
जो जो दीसै वडा वडेरा सो सो खाकू रलसी ॥
निरभउ निरंकारु भव खंडनु सभि सुख नव निधि देसी ॥1॥
हरि जीउ तेरी दाती राजा ॥
माणसु बपुड़ा किआ सालाही किआ तिस का मुहताजा ॥ रहाउ ॥
जिनि हरि धिआइआ सभु किछु तिस का तिस की भूख गवाई ॥
ऐसा धनु दीआ सुखदातै निखुटि न कब ही जाई ॥
अनदु भइआ सुख सहजि समाणे सतिगुरि मेलि मिलाई ॥2॥
मन नामु जपि नामु आराधि अनदिनु नामु वखाणी ॥
उपदेसु सुणि साध संतन का सभ चूकी काणि जमाणी ॥
जिन कउ क्रिपालु होआ प्रभु मेरा से लागे गुर की बाणी ॥3॥
कीमति कउणु करै प्रभ तेरी तू सरब जीआ दइआला ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै किआ हम बाल गुपाला ॥
राखि लेहु नानकु जनु तुमरा जिउ पिता पूत किरपाला ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 1 तितुके ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जब सब जीवों को ईश्वर ने ही पैदा किया हुआ है तो फिर उसके अलावा मैं किससे मॉगूं? किसकी आराधना करूँ ? जो भी कोई बड़ा अथवा धनाढ मनुष्य दिखाई देता है।हरेक ने (मर के) मिट्टी में मिल जाना है (एक परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला दाता है)। हे भाई ! सारे सुख और जगत के सारे नौ खजाने वह निरंकार ही देने वाला है जिसको किसी का डर नहीं।और।जो सब जीवों का जनम-मरण व नाश करने वाला है। 1। हे प्रभू जी ! मैं आपकी (दी हुई) दातों से (ही) तृप्त हो सकता हूँ। मैं किसी विचारे मनुष्य की उपमा क्यों करता फिरूँ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की भक्ति शुरू कर दी।जगत की हरेक चीज ही उसकी बन जाती है।परमात्मा उसके अंदर से (माया की) भूख दूर कर देता है। सुखदाते प्रभू ने उसको ऐसा (नाम-) धन दे दिया है जो (उसके पास से) कभी खत्म नहीं होता। गुरू ने उस परमात्मा के चरणों में (जब) मिला दिया।तो आत्मिक अडोलता के कारण उसके अंदर आनंद के सारे सुख आ बसते हैं। 2। हे (मेरे) मन ! हर समय परमात्मा का नाम जपा कर।सिमरा कर।उचारा कर। संत जनों का उपदेश सुन के जमों की भी सारी मुथाजी (गुलामी) खत्म हो जाती है। (पर। हे मन !) सतिगुरू की बाणी में वही मनुष्य सुरति जोड़ते हैं।जिन पर प्यारा प्रभू स्वयं दयावान होता है। 3। हे प्रभू ! आपकी (मेहर की) कीमत कौन पा सकता है।आप सारे ही जीवों पर मेहर करने वाले हैं। हे गोपाल प्रभू ! हम जीवों की क्या बिसात है।जगत में हरेक काम आपका ही किया हुआ होता है। हे प्रभू ! नानक आपका दास है।(इस दास की) रक्षा उसी तरह करता रह।जैसे पिता अपने पुत्रों पर कृपालु हो के करता है। 4। 1।
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥
सोरठि महला 5 घरु 1 चौतुके ॥
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥
साचा साहिबु मनि वसै भाई एहा करणी सार ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै भाई से तन होए छार ॥
साधसंगति कउ वारिआ भाई जिन एकंकार अधार ॥1॥
सोई सचु अराधणा भाई जिस ते सभु किछु होइ ॥
गुरि पूरै जाणाइआ भाई तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ रहाउ ॥
नाम विहूणे पचि मुए भाई गणत न जाइ गणी ॥
विणु सच सोच न पाईऐ भाई साचा अगम धणी ॥
आवण जाणु न चुकई भाई झूठी दुनी मणी ॥
