राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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भाई रे अवरु नाही मै थाउ ॥ मै धनु नामु निधानु है गुरि दीआ बलि जाउ ॥1॥ रहाउ ॥ गुरमति पति साबासि तिसु तिस कै संगि मिलाउ ॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु नावै मरि जाउ ॥ मै अंधुले नामु न वीसरै टेक टिकी घरि जाउ ॥2॥ गुरू जिना का अंधुला चेले नाही ठाउ ॥ बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बिनु नावै किआ सुआउ ॥ आइ गइआ पछुतावणा जिउ सुंञै घरि काउ ॥3॥ बिनु नावै दुखु देहुरी जिउ कलर की भीति ॥ तब लगु महलु न पाईऐ जब लगु साचु न चीति ॥ सबदि रपै घरु पाईऐ निरबाणी पदु नीति ॥4॥ हउ गुर पूछउ आपणे गुर पुछि कार कमाउ ॥ सबदि सलाही मनि वसै हउमै दुखु जलि जाउ ॥ सहजे होइ मिलावड़ा साचे साचि मिलाउ ॥5॥ सबदि रते से निरमले तजि काम क्रोधु अहंकारु ॥ नामु सलाहनि सद सदा हरि राखहि उर धारि ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सभ जीआ का आधारु ॥6॥ सबदि मरै सो मरि रहै फिरि मरै न दूजी वार ॥ सबदै ही ते पाईऐ हरि नामे लगै पिआरु ॥ बिनु सबदै जगु भूला फिरै मरि जनमै वारो वार ॥7॥ सभ सालाहै आप कउ वडहु वडेरी होइ ॥ गुर बिनु आपु न चीनीऐ कहे सुणे किआ होइ ॥ नानक सबदि पछाणीऐ हउमै करै न कोइ ॥8॥8॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (नाम खजाना हासिल करने के लिए) मुझे (गुरू के बिनां) और कोई जगह नहीं दिखती मेरे वास्ते तो प्रभू नाम ही धन है, नाम ही खजाना है (ये खजाना जिस किसी को दिया है) गुरू ने (ही) दिया है। मैं गुरू पे कुर्बान हूँ।1।रहाउ। साबाश है उस (गुरू) को जिस गुरू की मति मिलने से इज्जत मिलती है। (प्रभू मेहर करे) मैं उस (गुरू) की संगति में जुड़ा रहूँ। (नाम की दाति देने वाले) उस गुरू के बिना मैं एक घड़ी भी नहीं रह सकता। क्योंकि, नाम के बिना मेरी आत्मिक मौत हो जाती है। (नाम के बिना मैं माया के मोह में अंधा हो जाता हूँ, प्रभू मेहर करे) मुझ अंधे को उसका नाम ना भूल जाए। मैं गुरू के आसरे की टेक ले के प्रभू चरणों में जुड़ा रहूँ।2। (पर गुरू भी हो तो आँखों वाला हो) जिनका गुरू (खुद ही माया के मोह में) अंधा हो गया हो, उनके चेलों को (आत्मिक सुख का) स्थान टिकाना नहीं मिल सकता। (पूरे) गुरू के बिना प्रभू का नाम नहीं मिलता। नाम के बिना और कोई (बढ़िया) जीवन मनोरथ हो ही नहीं सकता। नाम से वंचित रहा मनुष्य दुनिया में आया और चला गया, पछतावा ही (साथ ले गया, खाली हाथ ही जग से गया)। जैसे सूने घर में आया कौआ (भी खली ही जाता है)।3। नाम सिमरन के बिना शरीर को (चिंता आदि इतना) दुख सताते हैं (कि शारीरिक सक्ता इस प्रकार छीण होती जाती है) जैसे कलर की दीवार (झड़ती जाती है)। (इस झुरने को बचाने के लिए) तब तक (प्रभू का) महल (रूपी सहारा) नहीं मिलता, जब तक वह सदा स्थिर प्रभू (जीव के) चित्त में नहीं आ बसता। यदि गुरू के शबद में मन रंगा जाए, तो प्रभू की हजूरी (की ओट) मिल जाती है, और वह आत्मिक अवस्था सदा के लिए प्राप्त हो जाती है जहां कोई वासना अपना प्रभाव नहीं डाल सकती।