अंग
59
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਹਿਬੁ ਅਤੁਲੁ ਨ ਤੋਲੀਐ ਕਥਨਿ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥੫॥
ਵਾਪਾਰੀ ਵਣਜਾਰਿਆ ਆਏ ਵਜਹੁ ਲਿਖਾਇ ॥
ਕਾਰ ਕਮਾਵਹਿ ਸਚ ਕੀ ਲਾਹਾ ਮਿਲੈ ਰਜਾਇ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਚੀ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਨਾ ਤਿਸੁ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੋਲਿ ਤੋੁਲਾਇਸੀ ਸਚੁ ਤਰਾਜੀ ਤੋਲੁ ॥
ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਮੋਹਣੀ ਗੁਰਿ ਠਾਕੀ ਸਚੁ ਬੋਲੁ ॥
ਆਪਿ ਤੁਲਾਏ ਤੋਲਸੀ ਪੂਰੇ ਪੂਰਾ ਤੋਲੁ ॥੭॥
ਕਥਨੈ ਕਹਣਿ ਨ ਛੁਟੀਐ ਨਾ ਪੜਿ ਪੁਸਤਕ ਭਾਰ ॥
ਕਾਇਆ ਸੋਚ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਪਿਆਰ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਮੇਲੇ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰ ॥੮॥੯॥
ਵਾਪਾਰੀ ਵਣਜਾਰਿਆ ਆਏ ਵਜਹੁ ਲਿਖਾਇ ॥
ਕਾਰ ਕਮਾਵਹਿ ਸਚ ਕੀ ਲਾਹਾ ਮਿਲੈ ਰਜਾਇ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਚੀ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਨਾ ਤਿਸੁ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੋਲਿ ਤੋੁਲਾਇਸੀ ਸਚੁ ਤਰਾਜੀ ਤੋਲੁ ॥
ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਮੋਹਣੀ ਗੁਰਿ ਠਾਕੀ ਸਚੁ ਬੋਲੁ ॥
ਆਪਿ ਤੁਲਾਏ ਤੋਲਸੀ ਪੂਰੇ ਪੂਰਾ ਤੋਲੁ ॥੭॥
ਕਥਨੈ ਕਹਣਿ ਨ ਛੁਟੀਐ ਨਾ ਪੜਿ ਪੁਸਤਕ ਭਾਰ ॥
ਕਾਇਆ ਸੋਚ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਪਿਆਰ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਮੇਲੇ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰ ॥੮॥੯॥
साहिबु अतुलु न तोलीऐ कथनि न पाइआ जाइ ॥५॥
वापारी वणजारिआ आए वजहु लिखाइ ॥
कार कमावहि सच की लाहा मिलै रजाइ ॥
पूंजी साची गुरु मिलै ना तिसु तिलु न तमाइ ॥६॥
गुरमुखि तोलि तोुलाइसी सचु तराजी तोलु ॥
आसा मनसा मोहणी गुरि ठाकी सचु बोलु ॥
आपि तुलाए तोलसी पूरे पूरा तोलु ॥७॥
कथनै कहणि न छुटीऐ ना पड़ि पुसतक भार ॥
काइआ सोच न पाईऐ बिनु हरि भगति पिआर ॥
नानक नामु न वीसरै मेले गुरु करतार ॥८॥९॥
वापारी वणजारिआ आए वजहु लिखाइ ॥
कार कमावहि सच की लाहा मिलै रजाइ ॥
पूंजी साची गुरु मिलै ना तिसु तिलु न तमाइ ॥६॥
गुरमुखि तोलि तोुलाइसी सचु तराजी तोलु ॥
आसा मनसा मोहणी गुरि ठाकी सचु बोलु ॥
आपि तुलाए तोलसी पूरे पूरा तोलु ॥७॥
कथनै कहणि न छुटीऐ ना पड़ि पुसतक भार ॥
काइआ सोच न पाईऐ बिनु हरि भगति पिआर ॥
नानक नामु न वीसरै मेले गुरु करतार ॥८॥९॥
हिन्दी अर्थ: वह तौल से परे है (हां~ ये जरूर है कि वह मिलता सिमरन से ही है) निरी बातों से नहीं मिलता।5। सारे जीव बंजारे जीव व्यापारी (परमात्मा के दर से) दिहाड़ी (तनखाह) लिखा के (जगत में आते हैं। भाव~ हरेक को जिंदगी के स्वाश व सारे पदार्थों की दाति प्रभू दर से मिलती है)। जो जीव व्यापारी सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की कार करते हैं~ उनको प्रभू की रजा के अनुसार (आत्मिक जीवन का) लाभ मिलता है। (पर ये लाभ वही कमा सकते हैं जिनको) वह गुरू मिल जाता है जिस को (अपनी प्रशंसा आदि का) तिल जिनता भी लालच नहीं। (जिन को गुरू मिलता है उनकी आत्मिक जीवन वाली) राशि पूँजी सदा के लिए स्थिर हो जाती है।