राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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त्रिभवणि सो प्रभु जाणीऐ साचो साचै नाइ ॥5॥ सा धन खरी सुहावणी जिनि पिरु जाता संगि ॥ महली महलि बुलाईऐ सो पिरु रावे रंगि ॥ सचि सुहागणि सा भली पिरि मोही गुण संगि ॥6॥ भूली भूली थलि चड़ा थलि चड़ि डूगरि जाउ ॥ बन महि भूली जे फिरा बिनु गुर बूझ न पाउ ॥ नावहु भूली जे फिरा फिरि फिरि आवउ जाउ ॥7॥ पुछहु जाइ पधाऊआ चले चाकर होइ ॥ राजनु जाणहि आपणा दरि घरि ठाक न होइ ॥ नानक एको रवि रहिआ दूजा अवरु न कोइ ॥8॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (हे भोली जीव-स्त्री!) यदि सच्चे प्रभू के नाम में जुड़े रहें, तो उस सदा स्थिर प्रभू की तीनों भवनों में सर्व-व्यापकता को पहचान लेते हैं।5। (गुरू की शरण पड़ के) जिस जीव-स्त्री ने पति प्रभू को अपने अंग-संग समझ लिया है, वह जीव स्त्री सचमुच सुंदर (सुंदर जीवन वाली) हो जाती है। वह जीव स्त्री प्रभू के महल में बुलाई जाती है, वह प्रभू पति प्रेम रंग में आकर उससे प्यार करता है, पति प्रभू ने आत्मिक गुणों से उसको ऐसा मोह लिया होता है कि वह सदा स्थिर प्रभू में लीन हो के सुहाग भाग वाली नेक बन जाती है।6। (आत्मिक गुणों के व्यापार से वंचित हो के, जीवन के सही रास्ते से) भूल के अगर मैं (दुनिया छोड़ के भी) सारी धरती पर घूमती रहूँ, धरती पे भ्रमण करके फिर यदि मैं पहाड़ों पर भी जा चढ़ूँ (यदि मैं किसी पहाड़ की गुफा में भी जा टिकूं) (सही रास्ते से) भटक के अगर मैं जंगलों में भटकती फिरूँ, तो भी मुझे (आत्मिक रास्ते की) सही समझ नहीं पड़ सकती। क्योंकि, गुरू के बिना इस रास्ते की सूझ नहीं पड़ती। यदि मैं परमात्मा के नाम से वंचित हुई (जंगलों पहाड़ों में) फिरती रही, तो मैं मुड़-मुड़ जनम मरन के चक्कर सहेड़ लूंगी।7। (हे भोली जीव-स्त्री! यदि जीवन का सही रास्ता ढूंढना है तो) जा के उन (आत्म) राहियों से पूछ जो (प्रभु दर के) सेवक बन के (जीवन राह पे) चल रहे हैं, वह (इस सृष्टि के मालिक) पातशाह को अपना समझते हैं। उनको प्रभू पातशाह के दर और घर में (जाने की) कोई रोक नहीं होती। हे नानक ! उनको हर जगह एक परमात्मा ही मौजूद दिखाई देता है। कहीं भी उन्हें उसके बिनां और कोई नहीं दिखता।8।6।
सिरीरागु महला 1 ॥ गुर ते निरमलु जाणीऐ निरमल देह सरीरु ॥ निरमलु साचो मनि वसै सो जाणै अभ पीर ॥ सहजै ते सुखु अगलो ना लागै जम तीरु ॥1॥ भाई रे मैलु नाही निरमल जलि नाइ ॥ निरमलु साचा एकु तू होरु मैलु भरी सभ जाइ ॥1॥ रहाउ ॥ हरि का मंदरु सोहणा कीआ करणैहारि ॥ रवि ससि दीप अनूप जोति त्रिभवणि जोति अपार ॥ हाट पटण गड़ कोठड़ी सचु सउदा वापार ॥2॥ गिआन अंजनु भै भंजना देखु निरंजन भाइ ॥ गुपतु प्रगटु सभ जाणीऐ जे मनु राखै ठाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै ता सहजे लए मिलाइ ॥3॥ कसि कसवटी लाईऐ परखे हितु चितु लाइ ॥ खोटे ठउर न पाइनी खरे खजानै पाइ ॥ आस अंदेसा दूरि करि इउ मलु जाइ समाइ ॥4॥ सुख कउ मागै सभु को दुखु न मागै कोइ ॥ सुखै कउ दुखु अगला मनमुखि बूझ न होइ ॥ सुख दुख सम करि जाणीअहि सबदि भेदि सुखु होइ ॥5॥ बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु ॥ मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु ॥ सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु ॥6॥ चहु जुगि मैले मलु भरे जिन मुखि नामु न होइ ॥ भगती भाइ विहूणिआ मुहु काला पति खोइ ॥ जिनी नामु विसारिआ अवगण मुठी रोइ ॥7॥ खोजत खोजत पाइआ डरु करि मिलै मिलाइ ॥ आपु पछाणै घरि वसै हउमै त्रिसना जाइ ॥ नानक निरमल ऊजले जो राते हरि नाइ ॥8॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (हे भाई!) गुरू के द्वारा ही पवित्र नाम जल से सांझ पड़ती है, और मनुष्य का शरीर पवित्र हो जाता है (भाव, सारी ज्ञान इद्रियां विकारों की मैल से बचे रहते हैं)। (गुरू की कृपा से) वह सदा स्थिर पवित्र प्रभू जो मनुष्य की अंदर की वेदना जानता है मनुष्य के मन में आ प्रगटता है (इस प्रकाश की बरकति से मन सहज अवस्था में टिक जाता है) सहज अवस्था से बहुतआत्मिक आनंद उत्पन्न होता है, जम का तीर भी नहीं लगता (मौत का डर नहीं व्यापता)।1। हे भाई ! (जैसे साफ पानी में नहाने से शरीर की मैल उतर जाती है, वैसे ही परमात्मा के) पवित्र नाम जल में स्नान करने से मन पर (विकारों की) मैल नहीं रह जाती। इस वास्ते, हे भाई ! उस आत्मिक स्नान की खातिर परमात्मा की सिफत सलाह करके कह, हे प्रभू ! सिर्फ आप सदा स्थिर प्रभू ही पवित्र है, बाकी और हरेक जगह (माया के मोह की) मैल से भरी हुई है।1।रहाउ। (जिस मनुष्य पे गुरू मेहरबान है, उसके दिल में सृष्टि के रचनहार) करतार ने (अपने रहने के लिए) सुंदर महल बना लिया है। तीनों भवनों में व्याप्त बेअंत प्रभू की अनूप ज्योति उसके अंदर जाग पड़ती है। उसके अंदर सूर्य और चाँद (मानों) दिए जल पड़ते हैं (भाव, उसके अंदर अज्ञानता का अंधेरा दूर करने वाला ज्ञान सूर्य व काम क्रोध आदि की तपश को बुझाने वाली शांत अवस्था का चाँद प्रगट हो जाता है) (इसी शशरीर के अंदर) दुकानें, नगर तथा किले विद्यमान हैं। जहाँ पर व्यापार करने के लिए नाम सत्य का सौदा है ।2। (आप भी, हे भाई!) प्रभू की रजा में रहके सब डर नाश करने वाला ज्ञान का सुरमा (अंजन) देने वाला निरंजन को देख अगर मनुष्य अपने मन को ठिकाने पर रखे, तो उसे दृश्य-अदृश्य जगत में हर जगह परमात्मा ही बसता प्रतीत होता है। गुरू यदि मिल जाए तो उस मनुष्य को अडोल आत्मिक अवस्था में जोड़ देता है।3। (जैसे सोने को परखने के लिए) कसवटी ऊपर कस लेते हैं (वैसे ही ईश्वर अपने पैदा किए हुए लोगों के आत्मिक जीवन को) बड़े प्यार से ध्यान लगा के परखता है। खोटों को (उसके दर पर) जगह नहीं मिलती, खरों को वह अपने खजाने में शामिल कर लेता है। (हे भाई! गुरू की शरण पड़ के अपने अंदर से दुनिया वाली) उम्मीदें और सहम निकाल दे। ऐसा उद्यम करने से (मन के विकारों की) मैल दूर हो जाएगी, (और मन प्रभू चरणों में लीन हो जाएगा)।