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अंग 586

अंग
586
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोकु मः 3 ॥
भै विचि सभु आकारु है निरभउ हरि जीउ सोइ ॥
सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥
दुसमनु दुखु तिस नो नेड़ि न आवै पोहि न सकै कोइ ॥
गुरमुखि मनि वीचारिआ जो तिसु भावै सु होइ ॥
नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (जगत का) सारा आकार (भाव।जगत में जो कुछ दिखाई दे रहा है) डर के अधीन है।एक वह परमात्मा ही (जिसने ये जगत बनाया है) डर से रहित है। अगर गुरू के बताए हुए राह पर चलें तो (वह डर रहित) प्रभू मन में आ बसता है।(फिर) उस मन में कभी (कोई) डर नहीं व्यप्तता। कोई वैरी उसके नजदीक नहीं फटकता।कोई दुख उसे छू नहीं सकता। हे नानक ! गुरमुखों के मन में ये विचार उठती है कि जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है वही होता है; हमारी लाज वह खुद ही रखेगा। (हमारे) काम वह स्वयं ही सँवारेगा। 1।
मः 3 ॥
इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥
जिनी सतिगुरु न सेविओ से आइ गए पछुताहि ॥
नानक सचि रते से न विछुड़हि सतिगुरु सेवि समाहि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ कुछ सज्जन जाने को तैयार हैं।कुछ चले गए हैं।और बाकी के भी चले जाएंगे (भाव।जगत में जो भी आया है वह यहाँ सदा नहीं रह सकता); पर जिन मनुष्यों ने गुरू की बताई हुई कार नहीं की।वह जगत में आ के यहाँ से पछताते ही चले जाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य सच्चे नाम में रंगे हुए हैं वह (परमात्मा से) नहीं विछुड़ते।वे गुरू की बताई हुई सेवा करके (प्रभू में) जुड़े रहते हैं। 2।
पउड़ी ॥
तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥
तिसु मिलीऐ सतिगुर प्रीतमै जिनि हंउमै विचहु मारी ॥
सो सतिगुरु पूरा धनु धंनु है जिनि हरि उपदेसु दे सभ स्रिस्टि सवारी ॥
नित जपिअहु संतहु राम नामु भउजल बिखु तारी ॥
गुरि पूरै हरि उपदेसिआ गुर विटड़िअहु हंउ सद वारी ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उस प्यारे गुरू को मिलना चाहिए।जिसके हृदय में गुणों का श्रोत परमात्मा बस रहा है। उस प्रीतम सतिगुरू की शरण पड़ना चाहिए जिसने अपने अंदर से अहंकार दूर कर लिया है। ‘हे संत जनो ! संसार-समुंद्र के (माया रूपी) जहर से पार लंघाने वाला हरि-नाम जपो’ – प्रभू सिमरन की ये शिक्षा दे के जिस सतिगुरू ने सारी सृष्टि को सुंदर बना दिया है। वह सतिगुरू धन्य है। वह गुरू धन्य है। अपने सतिगुरू से मैं सदके हूँ।पूरे सतिगुरू ने मुझे परमात्मा नजदीक दिखा दिया है। 2।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥
ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥
सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥
सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥
सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥
नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ गुरू की बताई चाकरी करनी बढ़िया से बढ़िया सुख का सार है (गुरू की बताई हुई सेवा करने से) जगत में आदर मिलता है। और प्रभू की हजूरी में सुर्खरूई का द्वार। (गुरू सेवा की यही) सच्ची कार कमाने के लायक है।(इससे) मनुष्य को (पर्दे ढकने के लिए) नाम-रूपी पोशाक मिल जाती है।सच्चा नाम-रूपी आसरा मिल जाता है। सच्ची संगति की प्राप्ति होती है।सच्चे नाम में प्यार पड़ता है और सच्चे प्रभू में समाई हो जाती है। (गुरू के) सच्चे शबद की बरकति से (मनुष्य के मन में) सदा खुशी बनी रहती है।और प्रभू की हजूरी में मनुष्य सुर्खरू हो जाता है। पर। हे नानक ! सतिगुरू का बताया हुआ काम वही मनुष्य करता है।जिस पर प्रभू स्वयं मेहर की नजर करता है। 1।
मः 3 ॥
होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥
अंम्रितु छोडि बिखु लगे बिखु खटणा बिखु रासि ॥
बिखु खाणा बिखु पैनणा बिखु के मुखि गिरास ॥
ऐथै दुखो दुखु कमावणा मुइआ नरकि निवासु ॥
मनमुख मुहि मैलै सबदु न जाणनी काम करोधि विणासु ॥
सतिगुर का भउ छोडिआ मनहठि कंमु न आवै रासि ॥
जम पुरि बधे मारीअहि को न सुणे अरदासि ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा गुरमुखि नामि निवासु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (प्रभू की बंदगी छोड़ के) और बेगानी कार (करने वालों का) जीना और बसना धिक्कारयोग्य है (क्योंकि) वह मनुष्य अंमृत छोड़ के (माया रूप) जहर (एकत्र करने) में लगे हुए हैं। जहर ही उनकी कमाई है और जहर ही उनकी पूँजी है। जहर ही उनकी खुराक है जहर ही उनकी पोशाक है और जहर की ही वे मनुष्य मुंह में ग्रास डाल रहे हैं। ऐसे लोग जगत में निरा दुख ही भोगते हैं और मरने के बाद भी उनका वास नर्क में होता है। मुंह से मैले होने के कारण मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरू के शबद को नहीं पहचानते।काम-क्रोध आदि में उनकी (आत्मिक) मौत हो जाती है; सतिगुरू का अदब छोड़ देने के कारण।मन के हठ से किया हुआ उनका कोई भी काम सिरे नहीं चढ़ता। (इस वास्ते) मनमुख मनुष्य जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं।कोई उनकी पुकार नहीं सुनता (भाव।कोई उनकी सहायता नहीं कर सकता)। पर। हे नानक ! (ये किसी के वश की बात नहीं) आरम्भ से ही (किए कर्मों) के अनुसार लिखेलेख जीव कमाते हैं (भाव।पिछले किए कर्मों के अनुसार काम किए जाते हैं) (इस तरह) गुरू के सन्मुख रहने वाले बँदों की सुरति नाम में जुड़ी रहती है। 2।
पउड़ी ॥
सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥
सो सतिगुरु देखहु इक निमख निमख जिनि हरि का हरि पंथु बताइआ ॥
तिसु सतिगुर की सभ पगी पवहु जिनि मोह अंधेरु चुकाइआ ॥
सो सतगुरु कहहु सभि धंनु धंनु जिनि हरि भगति भंडार लहाइआ ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) जिस सतिगुरू ने मेरे प्रभू का नाम (मनुष्य के हृदय में) पक्का करवाया है।उस साधु-गुरू की सेवा करो। जिस गुरू ने जगत के मालिक का नाम (जीवों से) जपाया है।उसकी दिन-रात पूजा करो। (हे भाई !) जिस गुरू ने परमात्मा (के मिलने) का राह बताया है।उसका हर वक्त दर्शन करो; जिस सतिगुरू ने (जीवों के दिल में माया के) मोह का अंधेरा दूर किया है।सारे उसी के चरणों में लगो। (हे भाई !) जिस गुरू ने प्रभू की भक्ति के खजाने ढुँढवा दिए हैं।कहो- वह गुरू धन्य है।वह गुरू धन्य है। 3।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ गुरू को मिलने से ही (मनुष्य के मन की) भूख दूर हो सकती है।भेष (धारने से) तृष्णा नहीं जाती;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 3॥ (जगत का) सारा आकार (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।