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अंग ६०५ · सोरठ

अंग
605
सोरठ
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  1. आपे ही सूतधारु है पिआरा सूतु खिंचे ढहि ढेरी होइ ॥1॥
  2. आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥
  3. आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥

आपे ही सूतधारु है पिआरा सूतु खिंचे ढहि ढेरी होइ ॥1॥

अंग ६०४ से चला आ रहा अंश

आपे ही सूतधारु है पिआरा सूतु खिंचे ढहि ढेरी होइ ॥1॥
मेरे मन मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥
सतिगुर विचि नामु निधानु है पिआरा करि दइआ अंम्रितु मुखि चोइ ॥ रहाउ ॥
आपे जल थलि सभतु है पिआरा प्रभु आपे करे सु होइ ॥
सभना रिजकु समाहदा पिआरा दूजा अवरु न कोइ ॥
आपे खेल खेलाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥2॥
आपे ही आपि निरमला पिआरा आपे निरमल सोइ ॥
आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥
आपे अलखु न लखीऐ पिआरा आपि लखावै सोइ ॥3॥
आपे गहिर गंभीरु है पिआरा तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
सभि घट आपे भोगवै पिआरा विचि नारी पुरख सभु सोइ ॥
नानक गुपतु वरतदा पिआरा गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू खुद ही धागे को अपने हाथ में पकड़ के रखने वाला (सूत्रधार) है।जब वह (जगत में से) धागे को खींच लेता है।तब (जगत) गिर के ढेरी हो जाता है (जगत-रचना समाप्त हो जाती है)। 1। हे मेरे मन ! मुझे परमात्मा के बिना (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। उस परमात्मा का नाम-खजाना गुरू में मौजूद है।गुरू मेहर करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (सिख के) मुँह में टपकाता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू खुद ही पानी में धरती में हर जगह मौजूद है।प्रभू खुद ही जो कुछ करता है वह (जगत में) घटित होता है। प्रभू खुद ही सब जीवों को रिजक पहुँचाता है (रिजक देने वाला) उसके बिना और कोई नहीं। प्रभू खुद ही (जगत के सारे) खेल खेल रहा है।वह स्वयं जो कुछ करता है वही होता है। 2। हे भाई ! पवित्र प्रभू (हर जगह) खुद ही खुद है।वह खुद ही पवित्र शोभा का मालिक है। प्रभू खुद ही अपना मूल्य पा सकने वाला है।जो कुछ खुद ही करता है वही होता है। प्रभू का स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।वह अदृश्य है।अपने स्वरूप की समझ वह स्वयं ही देने वाला है। 3। हे भाई ! प्रभू ही (जैसे।एक) बेअंत गहरा (समुंद्र) है।उसके बराबर का और कोई नहीं। सारे जीवों में व्यापक हो के आप ही सारे भोग भोगता है।हरेक स्त्री-पुरुष में हर जगह वहआप ही आप है। हे नानक ! वह प्रभू सारे जगत में छुपा हुआ मौजूद है।गुरू की शरण पड़ने से उसकी सर्व-व्यापकता का प्रकाश होता है। 4। 2।

आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥

सोरठि महला 4 ॥
आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥
आपे वेखि विगसदा पिआरा करि चोज वेखै प्रभु आपै ॥
आपे वणि तिणि सभतु है पिआरा आपे गुरमुखि जापै ॥1॥
जपि मन हरि हरि नाम रसि ध्रापै ॥
अंम्रित नामु महा रसु मीठा गुर सबदी चखि जापै ॥ रहाउ ॥
आपे तीरथु तुलहड़ा पिआरा आपि तरै प्रभु आपै ॥
आपे जालु वताइदा पिआरा सभु जगु मछुली हरि आपै ॥
आपि अभुलु न भुलई पिआरा अवरु न दूजा जापै ॥2॥
आपे सिंङी नादु है पिआरा धुनि आपि वजाए आपै ॥
आपे जोगी पुरखु है पिआरा आपे ही तपु तापै ॥
आपे सतिगुरु आपि है चेला उपदेसु करै प्रभु आपै ॥3॥
आपे नाउ जपाइदा पिआरा आपे ही जपु जापै ॥
आपे अंम्रितु आपि है पिआरा आपे ही रसु आपै ॥
आपे आपि सलाहदा पिआरा जन नानक हरि रसि ध्रापै ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 ॥ हे भाई ! हर जगह प्रभू खुद ही खुद है।खुद ही (जगत को) पैदा करके खुद ही नाश कर देता है। प्रभू खुद ही (जगत-रचना को) देख के खुश होता है।करिश्मे-तमाशे रच के खुद ही देखता है।अपने आप को ही देखता है। प्रभू आप ही (हरेक) बन में (हरेक) तीले में हर जगह मौजूद है।गुरू की शरण पड़ा वह प्रभू दिखाई दे जाता है। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा (के नाम) को जपा कर।(जो मनुष्य जपता है वह) नाम के रस से (माया की ओर से) तृप्त हो जाता है। हे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल बहुत स्वादिष्ट है।बहुत मीठा है।गुरू के शबद के द्वारा चख के ही पता चलता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू आप ही दरिया का किनारा है।आप ही (दरिया से पार लांघने के लिए) तुलहा है।आप ही (दरिया से) पार लांघता है।अपने आप को ही पार लंघाता है। प्रभू खुद ही (माया का) जाल बिछाता है (उस जाल में फसने वाली) जगत रूपी मछली भी अपने आप को ही बनाता है। (फिर भी वह) आप भूलने वाला नहीं।वह कभी (भी माया-जाल में फसने वाली) भूल नहीं करता।उसके बराबर का और कोई नहीं दिखता। 2। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जोगी के बजाने वाली) सिंगी है।स्वयं ही (उस बजती सिंगी की) आवाज है।स्वयं ही (सिंगी के) सुर बजाता है। वह सर्व-व्यापक प्रभू आप ही जोगी है।आप ही (धूणियों आदि से) तप करता है। प्रभू आप ही गुरू है।आप ही सिख है।आप ही अपने आप को उपदेश करता है। 3। हे भाई ! प्रभू आप ही (जीवों से अपना) नाम जपाता है (जीवों में व्याप्त हो के) आप ही अपना नाम जपता है। आप ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल है।आप ही उस नाम-रस को पीता है।अपने आप को पीता है। हे दास नानक ! प्रभू आप ही अपनी सिफत सालाह करता है।आप ही अपने नाम-रस से तृप्त होता है। 4। 3।

आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥

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सोरठि महला 4 ॥
आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥
आपे साहु आपे वणजारा आपे वणजु कराइआ ॥
आपे धरती साजीअनु पिआरै पिछै टंकु चड़ाइआ ॥1॥
मेरे मन हरि हरि धिआइ सुखु पाइआ ॥
हरि हरि नामु निधानु है पिआरा गुरि पूरै मीठा लाइआ ॥ रहाउ ॥
आपे धरती आपि जलु पिआरा आपे करे कराइआ ॥
आपे हुकमि वरतदा पिआरा जलु माटी बंधि रखाइआ ॥
आपे ही भउ पाइदा पिआरा बंनि बकरी सीहु हढाइआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 ॥ वह तराजू भी प्रभू खुद ही है।उस तराजू की सुई भी प्रभू खुद ही है।प्रभू ने खुद ही बाँट से (इस सृष्टि को) तोला हुआ है (अपने हुकम में रखा हुआ है)। प्रभू खुद ही (इस धरती पर वणज करने वाला) शहूकार है।खुद ही (जीव-रूप हो के) वणज करने वाला है।खुद ही वणज कर रहा है। हे भाई ! प्रभू ने खुद ही धरती पैदा की हुई है।(अपनी मर्यादा रूपी तराजू के) पीछे के छाबे में चार मासे बाँट रख के (प्रभू ने खुद ही इस सृष्टि को मर्यादा में रखा हुआ है।ये काम उस प्रभू के लिए बहुत साधारण और आसान सा है)। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का सिमरन कर।(जिस किसी ने सिमरा है।उसने) सुख पाया है। हे भाई ! परमात्मा का नाम (सारे) सुखों का खजाना है (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा है) पूरे गुरू ने उसे परमात्मा का नाम मीठा अनुभव करा दिया है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू प्यारा खुद ही धरती पैदा करने वाला है।स्वयं ही पानी पैदा करने वाला है।आप ही सब कुछ करता है आप ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है। आप ही अपने हुकम अनुसार हर जगह कार्य चला रहा है।पानी को मिट्टी से (उसने अपने हुकम में ही) बाँध रखा है (पानी मिट्टी को बहा नहीं सकता।पानी में उसने) खुद ही अपना डर रखा है।(जैसे) बकरी शेर को बाँध के घुमा रही है। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६०५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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