6। (इन्सानी जीवन की सफलता की परख के वास्ते) सच ही तराजू है और सच ही बाँट है (जिसके पल्ले सच है वही सफल है)। इस परख तोल में वही मनुष्य पूरा उतरता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। क्योंकि~ गुरू ने (परमात्मा की सिफति सलाह की) सच्ची बाणी दे के मन को मोह लेने वाली आशाओं और मन के माया के फुरनों को (मन पर वार करने से) रोक रखा होता है। पूरे प्रभू का यह तोल (का रुतबा) कभी घटता-बढ़ता नहीं। वही जीव (इस तोल में) पूरा तुलता है जिसको प्रभू (सिमरन की दात दे के) खुद (मेहर की निगाह से) तुलवाता है।7। निरी बातें करने से या पुस्तकों के ढेरों के ढेर पढ़ने से आसा-मनसा से बचा नहीं जा सकता। (यदि हृदय में) परमात्मा की भक्ति नहीं~ प्रभु का प्रेम नहीं~ तो निरे शरीर की पवित्रता से परमात्मा नहीं मिलता। हे नानक ! जिस को (गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का) नाम नहीं भूलता~ उसको गुरू परमात्मा के मेल में मिला देता है।8।9।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਜੇ ਮਿਲੈ ਪਾਈਐ ਰਤਨੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਮਨੁ ਦੀਜੈ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਪਾਈਐ ਸਰਬ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਅਵਗਣ ਮੇਟਣਹਾਰੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਪੂਛਹੁ ਬ੍ਰਹਮੇ ਨਾਰਦੈ ਬੇਦ ਬਿਆਸੈ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਧੁਨਿ ਜਾਣੀਐ ਅਕਥੁ ਕਹਾਵੈ ਸੋਇ ॥
ਸਫਲਿਓ ਬਿਰਖੁ ਹਰੀਆਵਲਾ ਛਾਵ ਘਣੇਰੀ ਹੋਇ ॥
ਲਾਲ ਜਵੇਹਰ ਮਾਣਕੀ ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੈ ਸੋਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੈ ਪਾਈਐ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਾਚੋ ਵਖਰੁ ਸੰਚੀਐ ਪੂਰੈ ਕਰਮਿ ਅਪਾਰੁ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਦੁਖ ਮੇਟਣੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੁ ॥੩॥
ਭਵਜਲੁ ਬਿਖਮੁ ਡਰਾਵਣੋ ਨਾ ਕੰਧੀ ਨਾ ਪਾਰੁ ॥
ਨਾ ਬੇੜੀ ਨਾ ਤੁਲਹੜਾ ਨਾ ਤਿਸੁ ਵੰਝੁ ਮਲਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੈ ਕਾ ਬੋਹਿਥਾ ਨਦਰੀ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੁ ॥੪॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਪਿਆਰਾ ਵਿਸਰੈ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਸੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਜਿਹਵਾ ਜਲਉ ਜਲਾਵਣੀ ਨਾਮੁ ਨ ਜਪੈ ਰਸਾਇ ॥
ਘਟੁ ਬਿਨਸੈ ਦੁਖੁ ਅਗਲੋ ਜਮੁ ਪਕੜੈ ਪਛੁਤਾਇ ॥੫॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਗਏ ਤਨੁ ਧਨੁ ਕਲਤੁ ਨ ਸਾਥਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਧਨੁ ਬਾਦਿ ਹੈ ਭੂਲੋ ਮਾਰਗਿ ਆਥਿ ॥
ਸਾਚਉ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥੋ ਕਾਥਿ ॥੬॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਪਇਐ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਇ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਿਉ ਮੇਟੀਐ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਰਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਛੁਟੀਐ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥੭॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਮੇਰਾ ਕੋ ਨਹੀ ਜਿਸ ਕਾ ਜੀਉ ਪਰਾਨੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਜਲਿ ਬਲਉ ਲੋਭੁ ਜਲਉ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀਐ ਪਾਈਐ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ॥੮॥੧੦॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਜੇ ਮਿਲੈ ਪਾਈਐ ਰਤਨੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਮਨੁ ਦੀਜੈ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਪਾਈਐ ਸਰਬ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਅਵਗਣ ਮੇਟਣਹਾਰੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਪੂਛਹੁ ਬ੍ਰਹਮੇ ਨਾਰਦੈ ਬੇਦ ਬਿਆਸੈ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਧੁਨਿ ਜਾਣੀਐ ਅਕਥੁ ਕਹਾਵੈ ਸੋਇ ॥
