जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥
नानक जाणे सति सांई संत न बाहरा ॥1॥
मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥
संगि जोती जोति मिलाना राम ॥
संमाइ पूरन पुरख करते आपि आपहि जाणीऐ ॥
तह सुंनि सहजि समाधि लागी एकु एकु वखाणीऐ ॥
आपि गुपता आपि मुकता आपि आपु वखाना ॥
नानक भ्रम भै गुण बिनासे मिलि जलु जलहि खटाना ॥4॥2॥
प्रभ करण कारण समरथा राम ॥
रखु जगतु सगल दे हथा राम ॥
समरथ सरणा जोगु सुआमी क्रिपा निधि सुखदाता ॥
हंउ कुरबाणी दास तेरे जिनी एकु पछाता ॥
वरनु चिहनु न जाइ लखिआ कथन ते अकथा ॥
बिनवंति नानक सुणहु बिनती प्रभ करण कारण समरथा ॥1॥
एहि जीअ तेरे तू करता राम ॥
प्रभ दूख दरद भ्रम हरता राम ॥
भ्रम दूख दरद निवारि खिन महि रखि लेहु दीन दैआला ॥
मात पिता सुआमि सजणु सभु जगतु बाल गोपाला ॥
जो सरणि आवै गुण निधान पावै सो बहुड़ि जनमि न मरता ॥
बिनवंति नानक दासु तेरा सभि जीअ तेरे तू करता ॥2॥
आठ पहर हरि धिआईऐ राम ॥
मन इछिअड़ा फलु पाईऐ राम ॥
मन इछ पाईऐ प्रभु धिआईऐ मिटहि जम के त्रासा ॥
गोबिदु गाइआ साध संगाइआ भई पूरन आसा ॥
तजि मानु मोहु विकार सगले प्रभू कै मनि भाईऐ ॥
बिनवंति नानक दिनसु रैणी सदा हरि हरि धिआईऐ ॥3॥
दरि वाजहि अनहत वाजे राम ॥
घटि घटि हरि गोबिंदु गाजे राम ॥
गोविद गाजे सदा बिराजे अगम अगोचरु ऊचा ॥
गुण बेअंत किछु कहणु न जाई कोइ न सकै पहूचा ॥
आपि उपाए आपि प्रतिपाले जीअ जंत सभि साजे ॥
बिनवंति नानक सुखु नामि भगती दरि वजहि अनहद वाजे ॥4॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥
मुहलति पुनी पाई भरी जानीअड़ा घति चलाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसा है मैं उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।