अंग 57

अंग
57
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੀਐ ਸਾਚੋ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥੫॥
ਸਾ ਧਨ ਖਰੀ ਸੁਹਾਵਣੀ ਜਿਨਿ ਪਿਰੁ ਜਾਤਾ ਸੰਗਿ ॥
ਮਹਲੀ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਈਐ ਸੋ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਰੰਗਿ ॥
ਸਚਿ ਸੁਹਾਗਣਿ ਸਾ ਭਲੀ ਪਿਰਿ ਮੋਹੀ ਗੁਣ ਸੰਗਿ ॥੬॥
ਭੂਲੀ ਭੂਲੀ ਥਲਿ ਚੜਾ ਥਲਿ ਚੜਿ ਡੂਗਰਿ ਜਾਉ ॥
ਬਨ ਮਹਿ ਭੂਲੀ ਜੇ ਫਿਰਾ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਉ ॥
ਨਾਵਹੁ ਭੂਲੀ ਜੇ ਫਿਰਾ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵਉ ਜਾਉ ॥੭॥
ਪੁਛਹੁ ਜਾਇ ਪਧਾਊਆ ਚਲੇ ਚਾਕਰ ਹੋਇ ॥
ਰਾਜਨੁ ਜਾਣਹਿ ਆਪਣਾ ਦਰਿ ਘਰਿ ਠਾਕ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੮॥੬॥
त्रिभवणि सो प्रभु जाणीऐ साचो साचै नाइ ॥५॥
सा धन खरी सुहावणी जिनि पिरु जाता संगि ॥
महली महलि बुलाईऐ सो पिरु रावे रंगि ॥
सचि सुहागणि सा भली पिरि मोही गुण संगि ॥६॥
भूली भूली थलि चड़ा थलि चड़ि डूगरि जाउ ॥
बन महि भूली जे फिरा बिनु गुर बूझ न पाउ ॥
नावहु भूली जे फिरा फिरि फिरि आवउ जाउ ॥७॥
पुछहु जाइ पधाऊआ चले चाकर होइ ॥
राजनु जाणहि आपणा दरि घरि ठाक न होइ ॥
नानक एको रवि रहिआ दूजा अवरु न कोइ ॥८॥६॥

हिन्दी अर्थ: (हे भोली जीव-स्त्री!) यदि सच्चे प्रभू के नाम में जुड़े रहें~ तो उस सदा स्थिर प्रभू की तीनों भवनों में सर्व-व्यापकता को पहचान लेते हैं।5। (गुरू की शरण पड़ के) जिस जीव-स्त्री ने पति प्रभू को अपने अंग-संग समझ लिया है~ वह जीव स्त्री सचमुच सुंदर (सुंदर जीवन वाली) हो जाती है। वह जीव स्त्री प्रभू के महल में बुलाई जाती है~ वह प्रभू पति प्रेम रंग में आकर उससे प्यार करता है~ पति प्रभू ने आत्मिक गुणों से उसको ऐसा मोह लिया होता है कि वह सदा स्थिर प्रभू में लीन हो के सुहाग भाग वाली नेक बन जाती है।6। (आत्मिक गुणों के व्यापार से वंचित हो के~ जीवन के सही रास्ते से) भूल के अगर मैं (दुनिया छोड़ के भी) सारी धरती पर घूमती रहूँ~ धरती पे भ्रमण करके फिर यदि मैं पहाड़ों पर भी जा चढ़ूँ (यदि मैं किसी पहाड़ की गुफा में भी जा टिकूं) (सही रास्ते से) भटक के अगर मैं जंगलों में भटकती फिरूँ~ तो भी मुझे (आत्मिक रास्ते की) सही समझ नहीं पड़ सकती। क्योंकि~ गुरू के बिना इस रास्ते की सूझ नहीं पड़ती। यदि मैं परमात्मा के नाम से वंचित हुई (जंगलों पहाड़ों में) फिरती रही~ तो मैं मुड़-मुड़ जनम मरन के चक्कर सहेड़ लूंगी।7। (हे भोली जीव-स्त्री! यदि जीवन का सही रास्ता ढूंढना है तो) जा के उन (आत्म) राहियों से पूछ जो (प्रभु दर के) सेवक बन के (जीवन राह पे) चल रहे हैं~ वह (इस सृष्टि के मालिक) पातशाह को अपना समझते हैं। उनको प्रभू पातशाह के दर और घर में (जाने की) कोई रोक नहीं होती। हे नानक ! उनको हर जगह एक परमात्मा ही मौजूद दिखाई देता है। कहीं भी उन्हें उसके बिनां और कोई नहीं दिखता।8।6।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਨਿਰਮਲੁ ਜਾਣੀਐ ਨਿਰਮਲ ਦੇਹ ਸਰੀਰੁ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸੋ ਜਾਣੈ ਅਭ ਪੀਰ ॥
