Lulla Family

अंग 56

अंग
56
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मुखि झूठै झूठु बोलणा किउ करि सूचा होइ ॥
बिनु अभ सबद न मांजीऐ साचे ते सचु होइ ॥1॥
मुंधे गुणहीणी सुखु केहि ॥
पिरु रलीआ रसि माणसी साचि सबदि सुखु नेहि ॥1॥ रहाउ ॥
पिरु परदेसी जे थीऐ धन वांढी झूरेइ ॥
जिउ जलि थोड़ै मछुली करण पलाव करेइ ॥
पिर भावै सुखु पाईऐ जा आपे नदरि करेइ ॥2॥
पिरु सालाही आपणा सखी सहेली नालि ॥
तनि सोहै मनु मोहिआ रती रंगि निहालि ॥
सबदि सवारी सोहणी पिरु रावे गुण नालि ॥3॥
कामणि कामि न आवई खोटी अवगणिआरि ॥
ना सुखु पेईऐ साहुरै झूठि जली वेकारि ॥
आवणु वंञणु डाखड़ो छोडी कंति विसारि ॥4॥
पिर की नारि सुहावणी मुती सो कितु सादि ॥
पिर कै कामि न आवई बोले फादिलु बादि ॥
दरि घरि ढोई ना लहै छूटी दूजै सादि ॥5॥
पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु ॥
अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु ॥
कथनी झूठी जगु भवै रहणी सबदु सु सारु ॥6॥
केते पंडित जोतकी बेदा करहि बीचारु ॥
वादि विरोधि सलाहणे वादे आवणु जाणु ॥
बिनु गुर करम न छुटसी कहि सुणि आखि वखाणु ॥7॥
सभि गुणवंती आखीअहि मै गुणु नाही कोइ ॥
हरि वरु नारि सुहावणी मै भावै प्रभु सोइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा ना वेछोड़ा होइ ॥8॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: झूठे मुंह से झूठ बोलने का ही स्वभाव बन जाता है। ऐसा जीव (किसी बाहरी स्वच्छता आदि कर्मां से अंदर) की स्वच्छता कभी भी नहीं हो सकता। गुरू के शबद जल के बिनां (मन) मांजा नहीं जा सकता, (तथा) यह सच (सिमरन) सदा स्थिर प्रभू से ही मिलता है।1। हे भोली जीव स्त्री ! जो (अपने अंदर, आत्मिक सुख देने वाले) गुणों से वंचित है उसको (बाहर से) किसी और तरीके से आत्मिक सुख नहीं मिल सकता। आत्मिक सुख उसको है जो सदा कायम रहने वाले प्रभू में (लीन रहती है)। जो गुरू के शबद में (जुड़ी हुई) है। जो प्रभू के प्यार में (मस्त) है। पति प्रभू के मिलाप के सुख का (वही जीव स्त्री) आनंद लेती है।1।रहाउ।उसके हृदय को छोड़ के) और और हृदय देश का निवासी है, तो पति से बिछुड़ी हुई वह जीव स्त्री झुरती (सतत् निराशा की ओर अग्रसर होती) रहती है (अंदर ही अंदर से चिंता से खाई जाती है)। जिस प्रकार थोड़े पानी में मछुली तड़फती है, उसी प्रकार वह भी प्रलाप करती है। आत्मिक सुख तभी मिलता है जब प्रभू पति को (जीव स्त्री) अच्छी लगे। जब वह खुद (उस पर) मेहर की नजर करे।2। (हे जीव स्त्री!) आप सखियों सहेलियों के साथ मिल के (भाव, साध-संगति में बैठ के) अपने पति प्रभू की सिफत सलाह कर। (जो जीव स्त्री सिफत सलाह करती है, उस के) हृदय में प्रभू प्रगट हो जाता है। उसका मन (प्रभू के प्रेम में) मोहा जाता है। वह प्रभू के प्रेम रंग में रंगी हुई उसका दर्शन करती है। गुरू के शबद (की बरकति) से उसका जीवन संवर जाता है। गुणों से वह सुंदर बन जाती है, और पति प्रभू उसको प्यार करता है।