बिनु गुर प्रीति न ऊपजै भाई मनमुखि दूजै भाइ ॥ तुह कुटहि मनमुख करम करहि भाई पलै किछू न पाइ ॥2॥ गुर मिलिऐ नामु मनि रविआ भाई साची प्रीति पिआरि ॥ सदा हरि के गुण रवै भाई गुर कै हेति अपारि ॥3॥ आइआ सो परवाणु है भाई जि गुर सेवा चितु लाइ ॥ नानक नामु हरि पाईऐ भाई गुर सबदी मेलाइ ॥4॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू के बिना (मनुष्य का प्रभू में) प्यार पैदा नहीं होता।अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (प्रभू को छोड़ के) और ही प्यार में टिके रहते हैं। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (जो भी धार्मिक) काम करते हैं वह (जैसे) फॅक ही कूटते हैं।(उनको।उन कर्मों में से) कुछ हासिल नहीं होता (जैसे फोक में से कुछ नहीं निकलता)। 2। हे भाई ! यदि गुरू मिल जाए।तो परमात्मा का नाम उसके मन में सदा बसा रहता है।मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की प्रीति में प्यार में मगन रहता है। हे भाई ! गुरू के बख्शे अटूट प्यार की बरकति से वह सदा परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा में चित्त जोड़ता है उसका जगत में आया हुआ सफल हो जाता है। हे नानक ! गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।गुरू के शबद की बरकति से प्रभू से मिलाप हो जाता है। 4। 8।
सोरठि महला 3 घरु 1 ॥ तिही गुणी त्रिभवणु विआपिआ भाई गुरमुखि बूझ बुझाइ ॥ राम नामि लगि छूटीऐ भाई पूछहु गिआनीआ जाइ ॥1॥ मन रे त्रै गुण छोडि चउथै चितु लाइ ॥ हरि जीउ तेरै मनि वसै भाई सदा हरि के गुण गाइ ॥ रहाउ ॥ नामै ते सभि ऊपजे भाई नाइ विसरिऐ मरि जाइ ॥ अगिआनी जगतु अंधु है भाई सूते गए मुहाइ ॥2॥ गुरमुखि जागे से उबरे भाई भवजलु पारि उतारि ॥ जग महि लाहा हरि नामु है भाई हिरदै रखिआ उर धारि ॥3॥ गुर सरणाई उबरे भाई राम नामि लिव लाइ ॥ नानक नाउ बेड़ा नाउ तुलहड़ा भाई जितु लगि पारि जन पाइ ॥4॥9॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 घरु 1 ॥ हे भाई ! सारा जगत माया के तीन गुणों में ही फसा हुआ है।जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है (गुरू उसे) आत्मिक जीवन की समझ देता है। हे भाई ! परमात्मा के नाम मेुं लीन हो के (माया के तीन गुणों की पकड़ से) बचना है।(अपनी तसल्ली के लिए) जा के पूछ लो उनको जिनको आत्मिक जीवन की समझ आ गई है। 1। हे मेरे मन ! (माया के) तीन गुणों (के प्रभाव) को छोड़ के उस अवस्था में टिक जहाँ इन तीनों का जोर नहीं पड़ता। हे भाई ! परमात्मा आपके मन में (ही) बसता है।सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया कर।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के नाम में जुड़ के ही सारे जीव आत्मिक जीवन जी सकते हैं।अगर नाम बिसर जाए।तो मनुष्य आत्मिक मौत मर जाता है। आत्मिक जीवन की समझ से वंचित जगत माया के मोह में अंधा हुआ रहता है।माया के मोह में सोए हुए मनुष्य आत्मिक जीवन की राशि पूँजी लुटा के जाते हैं। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (माया के मोह की नींद में से) जाग जाते हैं वे (संसार समुंद्र में) डूबने से बच जाते हैं।(गुरू उनको) संसार समुंद्र में से पार लंघा देता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा का नाम संभाल के रखता है।ये हरी-नाम ही जगत में (असली) लाभ है। 3। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के मनुष्य (संसार समुंद्र में डूबने से) बच जाते हैं। हे नानक ! (कह) हे भाई ! परमात्मा का नाम ही जहाज है।हरी नाम ही तुलहा है जिस पर चढ़ के मनुष्य (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 4। 9।