4। हरेक जीव (दुनिया के) सुख मांगता है, कोई भी दुख नहीं मांगता। पर, (संसारिक) सुखों को दुख-रूप फल बहुत लगता है, अपने मन के पीछे चलने वाले आदमी को इस (भेद) की समझ नहीं आती (वह दुनिया के सुख ही मांगता रहता हैऔर नाम से वंचित रहता है)। (दरअसल दुनिया के) सुख और दुख एक जैसे ही समझने चाहिए । असल आत्मिक सुख तभी मिलता है यदि गुरू के शबद के द्वारा मन को भेद लिया जाए (मन को नाथ के दुनिया के मौज मेलों से रोक के रखा जाए)।5। व्यास ऋषि (तो बारंबार) वेद को ही ऊँचा ऊँचा उचारता है, (पर, हे भाई!) परमात्मा की सिॅफत सलाह की बाणी पढ़नी चाहिए। असली मुनि लोग सेवक और साधिक वही हैं जो गुणों के खजाने परमात्मा के नाम में रंगे हुए हैं। जो लोग सदा कायम रहने वाले नाम रंग में रंगे जाते हैं, वह (संसार से जीवन की बाजी) जीत के जाते हैं। मैं भी उनसे कुर्बान जाता हूँ।6। पर जिनके मुंह में प्रभू का नाम नहीं है वह सदा ही मैले (मन वाले) हैं, (उनके मन विकारों की) मैल से भरे रहते हैं। परमात्मा की भक्ति और प्यार से वंचित लोगों का मुंह (उसकी हजूरी में) काला (दिखाई देता है।) वह अपनी इज्जत गवा के (जाते हैं)। जिस जिस जीव स्त्री ने प्रभू का नाम भुला दिया है, (उसके आत्मिक सरमाए को औगुणों ने लूट लिया है, वह रोती पछताती है)।7। (गुरू के द्वारा) तलाश करते करते यह बात मिल जाती है कि परमात्मा का डर अदब हृदय में धारण करने से परमात्मा गुरू के मिलाने से मिल जाता है। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) अपने आप को पहचानता है, उसका मन बाहर भटकने से हट कर अंतर-आत्मे टिक जाता है, उसका अहम् दूर हो जाता है, उसकी तृष्णा मिट जाती है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम रंग में रंगे जाते हैं, उनके जीवन पवित्र व रौशन हो जाते हैं।8।7।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे पथ भ्रष्ट पागल मन ! (मेरी शिक्षा) सुन। (शिक्षा ये है कि) गुरू की शरण पड़ (गुरू से परमात्मा का नाम मिलता है, आप भी वह) हरि नाम जप। (हरि चरणों में) सुरति जोड़ (प्रभू का नाम सिमरने से) यमराज भी डर जाता है और दुखों को भगदड़ पड़ जाती है। (पर, जो) भाग्यहीन जीवस्त्री (नाम नहीं सिमरती, उसे) बहुत दुख कलेशों का सामना करना पड़ता है (दुखों में भगदड़ तभी मच सकती है, जब सिर पर खसम सांई हो, पर जो खसम का नाम कभी याद ही नहीं करती, उसके सिर पे) खसम सांई कैसे टिका हुआ प्रतीत हो?।1।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भोली जीव-स्त्री!) यदि सच्चे प्रभू के नाम में जुड़े रहें, तो उस सदा स्थिर प्रभू की तीनों भवनों में सर्व-व्यापकता को पहचान लेते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।