3। (गुरू से वंचित होने के कारण) जो जीव स्त्री (अंदर से) खोटी है और अवगुणों से भरी हुई है, उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है। ना इस लोक में ना ही परलोक में, कहीं भी उसको आत्मिक सुख नहीं मिलता। झूठ में विकारों में वह जल जाती है (उसका आत्मिक जीवन जल जाता है); (उसके वास्ते) जनम मरन का मुश्किल चक्कर बना रहता है। (क्योंकि) कंत प्रभू ने उसको भुला दिया होता है।4। पर वह प्रभू-पति की खूबसूरत नारी थी, वह किस स्वाद में (फंसने के कारण) छॅुटड़ हो गई? वह क्यों व्यर्थ फजूल बोल बोलती है जो पति प्रभू के साथ मिलाप के लिए काम नहीं दे सकता? वह जीव स्त्री (प्रभू को भुला के) माया के स्वाद में (फंसने के कारण) छुटॅड़ हो गई है, (तभी उसको) प्रभू के दर पर प्रभू के महल में (टिकने के लिए) आसरा नहीं मिलता (माया का मोह उसे भटकनों में डाले रखता है)।5। पंडित लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं (पर अंदर से गुणहीन होने के कारण उन पुस्तकों की) विचार नहीं समझते। औरों को ही उपदेश दे के (जगत से) चले जाते हैं (उनका ये सारा उद्यम) माया कमाने के लिए व्यापार ही बना रह जाता है। सारा जगत झूठी कथनी में ही भटकता रहता है (भाव, आम तौर पे जीवों के अंदर झूठ-फरेब है, और बाहर ज्ञान की बातें करते हैं)। प्रभु की सिफत सलाह का शब्द (हृदय में टिकाए रखना) ही श्रेष्ठ रहन सहन है।6। अनेकों ही पंडित ज्योतिषी (आदि) वेदों (के मंत्रों) को विचारते हैं, अपने आप में मतभेद होने के कारण (चर्चा करते हैं और दृढ़ता के कारण) वाह वाह कहलवाते हैं। पर, सिर्फ इस मतभेद में रह के ही उनका जन्म मरन बना रहता है। कोई भी मनुष्य (निरा अच्छा) व्याख्यान करके या सुन के (आत्मिक आनंद नहीं ले सकता, और जन्म मरन के चक्कर में से) मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हउमै, अहंकार छोड़ के गुरू के शरण पड़ने की जरूरत है। गुरू की बख्शिश के बगैर (माया के मोह से) मुक्ति नहीं होती।7। (जो जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति को प्यारी लगती हैं वही) सारे गुणों वाली कहलाती हैं। पर, मेरे अंदर ऐसा कोई गुण नहीं है (जिसकी बरकति से मैं प्रभू प्रेम को अपने दिल में बसा सकूँ)। अगर वह हरि पति प्रभू मुझे प्यारा लगने लग जाए, तो मैं भी उसकी सुंदर नारी बन जाऊँ। हे नानक ! गुरू के शबद में (जुड़ के जिसने प्रभू चाणों से) खूबसूरत मिलाप हासिल कर लिया है उसका उससे फिर विछोड़ा नहीं होता।8।5।
सिरीरागु महला 1 ॥
जपु तपु संजमु साधीऐ तीरथि कीचै वासु ॥
पुंन दान चंगिआईआ बिनु साचे किआ तासु ॥
जेहा राधे तेहा लुणै बिनु गुण जनमु विणासु ॥1॥
मुंधे गुण दासी सुखु होइ ॥
अवगण तिआगि समाईऐ गुरमति पूरा सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
विणु रासी वापारीआ तके कुंडा चारि ॥
मूलु न बुझै आपणा वसतु रही घर बारि ॥
विणु वखर दुखु अगला कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥2॥
लाहा अहिनिसि नउतना परखे रतनु वीचारि ॥
वसतु लहै घरि आपणै चलै कारजु सारि ॥
वणजारिआ सिउ वणजु करि गुरमुखि ब्रहमु बीचारि ॥3॥
