Lulla Family

अंग 581

अंग
581
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउ मुठड़ी धंधै धावणीआ पिरि छोडिअड़ी विधणकारे ॥
घरि घरि कंतु महेलीआ रूड़ै हेति पिआरे ॥
मै पिरु सचु सालाहणा हउ रहसिअड़ी नामि भतारे ॥7॥
गुरि मिलिऐ वेसु पलटिआ सा धन सचु सीगारो ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो सिमरहु सिरजणहारो ॥
बईअरि नामि सोुहागणी सचु सवारणहारो ॥
गावहु गीतु न बिरहड़ा नानक ब्रहम बीचारो ॥8॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जब तक मैं माया की आहर में माया की दौड़-भाग में ठॅगी जा रही हूँ।तब तक पति-विहीन स्त्री वाले कर्मों के कारण पति-प्रभू ने मुझे त्यागा हुआ है। पति-प्रभू तो हरेक जीव-स्त्री के हृदय में बस रहा है।उसकी असल सि्त्रयां वही हैं जो उस सुंदर प्रभू के प्यार में प्रेम में मगन रहती हैं। जितना समय मैं सदा स्थिर प्रभू-पति की सिफत सालाह करती हूँ उस पति के नाम में जुड़े रहने के कारण मेरा तन-मन खिला रहता है। 7। अगर गुरू मिल जाए तो जीव-स्त्री की काया ही पलट जाती है।जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभू के नाम को अपना श्रृंगार बना लेती है। हे सहेलियो ! (हे सत्संगियो !) आएँ।मिल के बैठें।मिल जुल के सृजनहार का सिमरन करो। जो जीव-स्त्री प्रभू के नाम में जुड़ती है वह सुहाग-भाग वाली हो जाती है।सदा स्थिर प्रभू उसके जीवन को खूबसूरत बना देता है। हे नानक ! (कह, हे सहेलियो !) प्रभू-पति की सिफत सालाह के गीत गाओ।प्रभू के गुणों को अपने हृदय में बसाओ।फिर कभी उससे विछोड़ा नहीं होंगे (दुनिया वाले विछोड़े तो एक अटल नियम है।ये तो होते ही रहने हैं)। 8। 3।
वडहंसु महला 1 ॥
जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥
सचड़ा दूरि न भालीऐ घटि घटि सबदु पछाणोवा ॥
सचु सबदु पछाणहु दूरि न जाणहु जिनि एह रचना राची ॥
नामु धिआए ता सुखु पाए बिनु नावै पिड़ काची ॥
जिनि थापी बिधि जाणै सोई किआ को कहै वखाणो ॥
जिनि जगु थापि वताइआ जालोु सो साहिबु परवाणो ॥1॥
बाबा आइआ है उठि चलणा अध पंधै है संसारोवा ॥
सिरि सिरि सचड़ै लिखिआ दुखु सुखु पुरबि वीचारोवा ॥
दुखु सुखु दीआ जेहा कीआ सो निबहै जीअ नाले ॥
जेहे करम कराए करता दूजी कार न भाले ॥
आपि निरालमु धंधै बाधी करि हुकमु छडावणहारो ॥
अजु कलि करदिआ कालु बिआपै दूजै भाइ विकारो ॥2॥
जम मारग पंथु न सुझई उझड़ु अंध गुबारोवा ॥
ना जलु लेफ तुलाईआ ना भोजन परकारोवा ॥
भोजन भाउ न ठंढा पाणी ना कापड़ु सीगारो ॥
गलि संगलु सिरि मारे ऊभौ ना दीसै घर बारो ॥
इब के राहे जंमनि नाही पछुताणे सिरि भारो ॥
बिनु साचे को बेली नाही साचा एहु बीचारो ॥3॥
बाबा रोवहि रवहि सु जाणीअहि मिलि रोवै गुण सारेवा ॥
रोवै माइआ मुठड़ी धंधड़ा रोवणहारेवा ॥
धंधा रोवै मैलु न धोवै सुपनंतरु संसारो ॥
जिउ बाजीगरु भरमै भूलै झूठि मुठी अहंकारो ॥
आपे मारगि पावणहारा आपे करम कमाए ॥
