हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी ॥1॥
जिना सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए राम ॥
तिन चरण तिन चरण सरेवह हम लागह तिन कै पाए राम ॥
हरि हरि चरण सरेवह तिन के जिन सतिगुरु पुरखु प्रभु ध्याइआ ॥
तू वडदाता अंतरजामी मेरी सरधा पूरि हरि राइआ ॥
गुरसिख मेलि मेरी सरधा पूरी अनदिनु राम गुण गाए ॥
जिन सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए ॥2॥
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे राम ॥
हरि नामो हरि नामु सुणाए मेरा प्रीतमु नामु अधारे राम ॥
हरि हरि नामु मेरा प्रान सखाई तिसु बिनु घड़ी निमख नही जीवां ॥
हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि अंम्रितु पीवां ॥
हरि आपे सरधा लाइ मिलाए हरि आपे आपि सवारे ॥
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे ॥3॥
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई राम ॥
हरि आपे हरि आपे मेलै करै सो होई राम ॥
जो हरि प्रभ भावै सोई होवै अवरु न करणा जाई ॥
बहुतु सिआणप लइआ न जाई करि थाके सभि चतुराई ॥
गुर प्रसादि जन नानक देखिआ मै हरि बिनु अवरु न कोई ॥
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई ॥4॥2॥
हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥
तिमर अगिआनु गवाइआ गुर गिआनु अंजनु गुरि पाइआ राम ॥
गुर गिआन अंजनु सतिगुरू पाइआ अगिआन अंधेर बिनासे ॥
सतिगुर सेवि परम पदु पाइआ हरि जपिआ सास गिरासे ॥
जिन कंउ हरि प्रभि किरपा धारी ते सतिगुर सेवा लाइआ ॥
हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ ॥1॥
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई राम ॥
हरि नामो हरि नामु देवै मेरा अंति सखाई राम ॥
हरि हरि नामु मेरा अंति सखाई गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
जिथै पुतु कलत्रु कोई बेली नाही तिथै हरि हरि नामि छडाइआ ॥
धनु धनु सतिगुरु पुरखु निरंजनु जितु मिलि हरि नामु धिआई ॥
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैंने एक निगाह से एक परमात्मा को (हर जगह बसता) समझ लिया।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।