ਸਹਜੈ ਤੇ ਸੁਖੁ ਅਗਲੋ ਨਾ ਲਾਗੈ ਜਮ ਤੀਰੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਮੈਲੁ ਨਾਹੀ ਨਿਰਮਲ ਜਲਿ ਨਾਇ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚਾ ਏਕੁ ਤੂ ਹੋਰੁ ਮੈਲੁ ਭਰੀ ਸਭ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਮੰਦਰੁ ਸੋਹਣਾ ਕੀਆ ਕਰਣੈਹਾਰਿ ॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੀਪ ਅਨੂਪ ਜੋਤਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
ਹਾਟ ਪਟਣ ਗੜ ਕੋਠੜੀ ਸਚੁ ਸਉਦਾ ਵਾਪਾਰ ॥੨॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਭੈ ਭੰਜਨਾ ਦੇਖੁ ਨਿਰੰਜਨ ਭਾਇ ॥
ਗੁਪਤੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸਭ ਜਾਣੀਐ ਜੇ ਮਨੁ ਰਾਖੈ ਠਾਇ ॥
ਐਸਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤਾ ਸਹਜੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
ਕਸਿ ਕਸਵਟੀ ਲਾਈਐ ਪਰਖੇ ਹਿਤੁ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਖੋਟੇ ਠਉਰ ਨ ਪਾਇਨੀ ਖਰੇ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇ ॥
ਆਸ ਅੰਦੇਸਾ ਦੂਰਿ ਕਰਿ ਇਉ ਮਲੁ ਜਾਇ ਸਮਾਇ ॥੪॥
ਸੁਖ ਕਉ ਮਾਗੈ ਸਭੁ ਕੋ ਦੁਖੁ ਨ ਮਾਗੈ ਕੋਇ ॥
ਸੁਖੈ ਕਉ ਦੁਖੁ ਅਗਲਾ ਮਨਮੁਖਿ ਬੂਝ ਨ ਹੋਇ ॥
ਸੁਖ ਦੁਖ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੀਅਹਿ ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੫॥
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੇ ਵਾਚੀਐ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਆਸੁ ॥
ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਵਕ ਸਾਧਿਕਾ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਸਚਿ ਰਤੇ ਸੇ ਜਿਣਿ ਗਏ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਸੁ ॥੬॥
ਚਹੁ ਜੁਗਿ ਮੈਲੇ ਮਲੁ ਭਰੇ ਜਿਨ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਭਗਤੀ ਭਾਇ ਵਿਹੂਣਿਆ ਮੁਹੁ ਕਾਲਾ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਅਵਗਣ ਮੁਠੀ ਰੋਇ ॥੭॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਪਾਇਆ ਡਰੁ ਕਰਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਘਰਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਰਮਲ ਊਜਲੇ ਜੋ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੮॥੭॥
सिरीरागु महला १ ॥
गुर ते निरमलु जाणीऐ निरमल देह सरीरु ॥
निरमलु साचो मनि वसै सो जाणै अभ पीर ॥
सहजै ते सुखु अगलो ना लागै जम तीरु ॥१॥
भाई रे मैलु नाही निरमल जलि नाइ ॥
निरमलु साचा एकु तू होरु मैलु भरी सभ जाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि का मंदरु सोहणा कीआ करणैहारि ॥
रवि ससि दीप अनूप जोति त्रिभवणि जोति अपार ॥
हाट पटण गड़ कोठड़ी सचु सउदा वापार ॥२॥
गिआन अंजनु भै भंजना देखु निरंजन भाइ ॥
गुपतु प्रगटु सभ जाणीऐ जे मनु राखै ठाइ ॥
ऐसा सतिगुरु जे मिलै ता सहजे लए मिलाइ ॥३॥
कसि कसवटी लाईऐ परखे हितु चितु लाइ ॥
खोटे ठउर न पाइनी खरे खजानै पाइ ॥
आस अंदेसा दूरि करि इउ मलु जाइ समाइ ॥४॥
सुख कउ मागै सभु को दुखु न मागै कोइ ॥