4। (सो, हे भाई ! इस निर्वाण पद की प्राप्ति के वास्ते) मैं अपने गुरू को पूछूँगी। गुरू से पूछ के (उस द्वारा बताए) कर्म करूँगी। मैं गुरू के शबद में जुड़ के प्रभू की सिफत सलाह करूँगी। (भला कहीं प्रभू मेरे) मन में आ बसे (प्रभू की मेहर हो, मेरा) अहम् का दुख जल जाए, सहज अवस्था में टिक के मेरा प्रभू से सुंदर मिलाप हो जाए। सदा टिके रहने वाले प्रभू में मेरा सदा के लिए मेल हो जाए।5। जो लोग गुरू के शबद में रंगे जाते हैं वह काम क्रोध (आदि विकारों) को त्याग के पवित्र (जीवन वाले) हो जाते हैं। वह सदा प्रभू का नाम सलाहते हैं, वे परमात्मा की याद को सदैव अपने दिल में टिका के रखते हैं। (हे भाई !) जो प्रभू सारे जीवों (की जिंदगी का) आसरा है, उसे कभी भी मन से भुलाना नहीं चाहिए।6। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के (विकारों की ओर से) मर जाता है (बेअसर हो जाता है) वह (ऐसी मरनी) मर के स्थिर हो जाता है (विकारों से टक्कर के लिए तगड़ा हो जाता है, वह मनुष्य विकारों की जकड़ में आ के) फिर कभी आत्मिक मौत नहीं मरता। (ये अटल आत्मिक जीवन) गुरू के शबद से ही मिलता है। (गुरू के शबद से ही) प्रभू के नाम में प्यार बनता है। गुरू के शबद के बिनां जगत (जीवन राह से) गुमराह हो के भटकता है, और बारंबार जन्म मरण के चक्रव्यूह में फंसा रहता है।7। सारी दुनिया अपने आप को सालाहती है कि हमारी ज्यादा से ज्यादा प्रशंसा सत्कार हैं (अपने आप की सूझ के बिना ही यह लालसा बनी रहती है)। गुरू की शरण पड़े बगैर अपने आप की पहिचान नहीं हैं सकती। ज्ञान की बातें निरी कहने सुनने से कुछ नहीं बनता। हे नानक ! गुरू के शबद से ही अपने आप को पहचाना जा सकता है (और जो मनुष्य अपने आप की पहिचान कर लेता है) वहअपनी प्रशंसा की बातें नहीं करता।8।8।
सिरीरागु महला 1 ॥ बिनु पिर धन सीगारीऐ जोबनु बादि खुआरु ॥ ना माणे सुखि सेजड़ी बिनु पिर बादि सीगारु ॥ दूखु घणो दोहागणी ना घरि सेज भतारु ॥1॥ मन रे राम जपहु सुखु होइ ॥ बिनु गुर प्रेमु न पाईऐ सबदि मिलै रंगु होइ ॥1॥ रहाउ ॥ गुर सेवा सुखु पाईऐ हरि वरु सहजि सीगारु ॥ सचि माणे पिर सेजड़ी गूड़ा हेतु पिआरु ॥ गुरमुखि जाणि सिञाणीऐ गुरि मेली गुण चारु ॥2॥ सचि मिलहु वर कामणी पिरि मोही रंगु लाइ ॥ मनु तनु साचि विगसिआ कीमति कहणु न जाइ ॥ हरि वरु घरि सोहागणी निरमल साचै नाइ ॥3॥ मन महि मनूआ जे मरै ता पिरु रावै नारि ॥ इकतु तागै रलि मिलै गलि मोतीअन का हारु ॥ संत सभा सुखु ऊपजै गुरमुखि नाम अधारु ॥4॥ खिन महि उपजै खिनि खपै खिनु आवै खिनु जाइ ॥ सबदु पछाणै रवि रहै ना तिसु कालु संताइ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (अगर, स्त्री गहनों आदि से) अपने आप को सजा ले, पर उसे पति ना मिले तो उसकी जवानी व्यर्थ जाती है। उसकी आत्मा भी दुखी होती है। क्योंकि, आनंद से पति की सुंदर सेज का आनंद नहीं ले सकती। पति मिलाप के बगैर उसका सारा श्रृंगार व्यर्थ जाता है। उस दुर्भाग्यपूर्ण स्त्री को बहुत दुख होता है, उसके घर में सेज का मालिक खसम नहीं आता (जीवस्त्री के सारे बाहरमुखी धार्मिक कर्म व्यर्थ जाते हैं, अगर हृदय सेज का मालिक प्रभू हृदय में प्रगट ना हो)।