नामि रते गुरि पूरै राखे नानक सहजि सुभाए ॥4॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ (हे भाई !) जिस परमात्मा ने जगत पैदा करके इसको अपने आप में लीन करने की ताकत भी अपने पास रखी है उस मालिक को इस कुदरति में बसता समझ। (हे भाई !) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को (रची कुदरत से) दूर (किसी और जगह) तलाशने का यत्न नहीं करना चाहिए।हरेक शरीर में उसी का हुकम बरतता पहचान। (हे भाई !) जिस परमात्मा ने ये रचना रची है उसको इससे दूर (कहीं अलग) ना समझो।(हरेक शरीर में) उसका अटॅल हुकम बरतता पहचानो। जब मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है तब आत्मिक आनंद पाता है (और विकारों का जोर भी इस पर नहीं पड़ सकता।पर) प्रभू के नाम के बिना दुनिया विकारों से मुकाबला जीतने में असमर्थ हो जाती है। जिस परमात्मा ने रचना रची है वही इसकी रक्षा की विधि भी जानता है।कोई जीव (उसके उलट) कोई (और) उपदेश नहीं कर सकता। जिस प्रभू ने जगत पैदा करके (इसके ऊपर माया के मोह का) जाल बिछा रखा है वही जाना-माना मालिक है (और वही इस जाल में से जीवों को बचाने के समर्थ है)। 1। हे भाई ! जो भी जीव (जगत में जन्म ले के) आया है उसने जरूर (यहाँ से) चले जाना है (जीव आया है यहाँ प्रभू का नाम-धन का व्यापार करने।नाम के बिना) जगत जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा ने हरेक जीव के सिर पर उसके पूर्बले समय के किए कर्मों के विचार अनुसार दुख और सुख (भोगने) के लेख लिख दिए हैं। जैसा कर्म जीव ने किया वैसा ही सुख और दुख उसको परमात्मा ने दे दिया है।हरेक जीव के किए कर्मों का समूह उसके साथ ही निभता है।(पर जीवों के भी क्या वश।) ईश्वर स्वयं ही जैसे कर्म जीवों से करवाता है (वैसे ही कर्म जीव करते हैं) कोई भी जीव (प्रभू की मर्जी से बाहर जा के) कोई और कर्म नहीं कर सकता। परमात्मा खुद तो (कर्मों से) निर्लिप है।दुनिया (अपने-अपने किए कर्मों के मुताबिक माया के) आहर में बँधी हुई है।(माया के इन बँधनों से भी) परमात्मा खुद ही हुकम करके छुड़वाने के समर्थ है। (जीव माया के प्रभाव में नाम-सिमरन से आलस करता रहता है) आज सिमरन करते हैं।सवेरे करेंगे (यही टाल-मटोल) करते मौत आ दबोचती है।(प्रभू को बिसार के) और ही मोह में फंसा हुआ व्यर्थ के काम करता रहता है। 2। (सारी उम्र माया की दौड़-भाग में रह के परमात्मा का नाम भुलाने के कारण आखिर मौत आने पर) जीव यम वाला रास्ता पकड़ता है (जो इसके लिए) उजाड़ ही उजाड़ है जहाँ इसे घोर अंधकार प्रतीत होता है। जीव को कुछ नहीं सूझता (कि इस बिपता में से कैसे निकलूँ)।(सारी उम्र दुनिया के पदार्थ एकत्र करता रहा।पर यम के राह पर पड़ के) ना पानी।ना लेफ।ना तुलाई।ना किसी किस्म का भोजन। ना ठंडा पानी।ना ही सुंदर कपड़ा (ये सारे पदार्थ मौत ने छीन लिए।दुनिया में ही धरे रह गए)। जमराज जीव के गले में (माया के मोह का) संगल डाल के इसके सिर पर खड़ा चोटें मारता है।(इन चोटों से बचने के लिए) इसको कोई आसरा नहीं दिखाई देता। (जब जम की चोटें पड़ रही होती हैं) उस वक्त बीजे हुए (सिमरन सेवा आदि के बीज) उग नहीं सकते।तब पछताता है।किए पापों का भार सिर पर पड़ा है (जो उतर नहीं सकता)। हे भाई ! इस अॅटल सच्चाई को याद रखो कि सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना और कोई साथी नहीं बनता। 3। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं और वैरागवान होते हैं वह (लोक-परलोक में) आदर पाते हैं।