सुखै कउ दुखु अगला मनमुखि बूझ न होइ ॥
सुख दुख सम करि जाणीअहि सबदि भेदि सुखु होइ ॥५॥
बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु ॥
मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु ॥
सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु ॥६॥
चहु जुगि मैले मलु भरे जिन मुखि नामु न होइ ॥
भगती भाइ विहूणिआ मुहु काला पति खोइ ॥
जिनी नामु विसारिआ अवगण मुठी रोइ ॥७॥
खोजत खोजत पाइआ डरु करि मिलै मिलाइ ॥
आपु पछाणै घरि वसै हउमै त्रिसना जाइ ॥
नानक निरमल ऊजले जो राते हरि नाइ ॥८॥७॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ (हे भाई!) गुरू के द्वारा ही पवित्र नाम जल से सांझ पड़ती है~ और मनुष्य का शरीर पवित्र हो जाता है (भाव~ सारी ज्ञान इद्रियां विकारों की मैल से बचे रहते हैं)। (गुरू की कृपा से) वह सदा स्थिर पवित्र प्रभू जो मनुष्य की अंदर की वेदना जानता है मनुष्य के मन में आ प्रगटता है (इस प्रकाश की बरकति से मन सहज अवस्था में टिक जाता है) सहज अवस्था से बहुतआत्मिक आनंद उत्पन्न होता है~ जम का तीर भी नहीं लगता (मौत का डर नहीं व्यापता)।1। हे भाई ! (जैसे साफ पानी में नहाने से शरीर की मैल उतर जाती है~ वैसे ही परमात्मा के) पवित्र नाम जल में स्नान करने से मन पर (विकारों की) मैल नहीं रह जाती। इस वास्ते~ हे भाई ! उस आत्मिक स्नान की खातिर परमात्मा की सिफत सलाह करके कह, हे प्रभू ! सिर्फ तू सदा स्थिर प्रभू ही पवित्र है~ बाकी और हरेक जगह (माया के मोह की) मैल से भरी हुई है।1।रहाउ। (जिस मनुष्य पे गुरू मेहरबान है~ उसके दिल में सृष्टि के रचनहार) करतार ने (अपने रहने के लिए) सुंदर महल बना लिया है। तीनों भवनों में व्याप्त बेअंत प्रभू की अनूप ज्योति उसके अंदर जाग पड़ती है। उसके अंदर सूर्य और चाँद (मानों) दिए जल पड़ते हैं (भाव~ उसके अंदर अज्ञानता का अंधेरा दूर करने वाला ज्ञान सूर्य व काम क्रोध आदि की तपश को बुझाने वाली शांत अवस्था का चाँद प्रगट हो जाता है) (इसी शशरीर के अंदर) दुकानें, नगर तथा किले विद्यमान हैं। जहाँ पर व्यापार करने के लिए नाम सत्य का सौदा है ।२। (तू भी~ हे भाई!) प्रभू की रजा में रहके सब डर नाश करने वाला ज्ञान का सुरमा (अंजन) देने वाला निरंजन को देख अगर मनुष्य अपने मन को ठिकाने पर रखे~ तो उसे दृश्य-अदृश्य जगत में हर जगह परमात्मा ही बसता प्रतीत होता है। गुरू यदि मिल जाए तो उस मनुष्य को अडोल आत्मिक अवस्था में जोड़ देता है।3। (जैसे सोने को परखने के लिए) कसवटी ऊपर कस लेते हैं (वैसे ही ईश्वर अपने पैदा किए हुए लोगों के आत्मिक जीवन को) बड़े प्यार से ध्यान लगा के परखता है। खोटों को (उसके दर पर) जगह नहीं मिलती~ खरों को वह अपने खजाने में शामिल कर लेता है। (हे भाई! गुरू की शरण पड़ के अपने अंदर से दुनिया वाली) उम्मीदें और सहम निकाल दे। ऐसा उद्यम करने से (मन के विकारों की) मैल दूर हो जाएगी~ (और मन प्रभू चरणों में लीन हो जाएगा)।