हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥
इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥
हम मूड़ मुगध सदा से भाई गुर कै सबदि प्रगासा ॥1॥
हरि जीउ तुम आपे देहु बुझाई ॥
हरि जीउ तुधु विटहु वारिआ सद ही तेरे नाम विटहु बलि जाई ॥ रहाउ ॥
हम सबदि मुए सबदि मारि जीवाले भाई सबदे ही मुकति पाई ॥
सबदे मनु तनु निरमलु होआ हरि वसिआ मनि आई ॥
सबदु गुर दाता जितु मनु राता हरि सिउ रहिआ समाई ॥2॥
सबदु न जाणहि से अंने बोले से कितु आए संसारा ॥
हरि रसु न पाइआ बिरथा जनमु गवाइआ जंमहि वारो वारा ॥
बिसटा के कीड़े बिसटा माहि समाणे मनमुख मुगध गुबारा ॥3॥
आपे करि वेखै मारगि लाए भाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
जो धुरि लिखिआ सु कोइ न मेटै भाई करता करे सु होई ॥
नानक नामु वसिआ मन अंतरि भाई अवरु न दूजा कोई ॥4॥4॥
गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥
भगता की सार करहि आपि राखहि जो तेरै मनि भाणे ॥
तू गुणदाता सबदि पछाता गुण कहि गुणी समाणे ॥1॥
मन मेरे हरि जीउ सदा समालि ॥
अंत कालि तेरा बेली होवै सदा निबहै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥
दुसट चउकड़ी सदा कूड़ु कमावहि ना बूझहि वीचारे ॥
निंदा दुसटी ते किनि फलु पाइआ हरणाखस नखहि बिदारे ॥
प्रहिलादु जनु सद हरि गुण गावै हरि जीउ लए उबारे ॥2॥
आपस कउ बहु भला करि जाणहि मनमुखि मति न काई ॥
साधू जन की निंदा विआपे जासनि जनमु गवाई ॥
राम नामु कदे चेतहि नाही अंति गए पछुताई ॥3॥
सफलु जनमु भगता का कीता गुर सेवा आपि लाए ॥
सबदे राते सहजे माते अनदिनु हरि गुण गाए ॥
नानक दासु कहै बेनंती हउ लागा तिन कै पाए ॥4॥5॥
सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥
आपणै भाणै जो चलै भाई विछुड़ि चोटा खावै ॥
बिनु सतिगुर सुखु कदे न पावै भाई फिरि फिरि पछोतावै ॥1॥
हरि के दास सुहेले भाई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 3 ॥ हे प्यारे प्रभू जी ! (मेहर कर) जब तक मेरे शरीर में प्राण है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।