सचै नामि समाए हरि गुण गाए मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती विचहु हंउमै जाए ॥
जिनी पुरखी हरि नामि चितु लाइआ तिन कै हंउ लागउ पाए ॥
कांइआ कंचनु तां थीऐ जा सतिगुरु लए मिलाए ॥2॥
सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥
बिनु सतिगुर भरमि भुलाणीआ किआ मुहु देसनि आगै जाए ॥
किआ देनि मुहु जाए अवगुणि पछुताए दुखो दुखु कमाए ॥
नामि रतीआ से रंगि चलूला पिर कै अंकि समाए ॥
तिसु जेवडु अवरु न सूझई किसु आगै कहीऐ जाए ॥
सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥3॥
जिनी सचड़ा सचु सलाहिआ हंउ तिन लागउ पाए ॥
से जन सचे निरमले तिन मिलिआ मलु सभ जाए ॥
तिन मिलिआ मलु सभ जाए सचै सरि नाए सचै सहजि सुभाए ॥
नामु निरंजनु अगमु अगोचरु सतिगुरि दीआ बुझाए ॥
अनदिनु भगति करहि रंगि राते नानक सचि समाए ॥
जिनी सचड़ा सचु धिआइआ हंउ तिन कै लागउ पाए ॥4॥4॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 3 ॥
सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥
सचु संग्रहहि सद सचि रहहि सचै नामि पिआरि ॥
सदा निरमल मैलु न लगई नदरि कीती करतारि ॥
नानक हउ तिन कै बलिहारणै जो अनदिनु जपहि मुरारि ॥1॥
मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥
जे जाणा बगु बपुड़ा त जनमि न देदी अंगु ॥2॥
हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥
डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥3॥
तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥
तू आपे आपि निरंकारु है को अवरु न बीआ ॥
तू करण कारण समरथु है तू करहि सु थीआ ॥
तू अणमंगिआ दानु देवणा सभनाहा जीआ ॥
सभि आखहु सतिगुरु वाहु वाहु जिनि दानु हरि नामु मुखि दीआ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(तब मनुष्य) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।