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अंग 608

अंग
608
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रतनु लुकाइआ लूकै नाही जे को रखै लुकाई ॥4॥
सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥
जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥5॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हाँ अगर किसी को ये नाम-रत्न हासिल हो जाए।तो) अगर वह मनुष्य (इस रत्न को अपने अंदर) छुपा के रखना चाहे।तो छुपाने से ये रत्न नहीं छुपता (उसके आत्मिक जीवन से रत्न-प्राप्ति के लक्षण दिख पड़ते हैं)। 4। हे प्रभू ! ये सारा जगत आपका ही बनाया हुआ है।आप सब जीवों के दिल की जानने वाला है।आप सबकी सार लेने वाला मालिक है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) वही मनुष्य आपका नाम हासिल कर सकता है जिसको आप ये दाति बख्शता है।और कोई भी ऐसा जीव नहीं (जो आपकी कृपा के बिना आपका नाम प्राप्त कर सके)। 5। 9।
सोरठि महला 5 घरु 1 तितुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥
जो जो दीसै वडा वडेरा सो सो खाकू रलसी ॥
निरभउ निरंकारु भव खंडनु सभि सुख नव निधि देसी ॥1॥
हरि जीउ तेरी दाती राजा ॥
माणसु बपुड़ा किआ सालाही किआ तिस का मुहताजा ॥ रहाउ ॥
जिनि हरि धिआइआ सभु किछु तिस का तिस की भूख गवाई ॥
ऐसा धनु दीआ सुखदातै निखुटि न कब ही जाई ॥
अनदु भइआ सुख सहजि समाणे सतिगुरि मेलि मिलाई ॥2॥
मन नामु जपि नामु आराधि अनदिनु नामु वखाणी ॥
उपदेसु सुणि साध संतन का सभ चूकी काणि जमाणी ॥
जिन कउ क्रिपालु होआ प्रभु मेरा से लागे गुर की बाणी ॥3॥
कीमति कउणु करै प्रभ तेरी तू सरब जीआ दइआला ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै किआ हम बाल गुपाला ॥
राखि लेहु नानकु जनु तुमरा जिउ पिता पूत किरपाला ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 1 तितुके ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जब सब जीवों को ईश्वर ने ही पैदा किया हुआ है तो फिर उसके अलावा मैं किससे मॉगूं? किसकी आराधना करूँ ? जो भी कोई बड़ा अथवा धनाढ मनुष्य दिखाई देता है।हरेक ने (मर के) मिट्टी में मिल जाना है (एक परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला दाता है)। हे भाई ! सारे सुख और जगत के सारे नौ खजाने वह निरंकार ही देने वाला है जिसको किसी का डर नहीं।और।जो सब जीवों का जनम-मरण व नाश करने वाला है। 1। हे प्रभू जी ! मैं आपकी (दी हुई) दातों से (ही) तृप्त हैं सकता हूँ। मैं किसी विचारे मनुष्य की उपमा क्यों करता फिरूँ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की भक्ति शुरू कर दी।जगत की हरेक चीज ही उसकी बन जाती है।परमात्मा उसके अंदर से (माया की) भूख दूर कर देता है। सुखदाते प्रभू ने उसको ऐसा (नाम-) धन दे दिया है जो (उसके पास से) कभी खत्म नहीं होता। गुरू ने उस परमात्मा के चरणों में (जब) मिला दिया।तो आत्मिक अडोलता के कारण उसके अंदर आनंद के सारे सुख आ बसते हैं। 2। हे (मेरे) मन ! हर समय परमात्मा का नाम जपा कर।सिमरा कर।उचारा कर। संत जनों का उपदेश सुन के जमों की भी सारी मुथाजी (गुलामी) खत्म हो जाती है। (पर। हे मन !) सतिगुरू की बाणी में वही मनुष्य सुरति जोड़ते हैं।जिन पर प्यारा प्रभू आप दयावान होता है। 3। हे प्रभू ! आपकी (मेहर की) कीमत कौन पा सकता है।आप सारे ही जीवों पर मेहर करने वाला है। हे गोपाल प्रभू ! हम जीवों की क्या बिसात है।जगत में हरेक काम आपका ही किया हुआ होता है। हे प्रभू ! नानक आपका दास है।(इस दास की) रक्षा उसी तरह करता रह।जैसे पिता अपने पुत्रों पर कृपालु हैं के करता है। 4। 1।
