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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 579 · वडहंस

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अंग
579
वडहंस
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  1. जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥
  2. आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥

गुरु नानक देव जी · अलाहणीआं · राग वडहंस

जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥

अंग 578 से चला आ रहा अंश

जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥
कांइआ हंस थीआ वेछोड़ा जां दिन पुंने मेरी माए ॥
जेहा लिखिआ तेहा पाइआ जेहा पुरबि कमाइआ ॥
धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥1॥
साहिबु सिमरहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥
एथै धंधा कूड़ा चारि दिहा आगै सरपर जाणा ॥
आगै सरपर जाणा जिउ मिहमाणा काहे गारबु कीजै ॥
जितु सेविऐ दरगह सुखु पाईऐ नामु तिसै का लीजै ॥
आगै हुकमु न चलै मूले सिरि सिरि किआ विहाणा ॥
साहिबु सिमरिहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥2॥
जो तिसु भावै संम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ साचड़ा सिरजणहारो ॥
साचा सिरजणहारो अलख अपारो ता का अंतु न पाइआ ॥
आइआ तिन का सफलु भइआ है इक मनि जिनी धिआइआ ॥
ढाहे ढाहि उसारे आपे हुकमि सवारणहारो ॥
जो तिसु भावै संम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥3॥
नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥
वालेवे कारणि बाबा रोईऐ रोवणु सगल बिकारो ॥
रोवणु सगल बिकारो गाफलु संसारो माइआ कारणि रोवै ॥
चंगा मंदा किछु सूझै नाही इहु तनु एवै खोवै ॥
ऐथै आइआ सभु को जासी कूड़ि करहु अहंकारो ॥
नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: (उम्र के खत्म होने पर) जब परमात्मा का लिखा हुकम आता है। शरीर के प्यारे साथी जीवात्मा को पकड़ के आगे लगा लिया जाता है। और सारे सजजन-संबंधी रोते हैं। हे मेरी माँ ! जब उम्र के दिन पूरे हो जाते हैं। तो शरीर और जीवात्मा का (सदा के लिए) विछोड़ा हो जाता है। (उस अंत समय से) पहले-पहले जो कर्म जीव ने कमाए होते हैं (उस उस के अनुसार) जैसे जैसे संस्कारों का लेख (उसके माथे पर) लिखा जाता है वैसा ही फल जीव पाता है। जिसने जगत को माया की आहर में लगा रखा है वही सृजनहार पातशाह सराहने-योग्य है वही सदा कायम रहने वाला है। 1। हे मेरे भाईयो ! (सदा स्थिर) मालिक प्रभू का सिमरन करो। (दुनिया से) कूच तो सभी ने करना है। दुनिया में माया का आहर चार दिनों के लिए ही है। (हरेक ने ही) यहाँ से आगे (परलोक में) अवश्य चले जाना है। यहाँ से आगे जरूर (हरेक ने) चले जाना है। (यहाँ जगत में) हम मेहमान की तरह ही हैं। (किसी भी धन-पदार्थ आदि का) गुमान करना व्यर्थ है। उस परमात्मा का ही नाम सिमरना चाहिए जिसके सिमरने से परमात्मा की हजूरी में आत्मिक आनंद मिलता है। (जगत में तो धन-पदार्थ वाले का हुकम चल सकता है। पर) परलोक में किसी का भी हुकम बिल्कुल नहीं चल सकता। वहाँ तो हरेक के सिर पर (अपने-अपने) किए अनुसार बीतती है। हे मेरे भाईयो ! (सदा स्थिर) मालिक प्रभू का सिमरन करो। (दुनिया से) सभी ने ही चले जाना है। 2। जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है। होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभू को भाता है। वह सदा-स्थिर रहने वाला सृजनहार पानी में धरती पर आकाश में हर जगह मौजूद है। वह प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है। सबको पैदा करने वाला है। अदृष्ट है। बेअंत है। कोई भी जीव उसके गुणों का अंत नहीं पा सकता। जगत में पैदा उनका ही सफल कहा जाता है जिन्होंने उस बेअंत प्रभू को सुरति जोड़ के सिमरा है। वह परमात्मा स्वयं ही जगत-रचना को गिरा देता है। गिरा के खुद ही फिर बना लेता है। वह अपने हुकम में जीवों को अच्छे जीवन वाले बनाता है। जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है। होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभू को अच्छा लगता है। 3। हे नानक ! (कह,विछुड़े संबन्धियों की मौत पर तो हर कोई वैराग में आ जाता है। पर इस वैराग के कोई मायने नहीं) हे भाई ! उसी मनुष्य को सही (रूप में) वैराग में आया समझो। जो प्यार से (परमात्मा के मिलाप की खातिर) वैराग में आता है। हे भाई ! दुनिया के धन पदार्थों की खातिर जो रोते हैं वह रोना सारा ही व्यर्थ जाता है। परमात्मा से भूला हुआ जगत की माया की खातिर रोता है ये सारा ही रुदन व्यर्थ है। (इस रोने से) मनुष्य को अच्छे-बुरे काम की पहचान नहीं आती। (माया की खातिर रो-रो के) इस शरीर को व्यर्थ ही नाश कर लेता है। हे भाई ! हरेक जीव जो जगत में (जन्म ले के) आया है (अपना समय गुजार के) चला जाएगा। नाशवंत जगत के मोह में फंस के (व्यर्थ) गुमान करते हैं। हे नानक ! (कह) हे भाई ! उसी मनुष्य को सही वैराग में आया समझो जो (परमात्मा के मिलाप की खातिर) प्यार से वैराग में आता है। 4। 1।

