Lulla Family

अंग 589

अंग
589
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सो सतिगुरु तिन कउ भेटिआ जिन कै मुखि मसतकि भागु लिखि पाइआ ॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: उसका (जीवों पर) ये बहुत बड़ा उपकार है।ऐसा गुरू उन्हें मिला है जिनके माथे पर मुँह पर (पिछले किए अच्छे कर्मों के संस्कारों के) भाग्य लिखे हुए हैं। 7।
सलोकु मः 3 ॥
भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥
ओना कउ धुरि भगति खजाना बखसिआ मेटि न सकै कोइ ॥
गुण निधानु मनि पाइआ एको सचा सोइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहे फिरि विछोड़ा कदे न होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (संसार की ओर से) मर के (ईश्वर की ओर) जीने वाले मनुष्य (ही सच्ची) भक्ति करते हैं।असल भक्ति उनके पास ही हो सकती है जो अपने आप को गुरू के हवाले कर देते हैं; ऐसे लोगों को धुर से परमात्मा ने भक्ति के खजाने की दाति बख्शी हुई है।कोई उस बख्शिश को मिटा नहीं सकता; उन्होंने उस गुणों के खजाने प्रभू को अपने मन में पा लिया है जो एक खुद ही खुद है और सदा-स्थिर रहने वाला है। हे नानक ! जो मनुष्य अपने आप को गुरू के हवाले कर देते हैं।वे प्रभू में जुड़े रहते हैं।और फिर कभी उनको (प्रभू चरणों से) विछोड़ा नहीं होता। 1।
मः 3 ॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥
सबदै सार न जाणई बिखु भूला गावारु ॥
अगिआनी अंधु बहु करम कमावै दूजै भाइ पिआरु ॥
अणहोदा आपु गणाइदे जमु मारि करे तिन खुआरु ॥
नानक किस नो आखीऐ जा आपे बखसणहारु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मनुष्य ने गुरू द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए।वह और क्या सोचता है।(भाव।उसके और किसी विचार की जरूरत नहीं)। वह मूर्ख जहर (को देख के) भूला हुआ गुरू के शबद की कद्र नहीं जानता। वह अंधा-अज्ञानी (अन्य) बहुत सारे कर्म करता है (कर्म-धार्मिक रस्में) पर उसकी सुरति माया के प्यार में (ही लगी रहती है)। जो मनुष्य अपने अंदर कोई गुण ना होते हुए अपने आप को (बड़ा) जताते हैं।उन्हें मन की मार ख्वार करती है;पर। हे नानक ! किसी को क्या कहना।परमात्मा खुद ही बख्शिशें करने वाला है (भाव।इस मनमुखता से प्रभू खुद बचाने में समर्थ है।और कोई जीव सहायता नहीं कर सकता)। 2।
पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥
जिसु तू भावै तिसु तू मेलि लैहि किआ जंत विचारे ॥
तू करण कारण समरथु है सचु सिरजणहारे ॥
जिसु तू मेलहि पिआरिआ सो तुधु मिलै गुरमुखि वीचारे ॥
हउ बलिहारी सतिगुर आपणे जिनि मेरा हरि अलखु लखारे ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सृजनहार ! आप सब कुछ जानता है और सारे जीव आपके हैं। जीव बिचारों के वश में क्या है।जो आपको अच्छा लगता है उसे आप (अपने चरणों में) मिला लेता है। हे सदा कायम रहने वाले करतार ! आप सब कुछ करने की ताकत रखता है। हे प्यारे ! जिसे आप खुद मिलाता है वह गुरू के (शबद) के माध्यम से आपके गुणों का विचार करके आपको मिल जाता है। मैं प्यारे सतिगुरू पर से सदके हूं जिसने मुझे अदृश्य परमात्मा की समझ बख्श दी है। 8।
सलोक मः 3 ॥
रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥
रतना सार न जाणई अगिआनी अंधु अंधारु ॥
रतनु गुरू का सबदु है बूझै बूझणहारु ॥
मूरख आपु गणाइदे मरि जंमहि होइ खुआरु ॥
नानक रतना सो लहै जिसु गुरमुखि लगै पिआरु ॥
सदा सदा नामु उचरै हरि नामो नित बिउहारु ॥
क्रिपा करे जे आपणी ता हरि रखा उर धारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ जो मनुष्य रत्नों की कद्र जानता है।वही रत्नों की सोच-विचार कर (सकता) है। पर अंधा अज्ञानी मनुष्य रत्नों की कद्र नहीं पा सकता। कोई समझ वाला मनुष्य ही समझता है कि (असल) रत्न सतिगुरू का शबद है।पर। मूर्ख बँदे (गुरू शबद को समझने की बजाए) अपने आप को ही बड़ा जताते हैं और दुखी होते हैं हैं के पैदा होते मरते रहते हैं। हे नानक ! वही मनुष्य (गुरू-शबद रूप) रत्नों को हासिल करता है जिसे गुरू के माध्यम से (गुरू के शबद की) लगन लगती है; वह मनुष्य सदा प्रभू का नाम जपता है।नाम जपना ही उसका नित्य का व्यवहार बन जाता है। अगर परमात्मा अपनी मेहर करे।तो मैं भी उसका नाम हृदय में परो के रखूँ। 1।
मः 3 ॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥
मत तुम जाणहु ओइ जीवदे ओइ आपि मारे करतारि ॥
हउमै वडा रोगु है भाइ दूजै करम कमाइ ॥
नानक मनमुखि जीवदिआ मुए हरि विसरिआ दुखु पाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिन बँदों ने गुरू द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए।जिनकी लगन प्रभू के नाम में नहीं बनी। ये ना समझो कि वे लोग जीवित हैं।उनको करतार ने खुद ही (आत्मिक मौत) मार दिया है; माया के मोह में कर्म कर कर के उन्हें अहंकार का रोग (चिपका हुआ) है; हे नानक ! मन के पीछे चलने वाले लोग जीवित ही मरे हुए जानो।जो मनुष्य ईश्वर को भुलाता है;वह दुख पाता है। 2।
पउड़ी ॥
जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥
जिसु अंदरि नामु निधानु है तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥
जिसु अंदरि बुधि बिबेकु है हरि नामु मुरारी ॥
सो सतिगुरु सभना का मितु है सभ तिसहि पिआरी ॥
सभु आतम रामु पसारिआ गुर बुधि बीचारी ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिसका अंदरूनी हृदय पवित्र है।उसे सारे जीव नमस्कार करते हैं; जिसके हृदय में नाम (रूप) खजाना है उससे मैं सदके हूँ। जिसके अंदर (भली) मति है।(अच्छे बुरे की) पहचान है और हरी मुरारी का नाम है। वह सतिगुरू सब जीवों का मित्र है और सारी सृष्टि उसे प्यारी लगती है (क्योंकि) सतिगुरू की समझ ने तो ये समझा है कि सब जगह परमात्मा ने अपना आप पसारा हुआ है। 9।
सलोक मः 3 ॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जंमहि आवहि जाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ मनुष्य सतिगुरू की सेवा से वंचित हो के अहंकार के आसरे कर्म करते हैं।पर वह कर्म उनकी आत्मा के लिए बँधन हो जाते हैं। सतिगुरू के बताए हुए कर्म ना करने के कारण उन्हें कहीं भी जगह नहीं मिलती।वे मरते हैं (फिर) पैदा होते हैं।(संसार में) आते हैं।(फिर) चले जाते हैं; सतिगुरू द्वारा निर्देशित सेवा से वंचित रह कर उनके बोल भी फीके होते हैं और ‘नाम’ उनके मन में बसता नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका (जीवों पर) ये बहुत बड़ा उपकार है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।