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अंग 578

अंग
578
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहु नानक तिन खंनीऐ वंञा जिन घटि मेरा हरि प्रभु वूठा ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसा है मैं उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ। 3।
सलोकु ॥
जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥
नानक जाणे सति सांई संत न बाहरा ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारे लगते हैं।वही (असल) सेवक कहलवाते हैं। (हे भाई !) सच जान।मालिक प्रभू संतों से अलग नहीं। 1।
छंतु ॥
मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥
संगि जोती जोति मिलाना राम ॥
संमाइ पूरन पुरख करते आपि आपहि जाणीऐ ॥
तह सुंनि सहजि समाधि लागी एकु एकु वखाणीऐ ॥
आपि गुपता आपि मुकता आपि आपु वखाना ॥
नानक भ्रम भै गुण बिनासे मिलि जलु जलहि खटाना ॥4॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे भाई ! जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है (वैसे ही सेवक की) आत्मा परमात्मा के साथ मिली रहती है। पूर्ण सर्व-व्यापक करतार ने जिस सेवक को अपने में लीन कर लिया।उसके अंदर ये समझ पैदा हो जाती है कि (हर जगह) परमात्मा खुद ही खुद है। उसका हृदय (विकारों से) शून्य हो जाता है।आत्मिक अडोलता में उसकी समाधि लगी रहती है।उसके हृदय में एक परमात्मा की ही सिफत सालाह होती रहती है। (उसको निश्चय बना रहता है कि) परमात्मा सारे संसार में खुद ही छुपा हुआ है।फिर भी वह खुद माया के मोह से रहित है (हर जगह व्यापक होने के कारण) वह खुद ही अपने आप को सिमर रहा है। हे नानक ! उस मनुष्य के अंदर से भ्रम-डर और माया के तीन गुण नाश हो जाते हैं।(वह ऐसे परमात्मा के साथ एक-रूप हुआ रहता है।जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है। 4। 2।
वडहंसु महला 5 ॥
प्रभ करण कारण समरथा राम ॥
रखु जगतु सगल दे हथा राम ॥
समरथ सरणा जोगु सुआमी क्रिपा निधि सुखदाता ॥
हंउ कुरबाणी दास तेरे जिनी एकु पछाता ॥
वरनु चिहनु न जाइ लखिआ कथन ते अकथा ॥
बिनवंति नानक सुणहु बिनती प्रभ करण कारण समरथा ॥1॥
एहि जीअ तेरे तू करता राम ॥
प्रभ दूख दरद भ्रम हरता राम ॥
भ्रम दूख दरद निवारि खिन महि रखि लेहु दीन दैआला ॥
मात पिता सुआमि सजणु सभु जगतु बाल गोपाला ॥
जो सरणि आवै गुण निधान पावै सो बहुड़ि जनमि न मरता ॥
बिनवंति नानक दासु तेरा सभि जीअ तेरे तू करता ॥2॥
आठ पहर हरि धिआईऐ राम ॥
मन इछिअड़ा फलु पाईऐ राम ॥
मन इछ पाईऐ प्रभु धिआईऐ मिटहि जम के त्रासा ॥
गोबिदु गाइआ साध संगाइआ भई पूरन आसा ॥
तजि मानु मोहु विकार सगले प्रभू कै मनि भाईऐ ॥
बिनवंति नानक दिनसु रैणी सदा हरि हरि धिआईऐ ॥3॥
दरि वाजहि अनहत वाजे राम ॥
घटि घटि हरि गोबिंदु गाजे राम ॥
गोविद गाजे सदा बिराजे अगम अगोचरु ऊचा ॥
गुण बेअंत किछु कहणु न जाई कोइ न सकै पहूचा ॥
आपि उपाए आपि प्रतिपाले जीअ जंत सभि साजे ॥
