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अंग 607

अंग
607
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गलि जेवड़ी आपे पाइदा पिआरा जिउ प्रभु खिंचै तिउ जाहा ॥
जो गरबै सो पचसी पिआरे जपि नानक भगति समाहा ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं ही (सब जीवों के) गले में रस्सी डाले रखता है।जैसे प्रभू (उस रस्सी को) खींचता है वैसे ही जीव (जीवन-राह पर) चलते हैं। हे नानक ! (कह) हे पयारे सज्जन ! जो मनुष्य (अपने किसी बल आदि का) अहंकार करता है वह तबाह हो जाता है (आत्मिक मौत सहेड़ लेता है)।हे भाई ! परमात्मा का नाम जपा कर।उसकी भक्ति में लीन रहा कर। 4। 6।
सोरठि मः 4 दुतुके ॥
अनिक जनम विछुड़े दुखु पाइआ मनमुखि करम करै अहंकारी ॥
साधू परसत ही प्रभु पाइआ गोबिद सरणि तुमारी ॥1॥
गोबिद प्रीति लगी अति पिआरी ॥
जब सतसंग भए साधू जन हिरदै मिलिआ सांति मुरारी ॥ रहाउ ॥
तू हिरदै गुपतु वसहि दिनु राती तेरा भाउ न बुझहि गवारी ॥
सतिगुरु पुरखु मिलिआ प्रभु प्रगटिआ गुण गावै गुण वीचारी ॥2॥
गुरमुखि प्रगासु भइआ साति आई दुरमति बुधि निवारी ॥
आतम ब्रहमु चीनि सुखु पाइआ सतसंगति पुरख तुमारी ॥3॥
पुरखै पुरखु मिलिआ गुरु पाइआ जिन कउ किरपा भई तुमारी ॥
नानक अतुलु सहज सुखु पाइआ अनदिनु जागतु रहै बनवारी ॥4॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि मः 4 दुतुके ॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अनेको जन्मों से (परमात्मा से) विछुड़ा हुआ दुख सहता चला आता है।(इस जन्म में भी अपने मन का मुरीद रह के) अहंकार के आसरे ही कर्म करता रहता है। (पर) गुरू के चरण छूते ही उसे परमात्मा मिल जाता है।हे गोबिंद ! (गुरू की शरण की बरकति से) वह आपकी शरण आ पड़ता है। 1। तब परमात्मा के साथ उसकी बड़ी गहरी प्रीति बन जाती है, जब (किसी भाग्यशाली मनुष्य को) भले मनुष्यों वाली संगति प्राप्त होती है।उसे अपने हृदय में शांति देने वाला परमात्मा आ मिलता है। रहाउ। हे प्रभू ! आप हर वक्त सब जीवों के हृदय में छुपा हुआ टिका रहता है।मूर्ख मनुष्य आपके साथ प्यार (के महत्व) को नहीं समझते। (हे भाई !) जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक प्रभू का रूप गुरू मिल जाता है उसके अंदर परमात्मा प्रगट हो जाता है।वह मनुष्य परमात्मा के गुणों में सुरति जोड़ के गुण गाता रहता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है उसके अंदर (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है।उसके अंदर ठंड पड़ जाती है।वह मनुष्य अपने अंदर से बुरी मति वाली मति दूर कर लेता है (ये दुर्मति ही विकारों की सड़न पैदा कर रही थी)। वह मनुष्य अपने अंदर परमात्मा को बसता पहचान के आत्मिक आनंद प्राप्त कर लेता है।हे सर्व-व्यापक प्रभू ! ये आपकी साध-संगति की ही बरकति है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है उस मनुष्य को सर्व-व्यापक परमात्मा मिल जाता है।(पर।हे प्रभू ! गुरू भी उनको ही मिलता है) जिन पर आपकी कृपा होती है। हे नानक ! (ऐसा मनुष्य) आत्मिक अडोलता में बहुत सारा सुख पाता है।वह हर वक्त परमात्मा (की याद) में लीन रह के (विकारों से) सचेत रहता है। 4। 7।
सोरठि महला 4 ॥
हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥
जिउ मछुली बिनु नीरै बिनसै तिउ नामै बिनु मरि जाई ॥1॥
मेरे प्रभ किरपा जलु देवहु हरि नाई ॥
हउ अंतरि नामु मंगा दिनु राती नामे ही सांति पाई ॥ रहाउ ॥
जिउ चात्रिकु जल बिनु बिललावै बिनु जल पिआस न जाई ॥
गुरमुखि जलु पावै सुख सहजे हरिआ भाइ सुभाई ॥2॥
मनमुख भूखे दह दिस डोलहि बिनु नावै दुखु पाई ॥
जनमि मरै फिरि जोनी आवै दरगहि मिलै सजाई ॥3॥
क्रिपा करहि ता हरि गुण गावह हरि रसु अंतरि पाई ॥
