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अंग 574

अंग
574
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ राम ॥
तिन निहफलु तिन निहफलु जनमु सभु ब्रिथा गवाइआ राम ॥
निहफलु जनमु तिन ब्रिथा गवाइआ ते साकत मुए मरि झूरे ॥
घरि होदै रतनि पदारथि भूखे भागहीण हरि दूरे ॥
हरि हरि तिन का दरसु न करीअहु जिनी हरि हरि नामु न धिआइआ ॥
जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ ॥3॥
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती राम ॥
गुर मिलि गुर मेलि मेरा पिआरा हम सतिगुर करह भगती राम ॥
हरि हरि सतिगुर करह भगती जां हरि प्रभु किरपा धारे ॥
मै गुर बिनु अवरु न कोई बेली गुरु सतिगुरु प्राण हम॑ारे ॥
कहु नानक गुरि नामु द्रिड़्हाइआ हरि हरि नामु हरि सती ॥
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू महापुरुष के दर्शन नहीं किए। उनका जन्म व्यर्थ गया।उन्होंने सारा जीवन बे-अर्थ गवा लिया। उन्होंने अपना जनम अकारथ गवा लिया।परमात्मा से टूटे हुए वे मनुष्य आत्मिक मौत मर गए। आत्मिक मौत सहेड़ के वे (सारी उम्र) दुखी ही रहे।हृदय-गृह में कीमती हरी-नाम होते हुए भी वे बद्-नसीब मरूँ-मरूँ करते रहे।और।परमात्मा से विछुड़े रहे। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा।जिन्होंने गुरू महापुरुष के दर्शन नहीं किए। खुदा के लिए आप (भी) उनके दर्शन ना करना। 3। (हे भाई ! परमात्मा हमारा बादल है) हम निमाणे से (तुच्छ से) पपीहे हैं (मैं छोटा सा पपीहा हूँ)।मैं अदना सा पपीहा हूँ।मैं परमात्मा के पास विनती करता हूँ कि मुझे मेरा प्यारा गुरू मिला।गुरू सतिगुरू को मिल के मैं परमात्मा की भक्ति करूँगा। हे भाई ! गुरू को मिल के परमात्मा की भक्ति हम तभी कर सकते हैं जब परमात्मा कृपा करता है। गुरू के बिना मुझे और कोई मददगार नहीं दिखाई देता।गुरू ही मेरी जिंदगी (का आसरा) है। हे नानक ! (कह) गुरू ने ही परमात्मा के सदा कायम रहने वाला नाम (मेरे) दिल में पक्का किया है। मैं पपीहा हूँ (परमात्मा मेरा बादल है) मैं परमात्मा के पास विनती करता हूँ (कि मुझे गुरू मिला दे)। 4। 3।
वडहंसु महला 4 ॥
हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥
हम पूछह हम पूछह सतिगुर पासि हरि बाता राम ॥
सतिगुर पासि हरि बात पूछह जिनि नामु पदारथु पाइआ ॥
पाइ लगह नित करह बिनंती गुरि सतिगुरि पंथु बताइआ ॥
सोई भगतु दुखु सुखु समतु करि जाणै हरि हरि नामि हरि राता ॥
हरि किरपा हरि किरपा करि गुरु सतिगुरु मेलि सुखदाता ॥1॥
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामि सभि बिनसे हंउमै पापा राम ॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु लथिअड़े जगि तापा राम ॥
हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन के दुख पाप निवारे ॥
सतिगुरि गिआन खड़गु हथि दीना जमकंकर मारि बिदारे ॥
हरि प्रभि क्रिपा धारी सुखदाते दुख लाथे पाप संतापा ॥
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामु सभि बिनसे हंउमै पापा ॥2॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ राम ॥
मुखि गुरमुखि मुखि गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ राम ॥
गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ अरोगत भए सरीरा ॥
अनदिनु सहज समाधि हरि लागी हरि जपिआ गहिर गंभीरा ॥
जाति अजाति नामु जिन धिआइआ तिन परम पदारथु पाइआ ॥
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ ॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 ॥ हे हरी ! मेहर कर।मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरू मिला। मैं गुरू से परमात्मा की सिफत सालाह की बीतें पूछा करूँगा। जिस गुरू ने परमात्मा का अमूल्य नाम-रत्न हासिल किया हुआ है उस गुरू से मैं परमात्मा की सिफत सालाह की बातें किया करूँगा। जिस गुरू ने (गलत रास्ते पर जा रहे जगत को जीवन का सही) रास्ता बताया है।मैं सदा ही उस गुरू के चरणों में लगूँगा।मैं उस गुरू के आगे विनती करूँगा (कि वह मुझे भी सही जीवन-राह बताए)। वह (गुरू) ही (दरअसल) भगत है।गुरू दुख और सुख को एक समान करके जानता है।गुरू सदा परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। हे हरी ! मेहर कर।मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरू मिला। 1। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर (परमात्मा का नाम) सुन।(जो मनुष्य नाम सुनता है) नाम के द्वारा उसका अहंकार आदि सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर।जगत में (जितने भी) दुख-कलेश (है वे सारे) उतर जाते हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरा है।(नाम) उनके सारे दुख-पाप दूर कर देता है। गुरू ने (जिस मनुष्य के) हाथ में आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार पकड़ा दी उसने यमराज के दूत खत्म कर डाले (अर्थात।मौत का आत्मिक मौत का खतरा समाप्त कर दिया)। सुखों के दाते हरी-प्रभू ने जिस मनुष्य पे मेहर की।उसके सारे दुख-पाप-कलेश उतर गए। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सुना कर (जो सुनता है उसके) अहंकार आदि सारे पाप नाश हो जाते हैं। 2। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर।मेरे मन को (तो) परमात्मा का नाम प्यारा लग रहा है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर मुंह से हरी-नाम जपा कर।ये हरी-नाम सारे रोग दूर कर देता है। गुरू के द्वारा हरी-नाम जपा कर।ये हरी नाम सारे रोग दूर कर देता है।शरीर नरोआ।निरोग हो जाता है। गहरे और बड़े जिगरे वाला हरी का नाम जपने से हर वक्त आत्मिक अडोलता में सुरति जुड़ी रहती है। ऊँची जाति के हों चाहे नीच जाति के।जिन्होंने हरी-नाम सिमरा है उन्होंने सबसे श्रेष्ठ नाम-पदार्थ हासिल कर लिया है। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर।मेरे मन को (तो) परमात्मा का नाम प्यारा लग रहा है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू महापुरुष के दर्शन नहीं किए।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।