इस पृष्ठ पर
अंग
575
वडहंस
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
· छंत · राग वडहंस
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥
हम पापी हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे राम ॥
हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे हरि दैआल सरणाइआ ॥
तू दुख भंजनु सरब सुखदाता हम पाथर तरे तराइआ ॥
सतिगुर भेटि राम रसु पाइआ जन नानक नामि उधारे ॥
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥4॥4॥
हम पापी हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे राम ॥
हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे हरि दैआल सरणाइआ ॥
तू दुख भंजनु सरब सुखदाता हम पाथर तरे तराइआ ॥
सतिगुर भेटि राम रसु पाइआ जन नानक नामि उधारे ॥
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे हरी ! कृपा करें। (हमें विकारों से) बचा लें। हम पापी हैं। गुणहीन हैं। दीन हैं। (पर फिर भी) आपके हैं। हे दया के घर हरी ! हम विकारी हैं। गुणों से हीन हैं। (आत्मिक जीवन से भी) कंगाल हैं। पर हम है आपके। और, आपकी शरण आए हैं। आप दुखों का नाश करने वाले हैं। आप सारे सुख देने वाले हैं। हम कठोर-चित्त हैं। आपके तैराए हुए ही तैर सकते हैं। हे नानक (कहें) गुरू को मिल के जिन्होंने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है। उनको हरी-नाम ने (विकारों में डूबतों को) बचा लिया है। हे हरी ! कृपा करें। (हमें विकारों से) बचा लें। 4। 4।
· घोड़ीआं · राग वडहंस
देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥
वडहंसु महला 4 घोड़ीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥
धंनु माणस जनमु पुंनि पाईआ राम ॥
माणस जनमु वड पुंने पाइआ देह सु कंचन चंगड़ीआ ॥
गुरमुखि रंगु चलूला पावै हरि हरि हरि नव रंगड़ीआ ॥
एह देह सु बांकी जितु हरि जापी हरि हरि नामि सुहावीआ ॥
वडभागी पाई नामु सखाई जन नानक रामि उपाईआ ॥1॥
देह पावउ जीनु बुझि चंगा राम ॥
चड़ि लंघा जी बिखमु भुइअंगा राम ॥
बिखमु भुइअंगा अनत तरंगा गुरमुखि पारि लंघाए ॥
हरि बोहिथि चड़ि वडभागी लंघै गुरु खेवटु सबदि तराए ॥
अनदिनु हरि रंगि हरि गुण गावै हरि रंगी हरि रंगा ॥
जन नानक निरबाण पदु पाइआ हरि उतमु हरि पदु चंगा ॥2॥
कड़ीआलु मुखे गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ राम ॥
तनि प्रेमु हरि चाबकु लाइआ राम ॥
तनि प्रेमु हरि हरि लाइ चाबकु मनु जिणै गुरमुखि जीतिआ ॥
अघड़ो घड़ावै सबदु पावै अपिउ हरि रसु पीतिआ ॥
सुणि स्रवण बाणी गुरि वखाणी हरि रंगु तुरी चड़ाइआ ॥
महा मारगु पंथु बिखड़ा जन नानक पारि लंघाइआ ॥3॥
घोड़ी तेजणि देह रामि उपाईआ राम ॥
जितु हरि प्रभु जापै सा धनु धंनु तुखाईआ राम ॥
जितु हरि प्रभु जापै सा धंनु साबासै धुरि पाइआ किरतु जुड़ंदा ॥
चड़ि देहड़ि घोड़ी बिखमु लघाए मिलु गुरमुखि परमानंदा ॥
हरि हरि काजु रचाइआ पूरै मिलि संत जना जंञ आई ॥
जन नानक हरि वरु पाइआ मंगलु मिलि संत जना वाधाई ॥4॥1॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥
धंनु माणस जनमु पुंनि पाईआ राम ॥
माणस जनमु वड पुंने पाइआ देह सु कंचन चंगड़ीआ ॥
गुरमुखि रंगु चलूला पावै हरि हरि हरि नव रंगड़ीआ ॥
एह देह सु बांकी जितु हरि जापी हरि हरि नामि सुहावीआ ॥
वडभागी पाई नामु सखाई जन नानक रामि उपाईआ ॥1॥
देह पावउ जीनु बुझि चंगा राम ॥
चड़ि लंघा जी बिखमु भुइअंगा राम ॥
बिखमु भुइअंगा अनत तरंगा गुरमुखि पारि लंघाए ॥
हरि बोहिथि चड़ि वडभागी लंघै गुरु खेवटु सबदि तराए ॥
अनदिनु हरि रंगि हरि गुण गावै हरि रंगी हरि रंगा ॥
जन नानक निरबाण पदु पाइआ हरि उतमु हरि पदु चंगा ॥2॥
कड़ीआलु मुखे गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ राम ॥
तनि प्रेमु हरि चाबकु लाइआ राम ॥
तनि प्रेमु हरि हरि लाइ चाबकु मनु जिणै गुरमुखि जीतिआ ॥
अघड़ो घड़ावै सबदु पावै अपिउ हरि रसु पीतिआ ॥
सुणि स्रवण बाणी गुरि वखाणी हरि रंगु तुरी चड़ाइआ ॥
महा मारगु पंथु बिखड़ा जन नानक पारि लंघाइआ ॥3॥
घोड़ी तेजणि देह रामि उपाईआ राम ॥
जितु हरि प्रभु जापै सा धनु धंनु तुखाईआ राम ॥
जितु हरि प्रभु जापै सा धंनु साबासै धुरि पाइआ किरतु जुड़ंदा ॥
चड़ि देहड़ि घोड़ी बिखमु लघाए मिलु गुरमुखि परमानंदा ॥
हरि हरि काजु रचाइआ पूरै मिलि संत जना जंञ आई ॥