ਸਫਲਿਓ ਬਿਰਖੁ ਹਰੀਆਵਲਾ ਛਾਵ ਘਣੇਰੀ ਹੋਇ ॥
ਲਾਲ ਜਵੇਹਰ ਮਾਣਕੀ ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੈ ਸੋਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੈ ਪਾਈਐ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਾਚੋ ਵਖਰੁ ਸੰਚੀਐ ਪੂਰੈ ਕਰਮਿ ਅਪਾਰੁ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਦੁਖ ਮੇਟਣੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਸੁਰ ਸੰਘਾਰੁ ॥੩॥
ਭਵਜਲੁ ਬਿਖਮੁ ਡਰਾਵਣੋ ਨਾ ਕੰਧੀ ਨਾ ਪਾਰੁ ॥
ਨਾ ਬੇੜੀ ਨਾ ਤੁਲਹੜਾ ਨਾ ਤਿਸੁ ਵੰਝੁ ਮਲਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੈ ਕਾ ਬੋਹਿਥਾ ਨਦਰੀ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੁ ॥੪॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਪਿਆਰਾ ਵਿਸਰੈ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਸੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਜਿਹਵਾ ਜਲਉ ਜਲਾਵਣੀ ਨਾਮੁ ਨ ਜਪੈ ਰਸਾਇ ॥
ਘਟੁ ਬਿਨਸੈ ਦੁਖੁ ਅਗਲੋ ਜਮੁ ਪਕੜੈ ਪਛੁਤਾਇ ॥੫॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਗਏ ਤਨੁ ਧਨੁ ਕਲਤੁ ਨ ਸਾਥਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਧਨੁ ਬਾਦਿ ਹੈ ਭੂਲੋ ਮਾਰਗਿ ਆਥਿ ॥
ਸਾਚਉ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥੋ ਕਾਥਿ ॥੬॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਪਇਐ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਇ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਿਉ ਮੇਟੀਐ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਰਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਛੁਟੀਐ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥੭॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਮੇਰਾ ਕੋ ਨਹੀ ਜਿਸ ਕਾ ਜੀਉ ਪਰਾਨੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਜਲਿ ਬਲਉ ਲੋਭੁ ਜਲਉ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀਐ ਪਾਈਐ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ॥੮॥੧੦॥
सिरीरागु महला १ ॥
सतिगुरु पूरा जे मिलै पाईऐ रतनु बीचारु ॥
मनु दीजै गुर आपणे पाईऐ सरब पिआरु ॥
मुकति पदारथु पाईऐ अवगण मेटणहारु ॥१॥
भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ ॥
पूछहु ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु धुनि जाणीऐ अकथु कहावै सोइ ॥
सफलिओ बिरखु हरीआवला छाव घणेरी होइ ॥
लाल जवेहर माणकी गुर भंडारै सोइ ॥२॥
गुर भंडारै पाईऐ निरमल नाम पिआरु ॥
साचो वखरु संचीऐ पूरै करमि अपारु ॥
सुखदाता दुख मेटणो सतिगुरु असुर संघारु ॥३॥
भवजलु बिखमु डरावणो ना कंधी ना पारु ॥
ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना तिसु वंझु मलारु ॥
सतिगुरु भै का बोहिथा नदरी पारि उतारु ॥४॥
इकु तिलु पिआरा विसरै दुखु लागै सुखु जाइ ॥
जिहवा जलउ जलावणी नामु न जपै रसाइ ॥
घटु बिनसै दुखु अगलो जमु पकड़ै पछुताइ ॥५॥
मेरी मेरी करि गए तनु धनु कलतु न साथि ॥
बिनु नावै धनु बादि है भूलो मारगि आथि ॥
साचउ साहिबु सेवीऐ गुरमुखि अकथो काथि ॥६॥
आवै जाइ भवाईऐ पइऐ किरति कमाइ ॥