बिनवंति नानक सुखु नामि भगती दरि वजहि अनहद वाजे ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे जगत के मूल प्रभू ! हे सब ताकतों के मालिक ! (अपना) हाथ दे के सारे जगत की रक्षा कर। हे सब ताकतों के मालिक ! हे शरण पड़े की सहायता कर सकने वाले मालिक ! हे कृपा के खजाने ! हे सुखदाते ! मैं आपके उन सेवकों से सदके जाता हूँ जिन्होंने आपके साथ सांझ डाली है। हे प्रभू ! आपका कोई रंग आपका कोई निशान बताया नहीं जा सकता।आपका स्वरूप बयान से बाहर है। नानक विनती करता है, हे प्रभू ! हे जगत के मूल हे सब ताकतों के मालिक ! मेरी विनती सुन। 1। हे प्रभू ! (संसार के) ये सारे जीव आपके हैं।आप इनको पैदा करने वाला है। आप सब जीवों को दुख-कलेश-भ्रमों से बचाने वाला है। हे दीनों पर दया करने वाले ! आप (सारे जीवों के) भ्रम-दुख-कलेश एक छिन में दूर करके बचा लेता है। हे गोपाल ! आप (सब जीवों का) माता-पिता।मालिक व सज्जन है।सारा जगत आपका बच्चा है। हे प्रभू ! जो जीव आपकी शरण आता है वह (आपके दर से आपके) गुणों के खजाने हासिल कर लेता है।वह दुबारा ना मरता है ना पैदा होता है। हे प्रभू ! आपका दास नानक विनती करता है, जगत के सारे जीव आपके हैं।आप सबको पैदा करने वाला है। 2। हे भाई ! आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन की बरकति से प्रभू के दर से) मन चितवा हुआ फल प्राप्त कर लेते हैं। हे भाई परमात्मा का सिमरन करना चाहिए।(सिमरन करने से) मनो-कामना हासिल कर ली जाती है।यमराज के सारे सहम भी समाप्त हो जाते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में जा के गोबिंद की सिफत सालाह की।उसकी (हरेक) आशा पूरी हो गई। हे भाई ! अहंकार।मोह।सारे विकार दूर करके परमात्मा के मन को भा जाना है। नानक विनती करता है, हे भाई ! दिन-रात सदा परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा की सिफत-सालाह के बाजे सदा बजते हैं (जिस मनुष्य के दिल में सिफत-सालाह का प्रभाव प्रबल रहता है) उसको परमात्मा हरेक शरीर में प्रत्यक्ष बसता दिखाई देता है। हे भाई ! परमात्मा सदा हरेक शरीर में साफ तौर पर बस रहा है।पर (किसी चतुराई समझदारी के सहारे) उस तक पहुँच नहीं हो सकती।उस तक मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं।वह सबसे ऊँचा है। हे भाई ! परमात्मा में बेअंत गुण हैं।उसके स्वरूप के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।कोई मनुष्य उसके गुणों के आखिर तक नहीं पहुँच सकता। हे भाई ! परमात्मा खुद सबको पैदा करता है।खुद ही पालना करता है।सारे जीव-जंतु उसके खुद के ही बनाए हुए हैं। नानक विनती करता है परमात्मा के नाम में जुड़ने से परमात्मा की भक्ति करने से आनंद प्राप्त होता है।हृदय में परमात्मा की सिफत-सालाह के एक-रस।जैसे बाजे बज पड़ते हैं। 4। 3।
रागु वडहंसु महला 1 घरु 5 अलाहणीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥
मुहलति पुनी पाई भरी जानीअड़ा घति चलाइआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु वडहंसु महला 1 घरु 5 अलाहणीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस (प्रभू) ने जगत को माया के चक्कर में लगा रखा है वही सृजनहार पातशाह सलाहने-योग्य है।(क्योंकि वही) सदा कायम रहने वाला है। (जीव बिचारे की कोई बिसात नहीं) जब जीव को मिला हुआ समय समाप्त हो जाता है जब इसकी उम्र की प्याली भर जाती है तो (शरीर के) प्यारे साथी को पकड़ के आगे लगा लिया जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसा है मैं उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।