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अंग 573

अंग
573
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एक द्रिस्टि हरि एको जाता हरि आतम रामु पछाणी ॥
हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी ॥1॥
जिना सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए राम ॥
तिन चरण तिन चरण सरेवह हम लागह तिन कै पाए राम ॥
हरि हरि चरण सरेवह तिन के जिन सतिगुरु पुरखु प्रभु ध्याइआ ॥
तू वडदाता अंतरजामी मेरी सरधा पूरि हरि राइआ ॥
गुरसिख मेलि मेरी सरधा पूरी अनदिनु राम गुण गाए ॥
जिन सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए ॥2॥
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे राम ॥
हरि नामो हरि नामु सुणाए मेरा प्रीतमु नामु अधारे राम ॥
हरि हरि नामु मेरा प्रान सखाई तिसु बिनु घड़ी निमख नही जीवां ॥
हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि अंम्रितु पीवां ॥
हरि आपे सरधा लाइ मिलाए हरि आपे आपि सवारे ॥
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे ॥3॥
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई राम ॥
हरि आपे हरि आपे मेलै करै सो होई राम ॥
जो हरि प्रभ भावै सोई होवै अवरु न करणा जाई ॥
बहुतु सिआणप लइआ न जाई करि थाके सभि चतुराई ॥
गुर प्रसादि जन नानक देखिआ मै हरि बिनु अवरु न कोई ॥
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: मैंने एक निगाह से एक परमात्मा को (हर जगह बसता) समझ लिया।मैंने सर्व-व्यापक राम को पहचान लिया। गुरू के बगैर मैं (पहले) बहुत ही छोटी थी (आजिज थी)। 1। हे भाई ! जिन (भाग्यशालियों ने) गुरू को पा लिया।उन्हें हरी-प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। मैं उनके चरणों की सेवा करने को तैयार हूँ।उनके चरण लगने को तैयार हूँ। हे हरी ! जिन मनुष्यों ने गुरू को अपने हृदय में बसा लिया है (आपको) प्रभू को दिल में टिका लिया है।मैं उनकी सेवा करनी चाहता हूँ। हे प्रभू पातशाह ! आप बड़ा दातार है।आप सबके दिल की जानने वाला है।मेरी ये चाहत पूरी कर। हे भाई ! मेरी ये चाहत गुरसिखों की संगति में पूरी हो सकती है (जिसको गुरसिखों की संगति प्राप्त होती है।वह) हर वक्त परमात्मा के गुण गाने लग जाता है। जिन (भाग्यशालियों) ने गुरू पा लिया।उन्हें हरी-प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। 2। मैं उस प्यारे मित्र गरासिख से सदके जाता हूँ कुर्बान जाता हूँ। परमात्मा का नाम ही मेरा मित्र है। जो मुझे सदैव परमात्मा का नाम सुनाता रहे। (मेरी जिंदगी का) आसरा है परमात्मा का नाम मेरी जीवात्मा का साथी है। उस (नाम) के बिना मैं एक घड़ी भर आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं रह सकता। सुखों को देने वाला प्रभू अगर मेहर करे।तो ही मैं गुरू के सन्मुख रहके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी सकता हूँ। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही अपने (मिलाप की) चाहत पैदा करता है खुद ही (अपने चरणों में) जोड़ता है।परमात्मा स्वयं ही (अपना नाम दे के मनुष्य का जीवन) सुंदर बनाता है। मैं गुरू के सिख से।प्यारे मित्र से सदके जाता हूँ।कुर्बान जाता हूँ। 3। हे भाई ! सवै-व्यापक और माया के प्रभाव से रहित परमात्मा (सब कुछ करने के लायक) खुद ही खुद है। वह परमात्मा स्वयं ही (जीवों को अपने चरणों में) मिलाता है।जो कुछ वह करता है वही होता है। हे भाई ! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है (उसकी रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता। अधिक चतुराई करने से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि बहुत सारे चतुराई करने वाले थक गए हैं। हे दास नानक ! (कह) मैंने गुरू की कृपा से (उस परमात्मा के) दर्शन किए हैं।मुझे परमात्मा के बिना और कोई (सहारा) नहीं (दिखाई देता)। हे भाई ! सर्व-व्यापक और माया के प्रभाव से रहित परमात्मा स्वयं ही (सब कुछ करने योग्य) है। 4। 2।
वडहंसु महला 4 ॥
हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥
तिमर अगिआनु गवाइआ गुर गिआनु अंजनु गुरि पाइआ राम ॥
गुर गिआन अंजनु सतिगुरू पाइआ अगिआन अंधेर बिनासे ॥
सतिगुर सेवि परम पदु पाइआ हरि जपिआ सास गिरासे ॥
जिन कंउ हरि प्रभि किरपा धारी ते सतिगुर सेवा लाइआ ॥
हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ ॥1॥
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई राम ॥
हरि नामो हरि नामु देवै मेरा अंति सखाई राम ॥
हरि हरि नामु मेरा अंति सखाई गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
जिथै पुतु कलत्रु कोई बेली नाही तिथै हरि हरि नामि छडाइआ ॥
धनु धनु सतिगुरु पुरखु निरंजनु जितु मिलि हरि नामु धिआई ॥
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 ॥ हे हरी ! मुझे गुरू के चरणों में रख।मुझे गुरू के चरणों में रख।गुरू के चरण मुझे प्यारे लगते हैं। (जिस मनुष्य ने) गुरू के माध्यम से आत्मिक जीवन की सूझ (का) अंजन हासिल कर लिया।(उसने अपने अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (अज्ञानता का) अंधकार दूर कर लिया। जिस मनुष्य ने गुरू से ज्ञान का सुरमा ले लिया उस मनुष्य के अज्ञान के अंधेरे नाश हो जाते हैं। गुरू की बताई सेवा करके वह मनुष्य सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है।वह मनुष्य हरेक सांस से हरेक ग्रास से परमात्मा का नाम जपता रहता है। हे भाई ! हरी-प्रभू ने जिन मनुष्यों पर मेहर की।उनको उसने गुरू सेवा में जोड़ दिया। हे हरी ! मुझे गुरू चरणों में रख।गुरू के चरणों में रख।गुरू के चरण मुझे प्यारे लगते हैं। 1। हे भाई ! मुझे मेरा गुरू बहुत प्यारा लगता है।गुरू के बिना मै रह नहीं सकता। गुरू मुझे हरी-नाम देता है जो आखिरी वक्त में मेरा साथी बनेगा। गुरू ने वह हरी-नाम मेरे दिल में पक्का कर दिया है जो अंत समय मेरा मित्र बनने वाला है। जहाँ पे पुत्र।स्त्री कोई भी मददगार नहीं बनता।वहाँ हरी-नाम ने ही (जीव को बिपता से) छुड़वाना है। धन्य है गुरू।गुरू निर्लिप परमात्मा का रूप है।उस गुरू में लीन हो के मैं परमात्मा का नाम सिमरता हूँ। हे भाई ! मुझे गुरू बहुत प्यारा लगता है।गुरू के बिना मैं रह नहीं सकता। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैंने एक निगाह से एक परमात्मा को (हर जगह बसता) समझ लिया।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।