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अंग ६०१ · सोरठ

अंग
601
सोरठ
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  1. हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥
  2. गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥
  3. सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥

हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥

सोरठि महला 3 ॥
हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥
इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥
हम मूड़ मुगध सदा से भाई गुर कै सबदि प्रगासा ॥1॥
हरि जीउ तुम आपे देहु बुझाई ॥
हरि जीउ तुधु विटहु वारिआ सद ही तेरे नाम विटहु बलि जाई ॥ रहाउ ॥
हम सबदि मुए सबदि मारि जीवाले भाई सबदे ही मुकति पाई ॥
सबदे मनु तनु निरमलु होआ हरि वसिआ मनि आई ॥
सबदु गुर दाता जितु मनु राता हरि सिउ रहिआ समाई ॥2॥
सबदु न जाणहि से अंने बोले से कितु आए संसारा ॥
हरि रसु न पाइआ बिरथा जनमु गवाइआ जंमहि वारो वारा ॥
बिसटा के कीड़े बिसटा माहि समाणे मनमुख मुगध गुबारा ॥3॥
आपे करि वेखै मारगि लाए भाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
जो धुरि लिखिआ सु कोइ न मेटै भाई करता करे सु होई ॥
नानक नामु वसिआ मन अंतरि भाई अवरु न दूजा कोई ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 ॥ हे प्यारे प्रभू जी ! (मेहर करें) जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं।मैं सदा आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। हे मालिक प्रभू ! जब आप मुझे एक पल भर एक छिन भर बिसरते हैं।तो मैं (मेरे लिए जैसे) पचास साल बीत गए समझता हूँ। हे भाई ! हम सदा से ही मूर्ख अंजान चले आ रहे थे।गुरू के शबद की बरकति से (हमारे अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है। 1। हे प्रभू जी ! आप स्वयं ही (अपना नाम जपने की मुझे) समझ दें। हे प्रभू ! मैं आपसे सदके जाऊँ।मैं आपसे कुर्बान जाऊँ।रहाउ हे भाई ! हम (जीव) गुरू के शबद के द्वारा (विकारों से) मर सकते हैं।शबद के द्वारा ही (विकारों को) मार के (गुरू) आत्मिक जीवन देता है। गुरू के शबद में जुड़ने से ही विकारों से मुक्ति मिलती है।गुरू के शबद से मन पवित्र होता है।और परमात्मा मन में आ बसता है। हे भाई ! गुरू का शबद (ही नाम की दाति) देने वाला है।जब शबद में मन रंगा जाता है तो परमात्मा में लीन हो जाता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के साथ सांझ नहीं डालते वह (माया के मोह में आत्मिक जीवन की ओर से) अंधे-बहरे हुए रहते हैं।संसार में आ के भी वे कुछ नहीं कमाते। उन्हें प्रभू के नाम का स्वाद नहीं आता।वे अपना जीवन व्यर्थ गवा जाते हैं।वे बार-बार पैदा होते मरते रहते हैं। जैसे गंदगी के कीड़े गंदगी में ही टिके रहते हैं।वैसे ही अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य (अज्ञानता के) अंधकार में ही (मस्त रहते हैं)। 3। पर। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश।) प्रभू खुद ही (जीवों को) पैदा करके संभाल करता है।खुद ही (जीवन के सही) रास्ते पर डालता है।उस प्रभू के बिना और कोई नहीं (जो जीवों को रास्ता बता सके)। हे भाई ! करतार जो कुछ करता है वही होता है।धुर दरगाह से (जीवों के माथे पर लेख) लिख देता है।उसे कोई और मिटा नहीं सकता। हे नानक ! (कहें) हे भाई ! (उस प्रभू की मेहर से ही उसका) नाम (मनुष्य के) मन में बस सकता है।कोई और ये दाति देने के काबिल नहीं। 4। 4।

गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥

सोरठि महला 3 ॥
गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥
भगता की सार करहि आपि राखहि जो तेरै मनि भाणे ॥
तू गुणदाता सबदि पछाता गुण कहि गुणी समाणे ॥1॥
मन मेरे हरि जीउ सदा समालि ॥
अंत कालि तेरा बेली होवै सदा निबहै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥
दुसट चउकड़ी सदा कूड़ु कमावहि ना बूझहि वीचारे ॥
निंदा दुसटी ते किनि फलु पाइआ हरणाखस नखहि बिदारे ॥
प्रहिलादु जनु सद हरि गुण गावै हरि जीउ लए उबारे ॥2॥
आपस कउ बहु भला करि जाणहि मनमुखि मति न काई ॥
साधू जन की निंदा विआपे जासनि जनमु गवाई ॥
राम नामु कदे चेतहि नाही अंति गए पछुताई ॥3॥
सफलु जनमु भगता का कीता गुर सेवा आपि लाए ॥
सबदे राते सहजे माते अनदिनु हरि गुण गाए ॥
नानक दासु कहै बेनंती हउ लागा तिन कै पाए ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 ॥ हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य हर वक्त परमात्मा का नाम सिमर के भक्ति करते हैं और परमात्मा को प्यारे लगते हैं। हे प्रभू ! भक्तों की संभाल आप खुद करते हैं।आप स्वयं उनकी रक्षा करते हैं।क्योंकि वे आपको अपने मन में प्यारे लगते हैं। आप उन्हें अपने गुण देते हैं।गुरू के शबद द्वारा वे आपके साथ सांझ डालते हैं।हे भाई ! परमात्मा की सिफत सालाह कर करके (भक्त) गुणों के मालिक प्रभू में लीन रहते हैं। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा को सदा याद करता रह। आखिरी समय में परमात्मा ही आपका मददगार बनेगा।परमात्मा सदा आपके साथ साथ निबाहेगा।रहाउ। हे भाई ! बुरे मनुष्य सदा बुराई ही कमाते हैं।वे विचार करके (ये) नहीं समझते कि बुरी निंदा (आदि) से किसी ने कभी अच्छा फल नहीं पाया।हरणाकश्यप (ने भगत को दुख देना शुरू किया।तो वह) नाखूनों से चीरा गया। परमात्मा का भक्त प्रहलाद सदा परमात्मा के गुण गाता था।परमात्मा ने उसको (नरसिंह रूप धारण कर के) बचा लिया। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की कोई अकल-शहूर नहीं होती।वे अपने आप को तो अच्छा समझते हैं पर नेक लोगों की निंदा करने में व्यस्त रहते हैं।वे अपना जीवन व्यर्थ गवा जाते हैं। वे परमात्मा का नाम कभी याद नहीं करते।आखिर हाथ मलते हुए (जगत से) चले जाते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही भक्तों की जिंदगी कामयाब बनाता है।वह स्वयं ही उनको गुरू की सेवा में जोड़ता है। (इस तरह वह) हर वक्त परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गुरू के शबद (के रंग) में रंगे रहते हैं और आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं। दास नानक विनती करता है, मैं उन भक्तों के चरणों में लगता हूँ। 4। 5।

सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥

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सोरठि महला 3 ॥
सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥
आपणै भाणै जो चलै भाई विछुड़ि चोटा खावै ॥
बिनु सतिगुर सुखु कदे न पावै भाई फिरि फिरि पछोतावै ॥1॥
हरि के दास सुहेले भाई ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 ॥ हे भाई ! वही मनुष्य गुरू का सिख है।गुरू का मित्र है।गुरू का रिश्तेदार है।जो गुरू की रजा में चलता है।पर। जो मनुष्य अपनी मर्जी के मुताबक चलता है।वह प्रभू से विछुड़ के दुख सहता है। गुरू की शरण पड़े बिना मनुष्य कभी सुख नहीं पा सकता।और बार बार (दुखी हो के) पछताता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के भक्त सुखी जीवन व्यतीत करते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६०१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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