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अंग 59

अंग
59
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
साहिबु अतुलु न तोलीऐ कथनि न पाइआ जाइ ॥5॥
वापारी वणजारिआ आए वजहु लिखाइ ॥
कार कमावहि सच की लाहा मिलै रजाइ ॥
पूंजी साची गुरु मिलै ना तिसु तिलु न तमाइ ॥6॥
गुरमुखि तोलि तोुलाइसी सचु तराजी तोलु ॥
आसा मनसा मोहणी गुरि ठाकी सचु बोलु ॥
आपि तुलाए तोलसी पूरे पूरा तोलु ॥7॥
कथनै कहणि न छुटीऐ ना पड़ि पुसतक भार ॥
काइआ सोच न पाईऐ बिनु हरि भगति पिआर ॥
नानक नामु न वीसरै मेले गुरु करतार ॥8॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: वह तौल से परे है (हां, ये जरूर है कि वह मिलता सिमरन से ही है) निरी बातों से नहीं मिलता।5। सारे जीव बंजारे जीव व्यापारी (परमात्मा के दर से) दिहाड़ी (तनखाह) लिखा के (जगत में आते हैं। भाव, हरेक को जिंदगी के स्वाश व सारे पदार्थों की दाति प्रभू दर से मिलती है)। जो जीव व्यापारी सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की कार करते हैं, उनको प्रभू की रजा के अनुसार (आत्मिक जीवन का) लाभ मिलता है। (पर ये लाभ वही कमा सकते हैं जिनको) वह गुरू मिल जाता है जिस को (अपनी प्रशंसा आदि का) तिल जिनता भी लालच नहीं। (जिन को गुरू मिलता है उनकी आत्मिक जीवन वाली) राशि पूँजी सदा के लिए स्थिर हो जाती है।6। (इन्सानी जीवन की सफलता की परख के वास्ते) सच ही तराजू है और सच ही बाँट है (जिसके पल्ले सच है वही सफल है)। इस परख तोल में वही मनुष्य पूरा उतरता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। क्योंकि, गुरू ने (परमात्मा की सिफति सलाह की) सच्ची बाणी दे के मन को मोह लेने वाली आशाओं और मन के माया के फुरनों को (मन पर वार करने से) रोक रखा होता है। पूरे प्रभू का यह तोल (का रुतबा) कभी घटता-बढ़ता नहीं। वही जीव (इस तोल में) पूरा तुलता है जिसको प्रभू (सिमरन की दात दे के) खुद (मेहर की निगाह से) तुलवाता है।7। निरी बातें करने से या पुस्तकों के ढेरों के ढेर पढ़ने से आसा-मनसा से बचा नहीं जा सकता। (यदि हृदय में) परमात्मा की भक्ति नहीं, प्रभु का प्रेम नहीं, तो निरे शरीर की पवित्रता से परमात्मा नहीं मिलता। हे नानक ! जिस को (गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का) नाम नहीं भूलता, उसको गुरू परमात्मा के मेल में मिला देता है।8।9।
सिरीरागु महला 1 ॥
सतिगुरु पूरा जे मिलै पाईऐ रतनु बीचारु ॥
मनु दीजै गुर आपणे पाईऐ सरब पिआरु ॥
मुकति पदारथु पाईऐ अवगण मेटणहारु ॥1॥
भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ ॥
पूछहु ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु धुनि जाणीऐ अकथु कहावै सोइ ॥
सफलिओ बिरखु हरीआवला छाव घणेरी होइ ॥
लाल जवेहर माणकी गुर भंडारै सोइ ॥2॥
गुर भंडारै पाईऐ निरमल नाम पिआरु ॥
साचो वखरु संचीऐ पूरै करमि अपारु ॥
सुखदाता दुख मेटणो सतिगुरु असुर संघारु ॥3॥
भवजलु बिखमु डरावणो ना कंधी ना पारु ॥
ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना तिसु वंझु मलारु ॥
सतिगुरु भै का बोहिथा नदरी पारि उतारु ॥4॥
इकु तिलु पिआरा विसरै दुखु लागै सुखु जाइ ॥
जिहवा जलउ जलावणी नामु न जपै रसाइ ॥
घटु बिनसै दुखु अगलो जमु पकड़ै पछुताइ ॥5॥
मेरी मेरी करि गए तनु धनु कलतु न साथि ॥
बिनु नावै धनु बादि है भूलो मारगि आथि ॥
साचउ साहिबु सेवीऐ गुरमुखि अकथो काथि ॥6॥
आवै जाइ भवाईऐ पइऐ किरति कमाइ ॥
पूरबि लिखिआ किउ मेटीऐ लिखिआ लेखु रजाइ ॥
बिनु हरि नाम न छुटीऐ गुरमति मिलै मिलाइ ॥7॥
तिसु बिनु मेरा को नही जिस का जीउ परानु ॥
हउमै ममता जलि बलउ लोभु जलउ अभिमानु ॥