पूरबि लिखिआ किउ मेटीऐ लिखिआ लेखु रजाइ ॥
बिनु हरि नाम न छुटीऐ गुरमति मिलै मिलाइ ॥७॥
तिसु बिनु मेरा को नही जिस का जीउ परानु ॥
हउमै ममता जलि बलउ लोभु जलउ अभिमानु ॥
नानक सबदु वीचारीऐ पाईऐ गुणी निधानु ॥८॥१०॥
सतिगुरु पूरा जे मिलै पाईऐ रतनु बीचारु ॥
मनु दीजै गुर आपणे पाईऐ सरब पिआरु ॥
मुकति पदारथु पाईऐ अवगण मेटणहारु ॥१॥
भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ ॥
पूछहु ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु धुनि जाणीऐ अकथु कहावै सोइ ॥
सफलिओ बिरखु हरीआवला छाव घणेरी होइ ॥
लाल जवेहर माणकी गुर भंडारै सोइ ॥२॥
गुर भंडारै पाईऐ निरमल नाम पिआरु ॥
साचो वखरु संचीऐ पूरै करमि अपारु ॥
सुखदाता दुख मेटणो सतिगुरु असुर संघारु ॥३॥
भवजलु बिखमु डरावणो ना कंधी ना पारु ॥
ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना तिसु वंझु मलारु ॥
सतिगुरु भै का बोहिथा नदरी पारि उतारु ॥४॥
इकु तिलु पिआरा विसरै दुखु लागै सुखु जाइ ॥
जिहवा जलउ जलावणी नामु न जपै रसाइ ॥
घटु बिनसै दुखु अगलो जमु पकड़ै पछुताइ ॥५॥
मेरी मेरी करि गए तनु धनु कलतु न साथि ॥
बिनु नावै धनु बादि है भूलो मारगि आथि ॥
साचउ साहिबु सेवीऐ गुरमुखि अकथो काथि ॥६॥
आवै जाइ भवाईऐ पइऐ किरति कमाइ ॥
पूरबि लिखिआ किउ मेटीऐ लिखिआ लेखु रजाइ ॥
बिनु हरि नाम न छुटीऐ गुरमति मिलै मिलाइ ॥७॥
तिसु बिनु मेरा को नही जिस का जीउ परानु ॥
हउमै ममता जलि बलउ लोभु जलउ अभिमानु ॥
नानक सबदु वीचारीऐ पाईऐ गुणी निधानु ॥८॥१०॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ परमात्मा के गुणों की विचार (जैसे~ कीमती) रत्न है (यह रत्न तभी) मिलता है यदि पूरा गुरू मिल जाए। अपना मन गुरू के हवाले कर देना चाहिए। (इस तरह) सब से प्यार करने वाला प्रभू मिलता है। (गुरू की कृपा से) नाम पदार्थ मिलता है~ जो विकारों से निजात दिलवाता है और जो अवगुण मिटाने के स्मर्थ है।1। हे भाई ! गुरू के बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं पड़ सकती~ (बेशक) कोई ब्रह्मा को~ नारद को~ वेदों वाले ऋषि ब्यास को पूछ लो।1।रहाउ। परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालनी~ परमात्मा की याद में सुरति जोड़नी~ परमात्मा के चरणों में लिव लगानी- (गुरू से ही) यह समझ आती है। गुरू ही उस प्रभू की सिफत सलाह करवाता है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते। गुरू (मानों) एक हरा व फलदार वृक्ष है~ जिसकी गहरी सघन छाया है। लालों~ जवाहरों और मोतियों से भरपूर (भाव~ ऊँचे व स्वच्छ आत्मिक गुण) वह परमात्मा गुरू के खजाने से ही मिलता है।2। परमात्मा के पवित्र नाम का प्यार गुरू के खजाने में ही प्राप्त होता है। बेअंत प्रभू का नाम रूप सदा स्थिर सौदा पूरे गुरू की मेहर से ही एकत्र किया जा सकता है। गुरू (नाम की बख्शिश से) सुखों को देने वाला है। दुखों को मिटाने वाला है। गुरू (कामादिक) दैंतों का नाश करने वाला है।3। ये संसार समुंद्र बहुत बिखड़ा है बड़ा डरावना है। इसका ना कोई किनारा दिखाई देता है ना ही दूसरा छोर। ना कोई बेड़ी (नाव) ना कोई तुलहा ना कोई मल्लाह आर ना ही मल्लाह का चप्पू- कोई भी इस संसार समुंद्र से पार लंघा नहीं सकता। (संसार समुंद्र के) खतरों से बचाने वाला जहाज गुरू ही है। गुरू की मेहर की नजर से इस समुंद्र के उस पार उतारा हो सकता है।