सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥
जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥5॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥
जो जो दीसै वडा वडेरा सो सो खाकू रलसी ॥
निरभउ निरंकारु भव खंडनु सभि सुख नव निधि देसी ॥1॥
हरि जीउ तेरी दाती राजा ॥
माणसु बपुड़ा किआ सालाही किआ तिस का मुहताजा ॥ रहाउ ॥
जिनि हरि धिआइआ सभु किछु तिस का तिस की भूख गवाई ॥
ऐसा धनु दीआ सुखदातै निखुटि न कब ही जाई ॥
अनदु भइआ सुख सहजि समाणे सतिगुरि मेलि मिलाई ॥2॥
मन नामु जपि नामु आराधि अनदिनु नामु वखाणी ॥
उपदेसु सुणि साध संतन का सभ चूकी काणि जमाणी ॥
जिन कउ क्रिपालु होआ प्रभु मेरा से लागे गुर की बाणी ॥3॥
कीमति कउणु करै प्रभ तेरी तू सरब जीआ दइआला ॥
सभु किछु कीता तेरा वरतै किआ हम बाल गुपाला ॥
राखि लेहु नानकु जनु तुमरा जिउ पिता पूत किरपाला ॥4॥1॥
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥
साचा साहिबु मनि वसै भाई एहा करणी सार ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै भाई से तन होए छार ॥
साधसंगति कउ वारिआ भाई जिन एकंकार अधार ॥1॥
सोई सचु अराधणा भाई जिस ते सभु किछु होइ ॥
गुरि पूरै जाणाइआ भाई तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ रहाउ ॥
नाम विहूणे पचि मुए भाई गणत न जाइ गणी ॥
विणु सच सोच न पाईऐ भाई साचा अगम धणी ॥
आवण जाणु न चुकई भाई झूठी दुनी मणी ॥
गुरमुखि कोटि उधारदा भाई दे नावै एक कणी ॥2॥
सिंम्रिति सासत सोधिआ भाई विणु सतिगुर भरमु न जाइ ॥
अनिक करम करि थाकिआ भाई फिरि फिरि बंधन पाइ ॥
चारे कुंडा सोधीआ भाई विणु सतिगुर नाही जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हाँ अगर किसी को ये नाम-रत्न हासिल हो जाए।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।