Lulla Family

अंग 604

अंग
604
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सबदि मरहु फिरि जीवहु सद ही ता फिरि मरणु न होई ॥
अंम्रितु नामु सदा मनि मीठा सबदे पावै कोई ॥3॥
दातै दाति रखी हथि अपणै जिसु भावै तिसु देई ॥
नानक नामि रते सुखु पाइआ दरगह जापहि सेई ॥4॥11॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू के शबद में जुड़ के (विकारों से) अछोह हो जाएँ।फिर सदा के लिए ही आत्मिक जीवन जीते रहोगे।फिर कभी आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकेगी। जो भी मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा हरी-नाम प्राप्त कर लेता है उसको ये आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा के लिए मन में मीठा लगने लगता है। 3। हे भाई ! दातार ने (नाम की ये) दाति अपने हाथ में रखी हुई है।जिसे चाहता है उसे दे देता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम-रंग में रंगे जाते हैं।वह (यहाँ) सुख पाते हैं।परमात्मा की हजूरी में भी वही मनुष्य आदर मान पाते हैं। 4। 11।
सोरठि महला 3 ॥
सतिगुर सेवे ता सहज धुनि उपजै गति मति तद ही पाए ॥
हरि का नामु सचा मनि वसिआ नामे नामि समाए ॥1॥
बिनु सतिगुर सभु जगु बउराना ॥
मनमुखि अंधा सबदु न जाणै झूठै भरमि भुलाना ॥ रहाउ ॥
त्रै गुण माइआ भरमि भुलाइआ हउमै बंधन कमाए ॥
जंमणु मरणु सिर ऊपरि ऊभउ गरभ जोनि दुखु पाए ॥2॥
त्रै गुण वरतहि सगल संसारा हउमै विचि पति खोई ॥
गुरमुखि होवै चउथा पदु चीनै राम नामि सुखु होई ॥3॥
त्रै गुण सभि तेरे तू आपे करता जो तू करहि सु होई ॥
नानक राम नामि निसतारा सबदे हउमै खोई ॥4॥12॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 ॥ हे भाई ! जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब (इसके अंदर) आत्मिक अडोलता की रौंअ चल पड़ती है।तब ही (गुरू की शरण पड़ के ही) मनुष्य उच्च आत्मिक अवस्था और ऊँची मति हासिल करता है। सदा कायम रहने वाला हरी-नाम मनुष्य के मन में आ बसता है।और मनुष्य सदा नाम में ही लीन रहता है। 1। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना सारा जगत (माया के मोह में) पागल हुआ फिरता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के मोह में) अंधा हो के गुरू के शबद के साथ गहरी सांझ नहीं डालता।झूठी दुनिया के कारण भटकना में पड़ कर गलत राह पर पड़ा रहता है।रहाउ। हे भाई ! मनुष्य त्रैगुणी माया में पड़ कर कुमार्ग पर पड़ा रहता है।और अहंकार के कारण मोह के बंधन बढ़ाने वाले काम ही करता है। उसके सिर पर हर वक्त जनम-मरन का चक्र हर समय टिका रहता है।और जनम-मरण में पड़ कर दुख सहता रहता है। हे भाई ! माया के तीन गुण सारे संसार पर अपना प्रभाव डाले रखते हैं।(इनके असर तले मनुष्य) अहंम् में फस के सम्मान गवा लेता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।वह उस आत्मिक अवस्था को पहचान लेता है जहाँ माया के तीनों गुण असर नहीं डाल सकते।परमात्मा के नाम में टिक के वह आत्मिक आनंद लेता है। 3। हे प्रभू ! माया के ये तीनों गुण आपके ही बनाए हुए हैं।आप स्वयं ही (सब को) पैदा करने वाला है।(जगत में) वही होता है जो आप करता है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा के नाम में जुड़ने से (माया के तीनों गुणों से) पूरी तरह से मुक्ति मिल जाती है।मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से ही (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर सकता है। 4। 12।
