भै विचि सभु आकारु है निरभउ हरि जीउ सोइ ॥
सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥
दुसमनु दुखु तिस नो नेड़ि न आवै पोहि न सकै कोइ ॥
गुरमुखि मनि वीचारिआ जो तिसु भावै सु होइ ॥
नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ ॥1॥
इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥
जिनी सतिगुरु न सेविओ से आइ गए पछुताहि ॥
नानक सचि रते से न विछुड़हि सतिगुरु सेवि समाहि ॥2॥
तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥
तिसु मिलीऐ सतिगुर प्रीतमै जिनि हंउमै विचहु मारी ॥
सो सतिगुरु पूरा धनु धंनु है जिनि हरि उपदेसु दे सभ स्रिस्टि सवारी ॥
नित जपिअहु संतहु राम नामु भउजल बिखु तारी ॥
गुरि पूरै हरि उपदेसिआ गुर विटड़िअहु हंउ सद वारी ॥2॥
सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥
ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥
सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥
सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥
सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥
नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥1॥
होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥
अंम्रितु छोडि बिखु लगे बिखु खटणा बिखु रासि ॥
बिखु खाणा बिखु पैनणा बिखु के मुखि गिरास ॥
ऐथै दुखो दुखु कमावणा मुइआ नरकि निवासु ॥
मनमुख मुहि मैलै सबदु न जाणनी काम करोधि विणासु ॥
सतिगुर का भउ छोडिआ मनहठि कंमु न आवै रासि ॥
जम पुरि बधे मारीअहि को न सुणे अरदासि ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा गुरमुखि नामि निवासु ॥2॥
सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥
सो सतिगुरु देखहु इक निमख निमख जिनि हरि का हरि पंथु बताइआ ॥
तिसु सतिगुर की सभ पगी पवहु जिनि मोह अंधेरु चुकाइआ ॥
सो सतगुरु कहहु सभि धंनु धंनु जिनि हरि भगति भंडार लहाइआ ॥3॥
सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 3॥ (जगत का) सारा आकार (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।