नानक दीन दइआल भए है त्रिसना सबदि बुझाई ॥4॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा के साथ प्यार से जिस मनुष्य का हृदय जिस मनुष्य का मन भेदा जाता है।वह परमात्मा (की याद) के बिना नहीं रह सकता। जैसे पानी के बिना मछली मर जाती है।वैसे ही वह मनुष्य प्रभू के नाम के बिना अपनी आत्मिक मौत आ गई समझता है। 1। हे मेरे प्रभू ! (मुझे अपनी) मेहर का जल दे।हे हरी ! मुझे अपनी सिफत सालाह की दाति दे। मैं अपने हृदय में दिन-रात आपका (ही) नाम मांगता हूँ (क्योंकि आपके) नाम में जुड़ने से आत्मिक ठण्ड प्रापत हैं सकती है।रहाउ। हे भाई ! जैसे बरखा जल के बिना पपीहा बिलखता है।बरखा की बूँद के बिना उसकी प्यास नहीं बुझती। वैसे ही जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब वह प्रभू की बरकति से आत्मिक जीवन वाला बनता है जब वह आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक आनंद देने वाला नाम-जल (गुरू से) हासिल करता है। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भूख के मारे हुए दसो-दिशाओं में डोलते फिरते हैं।मन का मुरीद मनुष्य परमात्मा के नाम से टूट के दुख पाता रहता है। वह पैदा होता है मरता है।बार-बार जूनियों में पड़ा रहता है।परमात्मा की दरगाह में उसको (ये) सजा मिलती है। 3। हे हरी ! अगर आप (स्वयं) मेहर करे।तो ही हम जीव आपकी सिफत सालाह के गीत गा सकते हैं।(जिस पर मेहर हैं।वही मनुष्य) अपने हृदय में हरी नाम का स्वाद अनुभव करता है। हे नानक ! दीनों पर दया करने वाला प्रभू जिस मनुष्य पर प्रसन्न होता है।गुरू के शबद के द्वारा उसकी (माया की) प्यास बुझा देता है। 4। 8।
सोरठि महला 4 पंचपदा ॥
अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥
प्रेम के सर लागे तन भीतरि ता भ्रमु काटिआ जाई ॥1॥
मेरे गोबिद अपुने जन कउ देहि वडिआई ॥
गुरमति राम नामु परगासहु सदा रहहु सरणाई ॥ रहाउ ॥
इहु संसारु सभु आवण जाणा मन मूरख चेति अजाणा ॥
हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु ता हरि नामि समाणा ॥2॥
जिस की वथु सोई प्रभु जाणै जिस नो देइ सु पाए ॥ वसतु अनूप अति अगम अगोचर गुरु पूरा अलखु लखाए ॥3॥
जिनि इह चाखी सोई जाणै गूंगे की मिठिआई ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 पंचपदा ॥ (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जब) मनुष्य इस अजीत मन को जीत लेता है।तब (जीवन-संग्राम में इसको) कामयाबी हो जाती है। (इस) कामयाबी से (मनुष्य को) ये समझ आ जाती है (कि) परमात्मा के प्यार के तीर (इसके) हृदय में भेदे जाते हैं।तब (इसके मन की) भटकना (सदा के लिए) कट जाती है। 1। हे मेरे गोबिंद ! (मुझे) अपने दास को (ये) आदर दे (कि) गुरू की मति से (मेरे अंदर) अपना नाम प्रगट कर दे। (मुझे) सदा अपनी शरण में रख।रहाउ। हे मूर्ख अंजान मन ! ये जगत (का मोह) जनम-मरण (का कारण बना रहता) है।(इससे बचने के लिए परमात्मा का नाम) सिमरता रह। हे हरी ! (मेरे पर) मेहर कर।मुझे गुरू मिला।तभी आपके नाम में लीनता हैं सकती है। 2। हे भाई ! ये नाम-वस्तु जिस (परमात्मा) की (मल्कियत) है।वही जानता है (कि ये वस्तु किसे देनी है)।जिस जीव को प्रभू ये दाति देता है वही ले सकता है। ये वस्तु ऐसी सुंदर है कि जगत में इस जैसी और कोई नहीं।(किसी चतुराई समझदारी से) इस तक पहुँच नहीं हो सकती।मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की भी इस तक पहुँच नहीं।(अगर) पूरा गुरू (मिल जाए।तो वही) अदृश्य प्रभू के दीदार करवा सकता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने ये नाम-वस्तु चखी है (इसका स्वाद) वही जानता है।(वह बयान नहीं कर सकता।जैसे) गूँगे की (खाई) मिठाई (का स्वाद) गूँगा बता नहीं सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू स्वयं ही (सब जीवों के) गले में रस्सी डाले रखता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।