तिन निहफलु तिन निहफलु जनमु सभु ब्रिथा गवाइआ राम ॥
निहफलु जनमु तिन ब्रिथा गवाइआ ते साकत मुए मरि झूरे ॥
घरि होदै रतनि पदारथि भूखे भागहीण हरि दूरे ॥
हरि हरि तिन का दरसु न करीअहु जिनी हरि हरि नामु न धिआइआ ॥
जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ ॥3॥
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती राम ॥
गुर मिलि गुर मेलि मेरा पिआरा हम सतिगुर करह भगती राम ॥
हरि हरि सतिगुर करह भगती जां हरि प्रभु किरपा धारे ॥
मै गुर बिनु अवरु न कोई बेली गुरु सतिगुरु प्राण हम॑ारे ॥
कहु नानक गुरि नामु द्रिड़्हाइआ हरि हरि नामु हरि सती ॥
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती ॥4॥3॥
हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥
हम पूछह हम पूछह सतिगुर पासि हरि बाता राम ॥
सतिगुर पासि हरि बात पूछह जिनि नामु पदारथु पाइआ ॥
पाइ लगह नित करह बिनंती गुरि सतिगुरि पंथु बताइआ ॥
सोई भगतु दुखु सुखु समतु करि जाणै हरि हरि नामि हरि राता ॥
हरि किरपा हरि किरपा करि गुरु सतिगुरु मेलि सुखदाता ॥1॥
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामि सभि बिनसे हंउमै पापा राम ॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु लथिअड़े जगि तापा राम ॥
हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन के दुख पाप निवारे ॥
सतिगुरि गिआन खड़गु हथि दीना जमकंकर मारि बिदारे ॥
हरि प्रभि क्रिपा धारी सुखदाते दुख लाथे पाप संतापा ॥
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामु सभि बिनसे हंउमै पापा ॥2॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ राम ॥
मुखि गुरमुखि मुखि गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ राम ॥
गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ अरोगत भए सरीरा ॥
अनदिनु सहज समाधि हरि लागी हरि जपिआ गहिर गंभीरा ॥
जाति अजाति नामु जिन धिआइआ तिन परम पदारथु पाइआ ॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू महापुरुष के दर्शन नहीं किए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।