सोरठि महला 3 घरु 1 ॥ सतिगुरु सुख सागरु जग अंतरि होर थै सुखु नाही ॥ हउमै जगतु दुखि रोगि विआपिआ मरि जनमै रोवै धाही ॥1॥ प्राणी सतिगुरु सेवि सुखु पाइ ॥ सतिगुरु सेवहि ता सुखु पावहि नाहि त जाहिगा जनमु गवाइ ॥ रहाउ ॥ त्रै गुण धातु बहु करम कमावहि हरि रस सादु न आइआ ॥ संधिआ तरपणु करहि गाइत्री बिनु बूझे दुखु पाइआ ॥2॥ सतिगुरु सेवे सो वडभागी जिस नो आपि मिलाए ॥ हरि रसु पी जन सदा त्रिपतासे विचहु आपु गवाए ॥3॥ इहु जगु अंधा सभु अंधु कमावै बिनु गुर मगु न पाए ॥ नानक सतिगुरु मिलै त अखी वेखै घरै अंदरि सचु पाए ॥4॥10॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 घरु 1 ॥ हे भाई ! जगत में गुरू (ही) सुख का सागर है।(गुरू के बिना) किसी और को सुख नहीं मिलता। जगत अपने अहंकार के कारण (गुरू से टूट के) दुख में रोग में ग्रसित रहता है।बार बार पैदा होता है मरता है।धाड़ें मार मार के रोता है (दुखी होता है)। 1। हे बँदे ! गुरू की शरण पड़।और आत्मिक आनंद ले। अगर आप गुरू की बताई हुई सेवा करेगा।तो सुख पाएगा।नहीं तो अपना जीवन व्यर्थ गुजार के (यहाँ से) चला जाएगा।रहाउ। हे भाई ! गुरू से टूटे हुए मनुष्य माया के तीनों गुणों के प्रभाव में (निहित धार्मिक) कर्म करते हैं।पर उन्हें परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं आता। तीनों वक्त संध्या पाठ करते हैं।पित्रों-देवताओं को जल अर्पण करते हैं।गायत्री मंत्र का पाठ करते हैं।पर आत्मिक जीवन की समझ के बिना उनको दुख ही मिलता है। 2। हे भाई ! वह मनुष्य भाग्यशाली है जो गुरू की बताई हुई सेवा करता है (पर गुरू उसी को मिलता है) जिसे परमात्मा स्वयं मिलाए। (गुरू की शरण पड़ने वाले) मनुष्य अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करके (गुरू से) परमात्मा के नाम का रस पी के सदा तृप्त रहते हैं। 3। हे भाई ! ये जगत माया के मोह में अंधा हुआ पड़ा है।अंधों वाले ही सदा काम करता है।गुरू की शरण पड़े बिना (जीवन का सही) रास्ता नहीं मिल सकता। हे नानक ! अगर इसे गुरू मिल जाए।तो (परमात्मा को) आँखों से देख लेता है।अपने हृदय-घर में सदा कायम रहने वाले परमात्मा को पा लेता है। 4। 10।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3॥ हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना मनुष्य को बहुत सारे दुख चिपके रहते हैं।मनुष्य सदा ही भटकता फिरता है। हे प्रभू ! हम (जीव।आपके दर के) मंगते हैं।आप सदा ही (हमें) दातें देने वाला है।(मेहर कर।गुरू के) शबद में जोड़ के आत्मिक जीवन की समझ दे। 1। हे प्यारे प्रभू जी ! (मेरे पर) मेहर कर। आपके नाम की दाति देने वाला गुरू मुझे मिला।और (मेरी जिंदगी का) सहारा अपना नाम मुझे दे।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य ने) बेअंत प्रभू का नाम हासिल कर लिया (नाम की बरकति से) वासना खत्म करके उसकी मानसिक डाँवा डोल हालत आत्मिक अडोलता में लीन हो जाती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम सारे पाप काटने के समर्थ है (जो मनुष्य नाम प्राप्त कर लेता है) हरी-नाम का स्वाद चख के उसका मन पवित्र हो जाता है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू के बिना (मनुष्य का प्रभू में) प्यार पैदा नहीं होता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।