जो भी जीव साध-संगति में मिल के प्रभू के गुण हृदय में बसाता है और वैरागवान होता है (वह आदर पाता है)। पर जिस जीव-स्त्री को माया के मोह ने लूट लिया है वही दुखी होती है।(मोह में फसे हुए जीव सारी उम्र) धंधा ही पिटते हें और दुखी होते हैं। जो जीव (सारी उम्र) माया का आहर करता ही दुखी रहता है।और कभी (अपने मन की) माया की मैल नहीं धोता।उसके वास्ते संसार (भाव।सारी ही उम्र) एक सपना ही बना रहा (भाव उसने यहाँ कमाया कुछ भी नहीं।जैसे मनुष्य सपने में दौड़-भाग तो करता है पर जाग आने पर उसके पल्ले कुछ भी नहीं रहता)। जैसे बाजीगर (तमाशा दिखाता है।देखने वाला दर्शक उसके तमाशे में खो जाता है।वैसे ही) झूठे मोह में ठॅगी हुई (खोई हुई) जीव स्त्री भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पड़ी रहती है। (झूठी माया का) मान करती है।(पर।जीवों के भी कया वश।) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) सही राह पर डालने वाला है।स्वयं ही (जीवों में व्याप के) कर्म कर रहा है। हे नानक ! जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहते हैं।उन्हें पूरे गुरू ने (माया के मोह से) बचा लिया है।वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।वे प्रभू के प्रेम में जुड़े रहते हैं। 4। 4।
वडहंसु महला 1 ॥
बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥
सचा घरु सचड़ै सेवीऐ सचु खरा सचिआरोवा ॥
कूड़ि लबि जां थाइ न पासी अगै लहै न ठाओ ॥
अंतरि आउ न बैसहु कहीऐ जिउ सुंञै घरि काओ ॥
जंमणु मरणु वडा वेछोड़ा बिनसै जगु सबाए ॥
लबि धंधै माइआ जगतु भुलाइआ कालु खड़ा रूआए ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ हे भाई ! (जगत में जो भी जीव जनम ले के) आया है उसने (आखिर यहाँ से) कूच कर जाना है (किसी ने यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) ये जगत है ही नाशवंत पसारा। यदि सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का सिमरन करें तो सदा-स्थिर रहने वाला ठिकाना मिल जाता है।जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को सिमरता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है।वह सदा-स्थिर प्रभू के प्रकाश के योग्य बन जाता है। जो मनुष्य माया के मोह में अथवा माया के लालच में फसा रहता है वह परमात्मा की दरगाह में कबूल नहीं होता।उसको प्रभू की हजूरी में जगह नहीं मिलती। जैसे सूने घर में गए कौए को (किसी ने रोटी की गिराही आदि नहीं डालनी) (वैसे ही माया के मोह में फंसे जीव को प्रभू की हजूरी में) किसी ने ये नहीं कहना – आएँ जी।अंदर आ जाएँ बैठ जाएँ। उस मनुष्य को जनम-मरन के चक्र भुगतने पड़ जाते हैं।उसको (इस चक्कर के कारण प्रभू-चरनों से) लंबा विछोड़ा हो जाता है।(माया के मोह में फस के) जगत आत्मिक मौत सहेड़ रहा है (जो भी मोह में फंसते हैं वे) सारे (आत्मिक मौत मरते हैं)। लालच के कारण माया के ही आहर में पड़ा हुआ जगत सही जीवन राह से टूटा रहता है।इस सिर पर खड़ा काल इसे दुखी करता रहता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब तक मैं माया की आहर में माया की दौड़-भाग में ठॅगी जा रही हूँ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।