अंदरि सहजु न आइओ सहजे ही लै खाइ ॥
मनहठि जिस ते मंगणा लैणा दुखु मनाइ ॥
इसु भेखै थावहु गिरहो भला जिथहु को वरसाइ ॥
सबदि रते तिना सोझी पई दूजै भरमि भुलाइ ॥
पइऐ किरति कमावणा कहणा कछू न जाइ ॥
नानक जो तिसु भावहि से भले जिन की पति पावहि थाइ ॥1॥
सतिगुरि सेविऐ सदा सुखु जनम मरण दुखु जाइ ॥
चिंता मूलि न होवई अचिंतु वसै मनि आइ ॥
अंतरि तीरथु गिआनु है सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥
मैलु गई मनु निरमलु होआ अंम्रित सरि तीरथि नाइ ॥
सजण मिले सजणा सचै सबदि सुभाइ ॥
घर ही परचा पाइआ जोती जोति मिलाइ ॥
पाखंडि जमकालु न छोडई लै जासी पति गवाइ ॥
नानक नामि रते से उबरे सचे सिउ लिव लाइ ॥2॥
तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥
सहजे ही हरि नामु लेहु हरि ततु न खोईऐ ॥
नित जपिअहु हरि हरि दिनसु राति हरि दरगह ढोईऐ ॥
सो पाए पूरा सतगुरू जिसु धुरि मसतकि लिलाटि लिखोईऐ ॥
तिसु गुर कंउ सभि नमसकारु करहु जिनि हरि की हरि गाल गलोईऐ ॥4॥
सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥
मिलि प्रीतम तिनी धिआइआ सचै प्रेमि पिआरु ॥
मन ही ते मनु मानिआ गुर कै सबदि अपारि ॥
एहि सजण मिले न विछुड़हि जि आपि मेले करतारि ॥
इकना दरसन की परतीति न आईआ सबदि न करहि वीचारु ॥
विछुड़िआ का किआ विछुड़ै जिना दूजै भाइ पिआरु ॥
मनमुख सेती दोसती थोड़ड़िआ दिन चारि ॥
इसु परीती तुटदी विलमु न होवई इतु दोसती चलनि विकार ॥
जिना अंदरि सचे का भउ नाही नामि न करहि पिआरु ॥
नानक तिन सिउ किआ कीचै दोसती जि आपि भुलाए करतारि ॥1॥
इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥
तनु मनु धनु अरपी तिन कउ निवि निवि लागउ पाइ ॥
तिन मिलिआ मनु संतोखीऐ त्रिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामि रते सुखीए सदा सचे सिउ लिव लाइ ॥2॥
तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(भेखी साधु तृष्णा के) दुख में कलपता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।