4। जब एक रॅती जितने पल के लिए भी प्यारा प्रभू (स्मृति से) भूल जाता है~ तब जीव को दुख आ घेरता है और उसका सुख आनंद दूर हो जाता है। जल जाए वह जलने योग्य जिव्हा जो स्वाद से प्रभू का नाम नहीं जपती। (सिमरनहीन बंदे का जब) शरीर नाश होता है~ उसे बहुत दुख व्यापता है। जब उसे जम आ पकड़ता है तब वह पछताता है (पर उस वक्त पछताने का क्या लाभ?)।5। (संसार में बेअंत ही जीव आए~ जो यह) कह कह के चले गए कि यह मेरा शरीर है~ यह मेरा धन है~ ये मेरी स्त्री है; पर ना शरीर ना धन ना स्त्री (कोई भी) साथ नहीं निभा। परमात्मा के नाम के बिना धन किसी अर्थ का नहीं। माया के रास्ते पड़ के (मनुष्य जिंदगी के सही राह से) भटक जाता है। (इस वास्ते~ हे भाई !) सदा कायम रहने वाले मालिक को याद करना चाहिए। पर~ उस बेअंत गुणों वाले मालिक की सिफत सलाह गुरू के द्वारा ही की जा सकती है।6। जीव अपने पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार (आगे भी वैसे ही) कर्म कमाता रहता है। (इसका नतीजा ये निकलता है कि) जीव पैदा होता है मरता है~ पैदा होता है मरता है। इस चक्कर में पड़ा रहता है। पिछले कर्मों के अनुसार लिखा (माथे का) लेख परमात्मा के हुकम में लिखा जाता है। इसे कैसे मिटाया जा सकता है? (इन लिखे लेखों की संगली की जकड़ में से) परमात्मा के नाम के बिना खलासी नहीं हो सकती। जब गुरू की मति मिलती है तब ही (प्रभू जीव को अपने चरणों में जोड़ता है)।7। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर मुझे यह समझ आती है कि) जिस परमात्मा की दी हुई ये जीवात्मा है प्राण हैं~ उस के बिनां (संसार में) मेरा कोई और आसरा नहीं। मेरा यह अहम् जल जाए~ मेरी यह अपणत जल जाए~ मेरा यह लोभ जल जाए और मेरा यह अहंकार जल बल जाए (जिन्होंने मुझे परमात्मा के नाम से विछोड़ा है)। हे नानक ! गुरू के शबद को विचारना चाहिए~ (गुरू के शबद में जुड़ने से ही) गुणों का खजाना परमात्मा मिलता है।8।10।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਜਲ ਕਮਲੇਹਿ ॥
ਲਹਰੀ ਨਾਲਿ ਪਛਾੜੀਐ ਭੀ ਵਿਗਸੈ ਅਸਨੇਹਿ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਜੀਅ ਉਪਾਇ ਕੈ ਬਿਨੁ ਜਲ ਮਰਣੁ ਤਿਨੇਹਿ ॥੧॥
ਰੇ ਮਨ ਐਸੀ ਹਰਿ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜੈਸੀ ਜਲ ਕਮਲੇਹਿ ॥
ਲਹਰੀ ਨਾਲਿ ਪਛਾੜੀਐ ਭੀ ਵਿਗਸੈ ਅਸਨੇਹਿ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਜੀਅ ਉਪਾਇ ਕੈ ਬਿਨੁ ਜਲ ਮਰਣੁ ਤਿਨੇਹਿ ॥੧॥
सिरीरागु महला १ ॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि ॥
लहरी नालि पछाड़ीऐ भी विगसै असनेहि ॥
जल महि जीअ उपाइ कै बिनु जल मरणु तिनेहि ॥१॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि ॥
लहरी नालि पछाड़ीऐ भी विगसै असनेहि ॥
जल महि जीअ उपाइ कै बिनु जल मरणु तिनेहि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर~ जैसा पानी और कमल के फूल का है (और कमल फूल का पानी के साथ)। कमल का फूल पानी की लहरों से धक्के खाता है~ फिर भी (परस्पर) प्यार के कारण कमल फूल खिलता (ही) है (धक्कों से गुस्से नहीं होता)। पानी में (कमल के फूलों को) पैदा करके (परमात्मा ऐसी खेल खेलता है कि) पानी के बगैर उनकी (कमल फूलों) की मौत हो जाती है।1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 59 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 59” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 60 →, पीछे का: ← अंग 58।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।