4। हरेक जीव (दुनिया के) सुख मांगता है~ कोई भी दुख नहीं मांगता। पर~ (संसारिक) सुखों को दुख-रूप फल बहुत लगता है~ अपने मन के पीछे चलने वाले आदमी को इस (भेद) की समझ नहीं आती (वह दुनिया के सुख ही मांगता रहता हैऔर नाम से वंचित रहता है)। (दरअसल दुनिया के) सुख और दुख एक जैसे ही समझने चाहिए । असल आत्मिक सुख तभी मिलता है यदि गुरू के शबद के द्वारा मन को भेद लिया जाए (मन को नाथ के दुनिया के मौज मेलों से रोक के रखा जाए)।5। व्यास ऋषि (तो बारंबार) वेद को ही ऊँचा ऊँचा उचारता है~ (पर~ हे भाई!) परमात्मा की सिॅफत सलाह की बाणी पढ़नी चाहिए। असली मुनि लोग सेवक और साधिक वही हैं जो गुणों के खजाने परमात्मा के नाम में रंगे हुए हैं। जो लोग सदा कायम रहने वाले नाम रंग में रंगे जाते हैं~ वह (संसार से जीवन की बाजी) जीत के जाते हैं। मैं भी उनसे कुर्बान जाता हूँ।6। पर जिनके मुंह में प्रभू का नाम नहीं है वह सदा ही मैले (मन वाले) हैं~ (उनके मन विकारों की) मैल से भरे रहते हैं। परमात्मा की भक्ति और प्यार से वंचित लोगों का मुंह (उसकी हजूरी में) काला (दिखाई देता है।) वह अपनी इज्जत गवा के (जाते हैं)। जिस जिस जीव स्त्री ने प्रभू का नाम भुला दिया है~ (उसके आत्मिक सरमाए को औगुणों ने लूट लिया है~ वह रोती पछताती है)।7। (गुरू के द्वारा) तलाश करते करते यह बात मिल जाती है कि परमात्मा का डर अदब हृदय में धारण करने से परमात्मा गुरू के मिलाने से मिल जाता है। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) अपने आप को पहचानता है~ उसका मन बाहर भटकने से हट कर अंतर-आत्मे टिक जाता है~ उसका अहम् दूर हो जाता है~ उसकी तृष्णा मिट जाती है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम रंग में रंगे जाते हैं~ उनके जीवन पवित्र व रौशन हो जाते हैं।8।7।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸੁਣਿ ਮਨ ਭੂਲੇ ਬਾਵਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਜਮੁ ਡਰਪੈ ਦੁਖ ਭਾਗੁ ॥
ਦੂਖੁ ਘਣੋ ਦੋਹਾਗਣੀ ਕਿਉ ਥਿਰੁ ਰਹੈ ਸੁਹਾਗੁ ॥੧॥
सिरीरागु महला १ ॥
सुणि मन भूले बावरे गुर की चरणी लागु ॥
हरि जपि नामु धिआइ तू जमु डरपै दुख भागु ॥
दूखु घणो दोहागणी किउ थिरु रहै सुहागु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ हे पथ भ्रष्ट पागल मन ! (मेरी शिक्षा) सुन। (शिक्षा ये है कि) गुरू की शरण पड़ (गुरू से परमात्मा का नाम मिलता है~ तू भी वह) हरि नाम जप। (हरि चरणों में) सुरति जोड़ (प्रभू का नाम सिमरने से) यमराज भी डर जाता है और दुखों को भगदड़ पड़ जाती है। (पर~ जो) भाग्यहीन जीवस्त्री (नाम नहीं सिमरती~ उसे) बहुत दुख कलेशों का सामना करना पड़ता है (दुखों में भगदड़ तभी मच सकती है~ जब सिर पर खसम सांई हो~ पर जो खसम का नाम कभी याद ही नहीं करती~ उसके सिर पे) खसम सांई कैसे टिका हुआ प्रतीत हो?।1।

संदर्भ: यह अंग 57 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 57” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 58 →, पीछे का: ← अंग 56

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।