सोरठि महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥
वणजारा जगु आपि है पिआरा आपे साचा साहु ॥
आपे वणजु वापारीआ पिआरा आपे सचु वेसाहु ॥1॥
जपि मन हरि हरि नामु सलाह ॥
गुर किरपा ते पाईऐ पिआरा अंम्रितु अगम अथाह ॥ रहाउ ॥
आपे सुणि सभ वेखदा पिआरा मुखि बोले आपि मुहाहु ॥
आपे उझड़ि पाइदा पिआरा आपि विखाले राहु ॥
आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे वेपरवाहु ॥2॥
आपे आपि उपाइदा पिआरा सिरि आपे धंधड़ै लाहु ॥
आपि कराए साखती पिआरा आपि मारे मरि जाहु ॥
आपे पतणु पातणी पिआरा आपे पारि लंघाहु ॥3॥
आपे सागरु बोहिथा पिआरा गुरु खेवटु आपि चलाहु ॥
आपे ही चड़ि लंघदा पिआरा करि चोज वेखै पातिसाहु ॥
आपे आपि दइआलु है पिआरा जन नानक बखसि मिलाहु ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है (व्यापक होते हुए भी) प्रभू स्वयं ही निर्लिप (भी) है। जगत-बणजारा प्रभू स्वयं ही है (जगत-बणजारे को राशि-पूँजी देने वाला भी) सदा कायम रहने वाला प्रभू स्वयं ही शाहूकार है। प्रभू स्वयं ही वणज है।स्वयं ही व्यापार करने वाला है।स्वयं ही सदा-स्थिर रहने वाली राशि-पूँजी है। 1। हे (मेरे) मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा कर।सिफत सालाह किया कर। (हे भाई !) गुरू की मेहर से ही वह प्यारा प्रभू मिल सकता है।जो आत्मिक जीवन देने वाला है।जो अपहुँच है।और जो बहुत गहरा है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जीवों की अरदासें) सुन के सब की संभाल करता है।स्वयं ही मुँह से (जीवों को ढाढस देने के लिए) मीठे बोल बोलता है। प्यारा प्रभू सवयं ही (जीवों को) गलत राह पर डाल देता है।स्वयं ही (जिंदगी का सही) रास्ता दिखाता है। हे भाई ! हर जगह प्रभू स्वयं ही स्वयं है (इतने कुछ का मालिक होते हुए भी) प्रभू बेपरवाह रहता है। 2। हे भाई ! प्रभू खुद ही (सब जीवों को) पैदा करता है।स्वयं ही हरेक जीव को माया के चक्कर में लगाए रखता है। प्रभू खुद ही (जीवों की) बनतर बनाता है।खुद ही मारता है।(तो उसका पैदा किया हुआ जीव) मर जाता है। प्रभू खुद ही (संसार नदी पर) पक्तन है।खुद ही मल्लाह है।खुद ही (जीवों को) पार लंघाता है। 3। हे भाई ! प्रभू खुद ही (संसार-) समुंद्र है।खुद ही जहाज है।खुद ही गुरू-मल्लाह हो के जहाज़ को चलाता है। प्रभू खुद ही (जहाज़ में) चढ़ के पार होता है।प्रभू-पातशाह करिश्मे-तमाशे करके खुद ही (इन तमाशों को) देख रहा है। हे नानक ! (कह) प्रभू खुद ही (सदा) दया का श्रोत है।खुद ही कृपा करके (अपने पैदा किए हुए जीवों को अपने साथ) मिला लेता है। 4। 1।
सोरठि महला 4 चउथा ॥
आपे अंडज जेरज सेतज उतभुज आपे खंड आपे सभ लोइ ॥
आपे सूतु आपे बहु मणीआ करि सकती जगतु परोइ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 4 चउथा ॥ हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (चारों खाणियां) अण्डज।जेरज।सेतज और उत्भुज है।प्रभू खुद ही (धरती के नौ) खण्ड है।प्रभू स्वयं ही (सृष्टि के) सारे भवन है। प्रभू खुद ही (सत्य-रूप) धागा (सूत्र) है।प्रभू खुद (बेअंत जीव के रूप में) अनेकों मणके है।प्रभू खुद ही अपनी ताकत बना के जगत को (धागे में) परोता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू के शबद में जुड़ के (विकारों से) अछोह हो जाएँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।