नानक सबदु वीचारीऐ पाईऐ गुणी निधानु ॥8॥10॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ परमात्मा के गुणों की विचार (जैसे, कीमती) रत्न है (यह रत्न तभी) मिलता है यदि पूरा गुरू मिल जाए। अपना मन गुरू के हवाले कर देना चाहिए। (इस तरह) सब से प्यार करने वाला प्रभू मिलता है। (गुरू की कृपा से) नाम पदार्थ मिलता है, जो विकारों से निजात दिलवाता है और जो अवगुण मिटाने के स्मर्थ है।1। हे भाई ! गुरू के बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं पड़ सकती, (बेशक) कोई ब्रह्मा को, नारद को, वेदों वाले ऋषि ब्यास को पूछ लो।1।रहाउ। परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालनी, परमात्मा की याद में सुरति जोड़नी, परमात्मा के चरणों में लिव लगानी- (गुरू से ही) यह समझ आती है। गुरू ही उस प्रभू की सिफत सलाह करवाता है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते। गुरू (मानों) एक हरा व फलदार वृक्ष है, जिसकी गहरी सघन छाया है। लालों, जवाहरों और मोतियों से भरपूर (भाव, ऊँचे व स्वच्छ आत्मिक गुण) वह परमात्मा गुरू के खजाने से ही मिलता है।2। परमात्मा के पवित्र नाम का प्यार गुरू के खजाने में ही प्राप्त होता है। बेअंत प्रभू का नाम रूप सदा स्थिर सौदा पूरे गुरू की मेहर से ही एकत्र किया जा सकता है। गुरू (नाम की बख्शिश से) सुखों को देने वाला है। दुखों को मिटाने वाला है। गुरू (कामादिक) दैंतों का नाश करने वाला है।3। ये संसार समुंद्र बहुत बिखड़ा है बड़ा डरावना है। इसका ना कोई किनारा दिखाई देता है ना ही दूसरा छोर। ना कोई बेड़ी (नाव) ना कोई तुलहा ना कोई मल्लाह आर ना ही मल्लाह का चप्पू- कोई भी इस संसार समुंद्र से पार लंघा नहीं सकता। (संसार समुंद्र के) खतरों से बचाने वाला जहाज गुरू ही है। गुरू की मेहर की नजर से इस समुंद्र के उस पार उतारा हो सकता है।4। जब एक रॅती जितने पल के लिए भी प्यारा प्रभू (स्मृति से) भूल जाता है, तब जीव को दुख आ घेरता है और उसका सुख आनंद दूर हो जाता है। जल जाए वह जलने योग्य जिव्हा जो स्वाद से प्रभू का नाम नहीं जपती। (सिमरनहीन बंदे का जब) शरीर नाश होता है, उसे बहुत दुख व्यापता है। जब उसे जम आ पकड़ता है तब वह पछताता है (पर उस वक्त पछताने का क्या लाभ?)।5। (संसार में बेअंत ही जीव आए, जो यह) कह कह के चले गए कि यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, ये मेरी स्त्री है; पर ना शरीर ना धन ना स्त्री (कोई भी) साथ नहीं निभा। परमात्मा के नाम के बिना धन किसी अर्थ का नहीं। माया के रास्ते पड़ के (मनुष्य जिंदगी के सही राह से) भटक जाता है। (इस वास्ते, हे भाई !) सदा कायम रहने वाले मालिक को याद करना चाहिए। पर, उस बेअंत गुणों वाले मालिक की सिफत सलाह गुरू के द्वारा ही की जा सकती है।6। जीव अपने पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार (आगे भी वैसे ही) कर्म कमाता रहता है। (इसका नतीजा ये निकलता है कि) जीव पैदा होता है मरता है, पैदा होता है मरता है। इस चक्कर में पड़ा रहता है। पिछले कर्मों के अनुसार लिखा (माथे का) लेख परमात्मा के हुकम में लिखा जाता है। इसे कैसे मिटाया जा सकता है? (इन लिखे लेखों की संगली की जकड़ में से) परमात्मा के नाम के बिना खलासी नहीं हो सकती। जब गुरू की मति मिलती है तब ही (प्रभू जीव को अपने चरणों में जोड़ता है)।7। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर मुझे यह समझ आती है कि) जिस परमात्मा की दी हुई ये जीवात्मा है प्राण हैं, उस के बिनां (संसार में) मेरा कोई और आसरा नहीं। मेरा यह अहम् जल जाए, मेरी यह अपणत जल जाए, मेरा यह लोभ जल जाए और मेरा यह अहंकार जल बल जाए (जिन्होंने मुझे परमात्मा के नाम से विछोड़ा है)। हे नानक ! गुरू के शबद को विचारना चाहिए, (गुरू के शबद में जुड़ने से ही) गुणों का खजाना परमात्मा मिलता है।8।10।
सिरीरागु महला 1 ॥
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि ॥
लहरी नालि पछाड़ीऐ भी विगसै असनेहि ॥
जल महि जीअ उपाइ कै बिनु जल मरणु तिनेहि ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर, जैसा पानी और कमल के फूल का है (और कमल फूल का पानी के साथ)। कमल का फूल पानी की लहरों से धक्के खाता है, फिर भी (परस्पर) प्यार के कारण कमल फूल खिलता (ही) है (धक्कों से गुस्से नहीं होता)। पानी में (कमल के फूलों को) पैदा करके (परमात्मा ऐसी खेल खेलता है कि) पानी के बगैर उनकी (कमल फूलों) की मौत हो जाती है।1।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह तौल से परे है (हां, ये जरूर है कि वह मिलता सिमरन से ही है) निरी बातों से नहीं मिलता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।