आपे ही आपि वरतदा पिआरा भै अगनि न सकै जलाइआ ॥
आपे मारि जीवाइदा पिआरा साह लैदे सभि लवाइआ ॥3॥
आपे ताणु दीबाणु है पिआरा आपे कारै लाइआ ॥
जिउ आपि चलाए तिउ चलीऐ पिआरे जिउ हरि प्रभ मेरे भाइआ ॥
आपे जंती जंतु है पिआरा जन नानक वजहि वजाइआ ॥4॥4॥
आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥
आपि निताणिआ ताणु है पिआरा आपि निमाणिआ माणु ॥
आपि दइआ करि रखदा पिआरा आपे सुघड़ु सुजाणु ॥1॥
मेरे मन जपि राम नामु नीसाणु ॥
सतसंगति मिलि धिआइ तू हरि हरि बहुड़ि न आवण जाणु ॥ रहाउ ॥
आपे ही गुण वरतदा पिआरा आपे ही परवाणु ॥
आपे बखस कराइदा पिआरा आपे सचु नीसाणु ॥
आपे हुकमि वरतदा पिआरा आपे ही फुरमाणु ॥2॥
आपे भगति भंडार है पिआरा आपे देवै दाणु ॥
आपे सेव कराइदा पिआरा आपि दिवावै माणु ॥
आपे ताड़ी लाइदा पिआरा आपे गुणी निधानु ॥3॥
आपे वडा आपि है पिआरा आपे ही परधाणु ॥
आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे तुलु परवाणु ॥
आपे अतुलु तुलाइदा पिआरा जन नानक सद कुरबाणु ॥4॥5॥
आपे सेवा लाइदा पिआरा आपे भगति उमाहा ॥
आपे गुण गावाइदा पिआरा आपे सबदि समाहा ॥
आपे लेखणि आपि लिखारी आपे लेखु लिखाहा ॥1॥
मेरे मन जपि राम नामु ओमाहा ॥
अनदिनु अनदु होवै वडभागी लै गुरि पूरै हरि लाहा ॥ रहाउ ॥
आपे गोपी कानु है पिआरा बनि आपे गऊ चराहा ॥
आपे सावल सुंदरा पिआरा आपे वंसु वजाहा ॥
कुवलीआ पीड़ु आपि मराइदा पिआरा करि बालक रूपि पचाहा ॥2॥
आपि अखाड़ा पाइदा पिआरा करि वेखै आपि चोजाहा ॥
करि बालक रूप उपाइदा पिआरा चंडूरु कंसु केसु माराहा ॥
आपे ही बलु आपि है पिआरा बलु भंनै मूरख मुगधाहा ॥3॥
सभु आपे जगतु उपाइदा पिआरा वसि आपे जुगति हथाहा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! प्रभू खुद ही लकड़ी (पैदा करने वाला) है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।