आपे ही सूतधारु है पिआरा सूतु खिंचे ढहि ढेरी होइ ॥1॥ मेरे मन मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ सतिगुर विचि नामु निधानु है पिआरा करि दइआ अंम्रितु मुखि चोइ ॥ रहाउ ॥ आपे जल थलि सभतु है पिआरा प्रभु आपे करे सु होइ ॥ सभना रिजकु समाहदा पिआरा दूजा अवरु न कोइ ॥ आपे खेल खेलाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥2॥ आपे ही आपि निरमला पिआरा आपे निरमल सोइ ॥ आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥ आपे अलखु न लखीऐ पिआरा आपि लखावै सोइ ॥3॥ आपे गहिर गंभीरु है पिआरा तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ सभि घट आपे भोगवै पिआरा विचि नारी पुरख सभु सोइ ॥ नानक गुपतु वरतदा पिआरा गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: प्रभू खुद ही धागे को अपने हाथ में पकड़ के रखने वाला (सूत्रधार) है।जब वह (जगत में से) धागे को खींच लेता है।तब (जगत) गिर के ढेरी हो जाता है (जगत-रचना समाप्त हो जाती है)। 1। हे मेरे मन ! मुझे परमात्मा के बिना (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। उस परमात्मा का नाम-खजाना गुरू में मौजूद है।गुरू मेहर करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (सिख के) मुँह में टपकाता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू खुद ही पानी में धरती में हर जगह मौजूद है।प्रभू खुद ही जो कुछ करता है वह (जगत में) घटित होता है। प्रभू खुद ही सब जीवों को रिजक पहुँचाता है (रिजक देने वाला) उसके बिना और कोई नहीं। प्रभू खुद ही (जगत के सारे) खेल खेल रहा है।वह स्वयं जो कुछ करता है वही होता है। 2। हे भाई ! पवित्र प्रभू (हर जगह) खुद ही खुद है।वह खुद ही पवित्र शोभा का मालिक है। प्रभू खुद ही अपना मूल्य पा सकने वाला है।जो कुछ खुद ही करता है वही होता है। प्रभू का स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।वह अदृश्य है।अपने स्वरूप की समझ वह आप ही देने वाला है। 3। हे भाई ! प्रभू ही (जैसे।एक) बेअंत गहरा (समुंद्र) है।उसके बराबर का और कोई नहीं। सारे जीवों में व्यापक हो के आप ही सारे भोग भोगता है।हरेक स्त्री-पुरुष में हर जगह वहआप ही आप है। हे नानक ! वह प्रभू सारे जगत में छुपा हुआ मौजूद है।गुरू की शरण पड़ने से उसकी सर्व-व्यापकता का प्रकाश होता है। 4। 2।
सोरठि महला 4 ॥ आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥ आपे वेखि विगसदा पिआरा करि चोज वेखै प्रभु आपै ॥ आपे वणि तिणि सभतु है पिआरा आपे गुरमुखि जापै ॥1॥ जपि मन हरि हरि नाम रसि ध्रापै ॥ अंम्रित नामु महा रसु मीठा गुर सबदी चखि जापै ॥ रहाउ ॥ आपे तीरथु तुलहड़ा पिआरा आपि तरै प्रभु आपै ॥ आपे जालु वताइदा पिआरा सभु जगु मछुली हरि आपै ॥ आपि अभुलु न भुलई पिआरा अवरु न दूजा जापै ॥2॥ आपे सिंङी नादु है पिआरा धुनि आपि वजाए आपै ॥ आपे जोगी पुरखु है पिआरा आपे ही तपु तापै ॥ आपे सतिगुरु आपि है चेला उपदेसु करै प्रभु आपै ॥3॥ आपे नाउ जपाइदा पिआरा आपे ही जपु जापै ॥ आपे अंम्रितु आपि है पिआरा आपे ही रसु आपै ॥ आपे आपि सलाहदा पिआरा जन नानक हरि रसि ध्रापै ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 ॥ हे भाई ! हर जगह प्रभू खुद ही खुद है।खुद ही (जगत को) पैदा करके खुद ही नाश कर देता है। प्रभू खुद ही (जगत-रचना को) देख के खुश होता है।