1। हे मन ! परमात्मा का नाम सिमर, (आपको) सुख होंगे। (पर मन भी क्या करे? जिसके साथ प्यार ना हो, उसको बार बार कैसे याद किया जाए? परमात्मा के साथ ये) प्यार गुरू के बिनां नहीं बन सकता। जो मन गुरू के शबद में जुड़ता है उसको प्रभू के नाम का रंग चढ़ जाता है।1।रहाउ। गुरू द्वारा बताई सेवा से ही आत्मिक आनंद मिलता है। प्रभू पति उसी जीव स्त्री को प्राप्त होता है जिसने अडोल आत्मिक अवस्था में (जुड़के) अपने आप को श्रृंगारा हैं वही जीव-स्त्री प्रभू पति की सुंदर सेज का आनंद ले सकती है जो उस सदा स्थिर प्रभू में (जुड़ी रहती है), जिसका प्रभू पति के साथ गहरा हित है, गहरा प्यार है। गुरू के सन्मुख रहके ही प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के उसे मनाया जा सकता है (भाव, ये समझ आती है कि वह हमारा है), वह सुंदर गुणों का मालिक प्रभू (जिस जीव-स्त्री को मिला है) गुरू ने मिलाया है।2। हे प्रभू पति की सुंदर स्त्री ! उस सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में (सदा) मिली रह। पति प्रभू ने (जिस जीव-स्त्री के मन को अपने प्यार का) रंग चढ़ा के (अपनी ओर) खींच लिया है, उसका मन, उसका तन सदा स्थिर प्रभू में जुड़के खिल पड़ा है (उसका जीवन इतना अमोलक बन जाता है कि) उसका मुल्य नहीं पड़ सकता। वह सोहाग भाग वाली जीव-स्त्री सदा स्थिर हरी के नाम में (जुड़ के) पवित्र आत्मा हो जाती है, और प्रभू पति को अपने (दिल) घर में (ही ढूंढ लेती है)।3। यदि (जीव-स्त्री का) छोटा सा मन (प्रभू पति के विशाल) मन में (छोटे स्वाभाव से) मर जाए, तो जैसे एक ही धागे में परोए हुए मोतियों का हार गले में डाल लेते हैं, उसी तरह यदि (जीव स्त्री प्रभू के ही) एक-सुरति धागे एक मेक हो के प्रभू में लीन हो जाए तो प्रभू पति उस जीव नारी को प्यार करता है। पर यह आत्मिक आनंद सत्संग में टिकने से ही मिलता है, और सत्संग में गुरू की शरण पड़ के (मन को) प्रभू के नाम का सहारा मिलता है।4। (अगर मन नाम से वंचित रहे, तो माया, धन-संपदा आदि के लाभ से) एक छिन में ही (ऐसे होता है जैसे) जी पड़ता है (और माया आदि की कमी से) एक पल में ही दुखी हो जाता है। एक छिन (गुजरता है तो) वह पैदा हो जाता है, एक छिन (गुजरता है तो) वह मर जाता है (भाव, नाम के सहारे के बिना माया जीव के जीवन का आसरा बन जाती है। अगर माया आए तो उत्साह, अगर जाए तो सहम)। जो मनुष्य गुरू के शबद से सांझ डालता है (प्रभू के चरणों में जुड़ने से ये तो नहीं हो सकता कि) उस मालिक (की हस्ती) को तोला जा सके।
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (नाम खजाना हासिल करने के लिए) मुझे (गुरू के बिनां) और कोई जगह नहीं दिखती मेरे वास्ते तो प्रभू नाम ही धन है, नाम ही खजाना है (ये खजाना जिस किसी को दिया है) गुरू ने (ही) दिय।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।