संतां संगति पाईऐ जे मेले मेलणहारु ॥
मिलिआ होइ न विछुड़ै जिसु अंतरि जोति अपार ॥
सचै आसणि सचि रहै सचै प्रेम पिआर ॥4॥
जिनी आपु पछाणिआ घर महि महलु सुथाइ ॥
सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ अगर (किसी सिद्धि आदि वास्ते मंत्रों का) पाठ किया जाए, (धूणियां आदि तपा के) शरीर को कष्ट दिया जाए, इन्द्रियों को वस में करने का कोई साधन किया जाए, किसी तीर्थ पर निवास किया जाए, (अगर खलकत के भले के वास्ते) दान-पुंन्न आदि अच्छे काम किए जांए (पर परमात्मा का सिमरन ना किया जाए, तो) प्रभू सिमरन के बिना उपरोक्त सारे ही उद्यमों का कोई लाभ नहीं। मनुष्य जैसा बीज बीजता है, वैसा ही फल काटता है (यदि सिमरन नहीं किया तो आत्मिक गुण कहां से आ जाएं, तथा) आत्मिक गुणों के बिना जिंदगी व्यर्थ है।1। हे भोली जीव स्त्री ! (आत्मिक गुणों के बिनां आत्मिक सुख नहीं हो सकता, और परमात्मा के नाम के बिना गुण पैदा नहीं हो सकते) गुणों की खातर परमात्मा के गुणों की दासी बन, तभी आत्मिक सुख सुख होंगे। औगुणों को त्याग के ही प्रभू चरणों में लीन हो सकते हैं। गुरू की मति पे चल कर ही वह पूरा प्रभू मिलता है।1।रहाउ। सरमाये के बिना व्यापारी (नफे के लिए व्यर्थ ही) चारों तरफ ताकता है। जो मनुष्य (अपनी जिंदगी के) मूल प्रभू को नहीं समझता, उसका असल सरमाया उसके हृदय घर के अंदर ही (बे-पहिचान सा) पड़ा रहता है। नाशवंत पदार्थ की व्यापारिन (जीव स्त्री) झूठ में लग के (आत्मिक गुणों से) लूटी जा रही है। नाम धन से वंचित रह के उसे बहुत आत्मिक कलेश व्यापता है।2। जो मनुष्य सोच समझ के नाम रतन को परखता है (नाम की कीमत जानता व समझता है) उसको दिन रात (आत्मिक गुणों का नित्य) नया नफा होता रहता है। वह अपने दिल में ही अपना असल सरमाया ढूंढ लेता है, और अपनी जिंदगी का मनोरथ सिरे चढ़ा के यहां से जाता है, जो मनुष्य नाम के व्यापारी सत्संगियों के साथ मिल के नाम का व्यापार करता है, जो गुरू की शरण पड़ के परमात्मा (के गुणों) को अपने सोच मण्डल में लाता है ।3। (परमात्मा खुद ही आत्मिक गुणों का खजाना ढुंढवा सकता है) अगर उस खजाने के साथ मिलाप करवाने के स्मर्थ प्रभू खुद मिलाप करवा दे तो वह खजाना संतो की संगति में रह के मिल सकता है, और जिस मनुष्य के अंदर बेअंत प्रभू की ज्योति (एक बार जाग जाए) वह प्रभू चरणों में मिल के फिर नहीं बिछुड़ता। क्योंकि, वह अडोल (आत्मिक) आसन पर बैठ जाता है। वह सदा स्थिर प्रभू में लिव लगा लेता है। वह अपना प्रेम प्यार सदा स्थिर प्रभू में लगा लेता है।4। (गुरू की मति पर चल के) जिन्होंने अपने आप को पहिचान लिया है, उनको अपने हृदय-रूप सुंदर स्थान में ही परमात्मा का निवास स्थान मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभू के प्यार रंग में रंगे रहने के कारण उन्हे वह सदा कायम रहने वाला प्रभू मिल जाता है।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “झूठे मुंह से झूठ बोलने का ही स्वभाव बन जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।