गुरु नानक देव जी · शबद · राग वडहंस

आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥

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वडहंसु महला 1 ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥
रोवह बिरहा तन का आपणा साहिबु संम॑ालेहां ॥
साहिबु सम॑ालिह पंथु निहालिह असा भि ओथै जाणा ॥
जिस का कीआ तिन ही लीआ होआ तिसै का भाणा ॥
जो तिनि करि पाइआ सु आगै आइआ असी कि हुकमु करेहा ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहा ॥1॥
मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे मरि जाणै ऐसा कोइ ॥
सेविहु साहिबु संम्रथु आपणा पंथु सुहेला आगै होइ ॥
पंथि सुहेलै जावहु तां फलु पावहु आगै मिलै वडाई ॥
भेटै सिउ जावहु सचि समावहु तां पति लेखै पाई ॥
महली जाइ पावहु खसमै भावहु रंग सिउ रलीआ माणै ॥
मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे कोई मरि जाणै ॥2॥
मरणु मुणसा सूरिआ हकु है जो होइ मरनि परवाणो ॥

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ हे सहेलियो ! (हे सत्संगी सज्जनों !) आएँ। मिल के बैठें और परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम सिमरें। आएँ। प्रभू से अपने विछोड़े का बारंबार अफसोस से चेता करें। (वह वियोग दूर करने के लिए) मालिक प्रभू को याद करें। आएँ। हम मालिक को दिल में बसाएं। और उस रास्ते को देखें (जिस रास्ते सब जा रहे हैं)।हमने भी (आखिर) उस परलोक में जाना है (जहाँ अनेकों जा चुके हैं)। (किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है) जिस प्रभू का ये पैदा किया हुआ था। उसने जीवात्मा वापस ले ली है। उसकी की रजा हुई है। यहाँ जगत में जीव ने जो कुछ किया। (मरने पर) उसके आगे आ जाता है। (इस ईश्वरीय नियम के आगे) हमारा कोई जोर नहीं चल सकता। (इस वास्ते) हे सहेलियो ! आएँ। मिल के बैठें और सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम सिमरें। 1। हे लोगो ! मौत को बुरा ना कहो (मौत अच्छी है। पर तब ही) अगर कोई मनुष्य उस तरीके से (जी के) मरना जानता हैं। (वह तरीका ये है कि) अपने सर्व-शक्तिमान मालिक को सिमरो। (ताकि जीवन के सफर में) रास्ता आसान हो जाए (सिमरन की बरकति से) आसान जीवन-राह पर चलोगे तो इसका फल भी मिलेगा प्रभू की हजूरी में सम्मान मिलेगा। अगर प्रभू के नाम की भेटा ले के जाएँगे तो उस सदा स्थिर प्रभू में एक-रूप हो जाएँगे। किए कर्मों के हिसाब के समय इज्जत मिलेगी। प्रभू की हजूरी में स्थान प्राप्त करेंगे। और पति-प्रभू को अच्छे लगोगे। (जो जीव ये भेटा ले के जाता है वह) प्रेम से आत्मिक आनंद लेता है। हे लोगो ! मौत को बुरा ना कहो (पर इस बात को वही समझता है) जो इस तरह मरना जानता हैं। 2। जो मनुष्य (जीते जी ही प्रभू की नजरों में) कबूल हो के मरते हैं वे शूरवीर हैं उनका मरना भी (लोक-परलोक में) सराहा जाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 579 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।