सोरठि महला 5 घरु 1 चौतुके ॥
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥
साचा साहिबु मनि वसै भाई एहा करणी सार ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै भाई से तन होए छार ॥
साधसंगति कउ वारिआ भाई जिन एकंकार अधार ॥1॥
सोई सचु अराधणा भाई जिस ते सभु किछु होइ ॥
गुरि पूरै जाणाइआ भाई तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ रहाउ ॥
नाम विहूणे पचि मुए भाई गणत न जाइ गणी ॥
विणु सच सोच न पाईऐ भाई साचा अगम धणी ॥
आवण जाणु न चुकई भाई झूठी दुनी मणी ॥
गुरमुखि कोटि उधारदा भाई दे नावै एक कणी ॥2॥
सिंम्रिति सासत सोधिआ भाई विणु सतिगुर भरमु न जाइ ॥
अनिक करम करि थाकिआ भाई फिरि फिरि बंधन पाइ ॥
चारे कुंडा सोधीआ भाई विणु सतिगुर नाही जाइ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 1 चौतुके ॥ हे भाई ! मन में।तन में।हृदय में (प्रभू को) टिका के उस सबसे बड़े गोबिंद की सिफत सालाह करनी चाहिए। मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है ही ये कि सदा कायम रहने वाला मालिक प्रभू (मनुष्य के) मन में बसा रहे। हे भाई ! जिस जिस शरीर में परमात्मा का नाम प्रगट नहीं होता वे सारे शरीर व्यर्थ गए समझो। हे भाई ! (मैं तो) उन गुरमुखों की संगति से कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने एक परमात्मा (के नाम को जिंदगी) का आसरा (बनाया हुआ) है। 1। हे भाई ! उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की ही आराधना करनी चाहिए।जिससे (जगत की) हरेक चीज अस्तित्व में आई है। हे भाई ! पूरे गुरू ने (मुझे ये) समझ दी है कि उस (परमात्मा) के बिना और कोई (पूजने योग्य) नहीं।रहाउ। हे भाई ! उन मनुष्यों की गिनती नहीं की जा सकती।जो परमात्मा के नाम से वंचित रह के (माया के मोह में) उलझ के आत्मिक मौत मरते रहते हैं। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू (के नाम) के बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं हो सकती।वह सदा स्थिर अपहुँच मालिक ही (पवित्रता का श्रोत है)। हे भाई ! (प्रभू के नाम के बिना) जनम-मरण (का चक्कर) खत्म नहीं होता।दुनिया के पदार्थों का घमण्ड झूठा है (ये गुमान तो ले डूबता है।जनम-मरण में डाले रखता है)। (दूसरी तरफ) हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है।वह हरी नाम का एक कण-मात्र ही दे के करोड़ों को (जनम-मरण के चक्कर में से) बचा लेता है। 2। हे भाई ! स्मृतियां-शास्त्र विचार के देखे हैं (उनसे भी कुछ प्राप्त नहीं होता)।गुरू के बिना (किसी और से) भटकना दूर नहीं हो सकती। हे भाई ! (शास्त्रों द्वारा बताए हुए) अनेकों कर्म कर-करके मनुष्य थक जाता है।(बल्कि) बार-बार बंधन ही सहेड़ता है। हे भाई ! सारा जगत तलाश के देख लिया है (भटकना दूर करने के लिए) गुरू के बिना और कोई जगह नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हाँ अगर किसी को ये नाम-रत्न हासिल हो जाए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।