करिश्मे-तमाशे रच के खुद ही देखता है।अपने आप को ही देखता है। प्रभू आप ही (हरेक) बन में (हरेक) तीले में हर जगह मौजूद है।गुरू की शरण पड़ा वह प्रभू दिखाई दे जाता है। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा (के नाम) को जपा कर।(जो मनुष्य जपता है वह) नाम के रस से (माया की ओर से) तृप्त हो जाता है। हे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल बहुत स्वादिष्ट है।बहुत मीठा है।गुरू के शबद के द्वारा चख के ही पता चलता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू आप ही दरिया का किनारा है।आप ही (दरिया से पार लांघने के लिए) तुलहा है।आप ही (दरिया से) पार लांघता है।अपने आप को ही पार लंघाता है। प्रभू खुद ही (माया का) जाल बिछाता है (उस जाल में फसने वाली) जगत रूपी मछली भी अपने आप को ही बनाता है। (फिर भी वह) आप भूलने वाला नहीं।वह कभी (भी माया-जाल में फसने वाली) भूल नहीं करता।उसके बराबर का और कोई नहीं दिखता। 2। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जोगी के बजाने वाली) सिंगी है।स्वयं ही (उस बजती सिंगी की) आवाज है।स्वयं ही (सिंगी के) सुर बजाता है। वह सर्व-व्यापक प्रभू आप ही जोगी है।आप ही (धूणियों आदि से) तप करता है। प्रभू आप ही गुरू है।आप ही सिख है।आप ही अपने आप को उपदेश करता है। 3। हे भाई ! प्रभू आप ही (जीवों से अपना) नाम जपाता है (जीवों में व्याप्त हैं के) आप ही अपना नाम जपता है। आप ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल है।आप ही उस नाम-रस को पीता है।अपने आप को पीता है। हे दास नानक ! प्रभू आप ही अपनी सिफत सालाह करता है।आप ही अपने नाम-रस से तृप्त होता है। 4। 3।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 ॥ वह तराजू भी प्रभू खुद ही है।उस तराजू की सुई भी प्रभू खुद ही है।प्रभू ने खुद ही बाँट से (इस सृष्टि को) तोला हुआ है (अपने हुकम में रखा हुआ है)। प्रभू खुद ही (इस धरती पर वणज करने वाला) शहूकार है।खुद ही (जीव-रूप हो के) वणज करने वाला है।खुद ही वणज कर रहा है। हे भाई ! प्रभू ने खुद ही धरती पैदा की हुई है।(अपनी मर्यादा रूपी तराजू के) पीछे के छाबे में चार मासे बाँट रख के (प्रभू ने खुद ही इस सृष्टि को मर्यादा में रखा हुआ है।ये काम उस प्रभू के लिए बहुत साधारण और आसान सा है)। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का सिमरन कर।(जिस किसी ने सिमरा है।उसने) सुख पाया है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (सारे) सुखों का खजाना है (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा है) पूरे गुरू ने उसे परमात्मा का नाम मीठा अनुभव करा दिया है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू प्यारा खुद ही धरती पैदा करने वाला है।आप ही पानी पैदा करने वाला है।आप ही सब कुछ करता है आप ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है। आप ही अपने हुकम अनुसार हर जगह कार्य चला रहा है।पानी को मिट्टी से (उसने अपने हुकम में ही) बाँध रखा है (पानी मिट्टी को बहा नहीं सकता।पानी में उसने) खुद ही अपना डर रखा है।(जैसे) बकरी शेर को बाँध के घुमा रही है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू खुद ही धागे को अपने हाथ में पकड़ के रखने वाला (सूत्रधार) है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।