गुरमुखि कोटि उधारदा भाई दे नावै एक कणी ॥2॥
सिंम्रिति सासत सोधिआ भाई विणु सतिगुर भरमु न जाइ ॥
अनिक करम करि थाकिआ भाई फिरि फिरि बंधन पाइ ॥
चारे कुंडा सोधीआ भाई विणु सतिगुर नाही जाइ ॥
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥
साचा साहिबु मनि वसै भाई एहा करणी सार ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै भाई से तन होए छार ॥
साधसंगति कउ वारिआ भाई जिन एकंकार अधार ॥1॥
सोई सचु अराधणा भाई जिस ते सभु किछु होइ ॥
गुरि पूरै जाणाइआ भाई तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ रहाउ ॥
नाम विहूणे पचि मुए भाई गणत न जाइ गणी ॥
विणु सच सोच न पाईऐ भाई साचा अगम धणी ॥
आवण जाणु न चुकई भाई झूठी दुनी मणी ॥
गुरमुखि कोटि उधारदा भाई दे नावै एक कणी ॥2॥
सिंम्रिति सासत सोधिआ भाई विणु सतिगुर भरमु न जाइ ॥
अनिक करम करि थाकिआ भाई फिरि फिरि बंधन पाइ ॥
चारे कुंडा सोधीआ भाई विणु सतिगुर नाही जाइ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 1 चौतुके ॥ हे भाई ! मन में।तन में।हृदय में (प्रभू को) टिका के उस सबसे बड़े गोबिंद की सिफत सालाह करनी चाहिए। मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है ही ये कि सदा कायम रहने वाला मालिक प्रभू (मनुष्य के) मन में बसा रहे। हे भाई ! जिस जिस शरीर में परमात्मा का नाम प्रगट नहीं होता वे सारे शरीर व्यर्थ गए समझो। हे भाई ! (मैं तो) उन गुरमुखों की संगति से कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने एक परमात्मा (के नाम को जिंदगी) का आसरा (बनाया हुआ) है। 1। हे भाई ! उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की ही आराधना करनी चाहिए।जिससे (जगत की) हरेक चीज अस्तित्व में आई है। हे भाई ! पूरे गुरू ने (मुझे ये) समझ दी है कि उस (परमात्मा) के बिना और कोई (पूजने योग्य) नहीं।रहाउ। हे भाई ! उन मनुष्यों की गिनती नहीं की जा सकती।जो परमात्मा के नाम से वंचित रह के (माया के मोह में) उलझ के आत्मिक मौत मरते रहते हैं। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू (के नाम) के बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं हो सकती।वह सदा स्थिर अपहुँच मालिक ही (पवित्रता का श्रोत है)। हे भाई ! (प्रभू के नाम के बिना) जनम-मरण (का चक्कर) खत्म नहीं होता।दुनिया के पदार्थों का घमण्ड झूठा है (ये गुमान तो ले डूबता है।जनम-मरण में डाले रखता है)। (दूसरी तरफ) हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है।वह हरी नाम का एक कण-मात्र ही दे के करोड़ों को (जनम-मरण के चक्कर में से) बचा लेता है। 2। हे भाई ! स्मृतियां-शास्त्र विचार के देखे हैं (उनसे भी कुछ प्राप्त नहीं होता)।गुरू के बिना (किसी और से) भटकना दूर नहीं हो सकती। हे भाई ! (शास्त्रों द्वारा बताए हुए) अनेकों कर्म कर-करके मनुष्य थक जाता है।(बल्कि) बार-बार बंधन ही सहेड़ता है। हे भाई ! सारा जगत तलाश के देख लिया है (भटकना दूर करने के लिए) गुरू के बिना और कोई जगह नहीं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६०८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।