नानक जो नामि रते सेई महलु पाइनि मति परवाणु सचु साई ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि मेरै मनि सतिगुरि प्रीति लगाई राम ॥
हरि हरि हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई राम ॥
हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई सभि दूख विसारणहारा ॥
वडभागी गुर दरसनु पाइआ धनु धनु सतिगुरू हमारा ॥
ऊठत बैठत सतिगुरु सेवह जितु सेविऐ सांति पाई ॥
मेरै मनि मेरै मनि सतिगुर प्रीति लगाई ॥1॥
हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे राम ॥
हरि नामो हरि नामु द्रिड़ाए जपि हरि हरि नामु विगसे राम ॥
जपि हरि हरि नामु कमल परगासे हरि नामु नवं निधि पाई ॥
हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा हरि सहजि समाधि लगाई ॥
हरि नामु वडाई सतिगुर ते पाई सुखु सतिगुर देव मनु परसे ॥
हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे ॥2॥
कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा राम ॥
हउ मनु तनु हउ मनु तनु देवा तिसु काटि सरीरा राम ॥
हउ मनु तनु काटि काटि तिसु देई जो सतिगुर बचन सुणाए ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ बैरागी मिलि गुर दरसनि सुखु पाए ॥
हरि हरि क्रिपा करहु सुखदाते देहु सतिगुर चरन हम धूरा ॥
कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा ॥3॥
गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई राम ॥
हरि दानो हरि दानु देवै हरि पुरखु निरंजनु सोई राम ॥
हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन का दुखु भरमु भउ भागा ॥
सेवक भाइ मिले वडभागी जिन गुर चरनी मनु लागा ॥
कहु नानक हरि आपि मिलाए मिलि सतिगुर पुरख सुखु होई ॥
गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई ॥4॥1॥
हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी राम ॥
जगजीवनु जगजीवनु दाता गुर मेलि समाणी राम ॥
सतिगुरु मेलि हरि नामि समाणी जपि हरि हरि नामु धिआइआ ॥
जिसु कारणि हंउ ढूंढि ढूढेदी सो सजणु हरि घरि पाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य को सतिगुरू वडिआई देता है वह अपने हृदय में ही प्रभू की हजूरी हासिल कर लेता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।