जन नानक हरि वरु पाइआ मंगलु मिलि संत जना वाधाई ॥4॥1॥5॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 घोड़ीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (मनुष्य की) ये काया (जैसे) घोड़ी है (इसको) परमात्मा ने पैदा किया है। मानस जन्म भाग्यशाली है (जिसमें ये काया प्राप्त होती है) सौभाग्य से ही (जीव ने ये काया) पाई है। हे भाई ! मानस जन्म बड़ी किस्मत से ही मिलता है। पर उसी मनुष्य की काया सोने जैसी व सुंदर है जो गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम का गाढ़ा रंग हासिल करता है। उस मनुष्य की काया हरी-नाम के नए रंग से रंगी जाती है। हे भाई ! ये काया सुंदर है क्योंकि इस काया से मैं परमात्मा का नाम जप सकता हूँ। हरी नाम की बरकति से यह काया सोहणी बन जाती है। हे भाई ! उस अति भाग्यशाली मनुष्य ने ही यह काया (असल में) प्राप्त की समझें। परमात्मा का नाम जिस मनुष्य का मित्र बन जाता है। हे दास नानक ! (नाम सिमरने के लिए ही ये काया) परमात्मा ने पैदा की है। 1। हे भाई ! परमात्मा के गुणों को विचार के मैं (अपनी शरीर घोड़ी पर। सिफत सालाह की) काठी डालता हूँ। (उस काठी वाली घोड़ी पर) चढ़ के (काया को वश में कर के) मैं इस मुश्किल (से तैरे जाने वाले) संसार समुंद्र से पार लांघता हूँ। (हे भाई ! कोई विरला) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (ही) इस मुश्किल संसार-समुंद्र से पार लांघता है (क्योंकि इसमें विकारों की) बेअंत लहरें पड़ रही हैं। कोई दुर्लभ अति भाग्यशाली मनुष्य हरी-नाम के जहाज में चढ़ के पार लांघता है। गुरू-मल्लाह अपने शबद के साथ जोड़ के पार लंघा लेता है। विषम संसार सागर में असंख्य ही तरंगें हैं और गुरु के माध्यम से ही जीव इससे पार होते हैं। हरि रूपी जहाज पर सवार होकर भाग्यशाली पार हो जाते हैं और गुरु खेवट अपने शब्द से जीवों को पार कर देता है। हे नानक ! जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा के प्रेम रंग में (टिक के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। वह हरी नाम रंग में रंगा जाता है। वह मनुष्य वह ऊँचा और स्वच्छ आत्मिक स्तर हासिल कर लेता है जहाँ वासना छू नहीं सकती। 2। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने आत्मिक जीवन की समझ पक्की कर दी। उसने ये सूझ (अपनी काया घोड़ी के) मुंह में (जैसे) लगाम दे दी है। उस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है। ये प्यार वह मनुष्य अपनी काया-घोड़ी को (जैसे) चाबुक मारता रहता है। हृदय में पैदा हरी नाम का प्रेम में लीन वह मनुष्य अपनी काया घोड़ी को चाबुक मारता रहता है। और अपने मन को वश में किए रखता है। पर। ये मन गुरू की शरण पड़ के ही जीता जा सकता है। वह मनुष्य गुरू का शबद प्राप्त करता है। आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस पीता रहता है। और (जत, धैर्य आदि की कुठाली में) अल्हड़ मन को घड़ लेता है (परिपक्व बना लेता है)। गुरू की जो बाणी उचारी हुई है इस को अपने कानों से सुन के (भाव। ध्यान से सुन के वह मनुष्य अपने अंदर) परमात्मा का प्यार पैदा करता है। और इस तरह काया-घोड़ी पर सवार होता है (काया को वश में करता है)। हे दास नानक ! (ये मनुष्य जीवन) बड़ा मुश्किल रास्ता है। (पर। गुरू की शरण पड़े मनुष्य को) पार लंघा लेता है। 3। हे भाई ! ये मनुष्य शरीर रूपी घोड़ी परमात्मा ने पैदा की है (कि इस घोड़ी पर चढ़ कर जीव जीवन-यात्रा को सफलता से तय करे। सो) जिस (शरीर-घोड़ी) के द्वारा मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है। वह धन्य है। उसे शाबाशी मिलती है। (इससे) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह सामने आ जाता है। हे भाई ! इस सुंदर काया-घोड़ी पर चढ़। (ये घोड़ी) मुश्किल संसार-समुंद्र से पार लंघा लेती है। (इसके द्वारा) गुरू की शरण पड़ कर परम आनंद के मालिक परमात्मा को मिलें। पूरन परमात्मा ने जिस जीव-स्त्री का विवाह रच दिया (जिस जीव-वधू को अपने साथ मिलाने का अवसर बना दिया)।सत्संगियों के साथ मिल के (मानो। उसकी) बारात आ गई। हे दास नानक ! संत जनों से मिल के उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति (का मिलाप) हासिल कर लिया। उसने आत्मिक आनंद पा लिया। उसके अंदर आत्मिक मंगल के गीत (शादी के मंगलमयी गीत) बज पड़े। 4। 1। 5।
· शबद · राग वडहंस
देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥
वडहंसु महला 4 ॥
देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥
गुर गिआनु गुरू हरि मंगीआ राम ॥
देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥
गुर गिआनु गुरू हरि मंगीआ राम ॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 ॥ हे भाई ! वह काया सुंदर घोड़ी है (जीव-राही की जीवन-यात्रा के लिए बढ़िया घोड़ी है) जो परमात्मा के प्रेम के नए रंग में रंगी रहती है। जो गुरू से आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ समझ मांगती रहती है। जो (गुरू से) आत्मिक जीवन की सूझ मांगती है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 575 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।