हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥ हम पापी हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे राम ॥ हम पापी निरगुण दीन तुम॑ारे हरि दैआल सरणाइआ ॥ तू दुख भंजनु सरब सुखदाता हम पाथर तरे तराइआ ॥ सतिगुर भेटि राम रसु पाइआ जन नानक नामि उधारे ॥ हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: हे हरी ! कृपा कर।(हमें विकारों से) बचा ले। हम पापी हैं।गुणहीन हैं।दीन हैं।(पर फिर भी) आपके हैं। हे दया के घर हरी ! हम विकारी हैं।गुणों से हीन हैं।(आत्मिक जीवन से भी) कंगाल हैं।पर हम है आपके।और।आपकी शरण आए हैं। आप दुखों का नाश करने वाला है।आप सारे सुख देने वाला है।हम कठोर-चित्त हैं।आपके तैराए हुए ही तैर सकते हैं। हे नानक (कह) गुरू को मिल के जिन्होंने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है।उनको हरी-नाम ने (विकारों में डूबतों को) बचा लिया है। हे हरी ! कृपा कर।(हमें विकारों से) बचा ले। 4। 4।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 घोड़ीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (मनुष्य की) ये काया (जैसे) घोड़ी है (इसको) परमात्मा ने पैदा किया है। मानस जन्म भाग्यशाली है (जिसमें ये काया प्राप्त होती है) सौभाग्य से ही (जीव ने ये काया) पाई है। हे भाई ! मानस जन्म बड़ी किस्मत से ही मिलता है।पर उसी मनुष्य की काया सोने जैसी व सुंदर है जो गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम का गाढ़ा रंग हासिल करता है।उस मनुष्य की काया हरी-नाम के नए रंग से रंगी जाती है। हे भाई ! ये काया सुंदर है क्योंकि इस काया से मैं परमात्मा का नाम जप सकता हूँ।हरी नाम की बरकति से यह काया सोहणी बन जाती है। हे भाई ! उस अति भाग्यशाली मनुष्य ने ही यह काया (असल में) प्राप्त की समझ।परमात्मा का नाम जिस मनुष्य का मित्र बन जाता है।हे दास नानक ! (नाम सिमरने के लिए ही ये काया) परमात्मा ने पैदा की है। 1। हे भाई ! परमात्मा के गुणों को विचार के मैं (अपनी शरीर घोड़ी पर।सिफत सालाह की) काठी डालता हूँ। (उस काठी वाली घोड़ी पर) चढ़ के (काया को वश में कर के) मैं इस मुश्किल (से तैरे जाने वाले) संसार समुंद्र से पार लांघता हूँ।(हे भाई ! कोई विरला) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (ही) इस मुश्किल संसार-समुंद्र से पार लांघता है (क्योंकि इसमें विकारों की) बेअंत लहरें पड़ रही हैं।कोई दुर्लभ अति भाग्यशाली मनुष्य हरी-नाम के जहाज में चढ़ के पार लांघता है।गुरू-मल्लाह अपने शबद के साथ जोड़ के पार लंघा लेता है। विषम संसार सागर में असंख्य ही तरंगें हैं और गुरु के माध्यम से ही जीव इससे पार होते हैं। हरि रूपी जहाज पर सवार होकर भाग्यशाली पार हो जाते हैं और गुरु खेवट अपने शब्द से जीवों को पार कर देता है। हे नानक ! जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा के प्रेम रंग में (टिक के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। वह हरी नाम रंग में रंगा जाता है।वह मनुष्य वह ऊँचा और स्वच्छ आत्मिक स्तर हासिल कर लेता है जहाँ वासना छू नहीं सकती। 2। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने आत्मिक जीवन की समझ पक्की कर दी। उसने ये सूझ (अपनी काया घोड़ी के) मुंह में (जैसे) लगाम दे दी है। उस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है।ये प्यार वह मनुष्य अपनी काया-घोड़ी को (जैसे) चाबुक मारता रहता है।हृदय में पैदा हरी नाम का प्रेम में लीन वह मनुष्य अपनी काया घोड़ी को चाबुक मारता रहता है।और अपने मन को वश में किए रखता है।पर। ये मन गुरू की शरण पड़ के ही जीता जा सकता है।वह मनुष्य गुरू का शबद प्राप्त करता है।आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस पीता रहता है।और (जत।धैर्य आदि की कुठाली में) अल्हड़ मन को घड़ लेता है (परिपक्व बना लेता है)। गुरू की जो बाणी उचारी हुई है इस को अपने कानों से सुन के (भाव।ध्यान से सुन के वह मनुष्य अपने अंदर) परमात्मा का प्यार पैदा करता है।और इस तरह काया-घोड़ी पर सवार होता है (काया को वश में करता है)। हे दास नानक ! (ये मनुष्य जीवन) बड़ा मुश्किल रास्ता है।(पर।गुरू की शरण पड़े मनुष्य को) पार लंघा लेता है। 3। हे भाई ! ये मनुष्य शरीर रूपी घोड़ी परमात्मा ने पैदा की है (कि इस घोड़ी पर चढ़ कर जीव जीवन-यात्रा को सफलता से तय करे। सो) जिस (शरीर-घोड़ी) के द्वारा मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है।वह धन्य है। उसे शाबाशी मिलती है।(इससे) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह सामने आ जाता है। हे भाई ! इस सुंदर काया-घोड़ी पर चढ़।(ये घोड़ी) मुश्किल संसार-समुंद्र से पार लंघा लेती है।(इसके द्वारा) गुरू की शरण पड़ कर परम आनंद के मालिक परमात्मा को मिल। पूरन परमात्मा ने जिस जीव-स्त्री का विवाह रच दिया (जिस जीव-वधू को अपने साथ मिलाने का अवसर बना दिया)।सत्संगियों के साथ मिल के (मानो।उसकी) बारात आ गई। हे दास नानक ! संत जनों से मिल के उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति (का मिलाप) हासिल कर लिया।उसने आत्मिक आनंद पा लिया।उसके अंदर आत्मिक मंगल के गीत (शादी के मंगलमयी गीत) बज पड़े। 4। 1। 5।
वडहंसु महला 4 ॥ देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥ गुर गिआनु गुरू हरि मंगीआ राम ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 ॥ हे भाई ! वह काया सुंदर घोड़ी है (जीव-राही की जीवन-यात्रा के लिए बढ़िया घोड़ी है) जो परमात्मा के प्रेम के नए रंग में रंगी रहती है। जो गुरू से आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ समझ मांगती रहती है।जो (गुरू से) आत्मिक जीवन की सूझ मांगती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।