भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥
ओना कउ धुरि भगति खजाना बखसिआ मेटि न सकै कोइ ॥
गुण निधानु मनि पाइआ एको सचा सोइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहे फिरि विछोड़ा कदे न होइ ॥1॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥
सबदै सार न जाणई बिखु भूला गावारु ॥
अगिआनी अंधु बहु करम कमावै दूजै भाइ पिआरु ॥
अणहोदा आपु गणाइदे जमु मारि करे तिन खुआरु ॥
नानक किस नो आखीऐ जा आपे बखसणहारु ॥2॥
तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥
जिसु तू भावै तिसु तू मेलि लैहि किआ जंत विचारे ॥
तू करण कारण समरथु है सचु सिरजणहारे ॥
जिसु तू मेलहि पिआरिआ सो तुधु मिलै गुरमुखि वीचारे ॥
हउ बलिहारी सतिगुर आपणे जिनि मेरा हरि अलखु लखारे ॥8॥
रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥
रतना सार न जाणई अगिआनी अंधु अंधारु ॥
रतनु गुरू का सबदु है बूझै बूझणहारु ॥
मूरख आपु गणाइदे मरि जंमहि होइ खुआरु ॥
नानक रतना सो लहै जिसु गुरमुखि लगै पिआरु ॥
सदा सदा नामु उचरै हरि नामो नित बिउहारु ॥
क्रिपा करे जे आपणी ता हरि रखा उर धारि ॥1॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥
मत तुम जाणहु ओइ जीवदे ओइ आपि मारे करतारि ॥
हउमै वडा रोगु है भाइ दूजै करम कमाइ ॥
नानक मनमुखि जीवदिआ मुए हरि विसरिआ दुखु पाइ ॥2॥
जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥
जिसु अंदरि नामु निधानु है तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥
जिसु अंदरि बुधि बिबेकु है हरि नामु मुरारी ॥
सो सतिगुरु सभना का मितु है सभ तिसहि पिआरी ॥
सभु आतम रामु पसारिआ गुर बुधि बीचारी ॥9॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जंमहि आवहि जाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका (जीवों पर) ये बहुत बड़ा उपकार है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।