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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 568 · वडहंस

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अंग
568
वडहंस
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  1. पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥
  2. गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥

गुरु अमर दास जी · छंत · राग वडहंस

पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥

अंग 567 से चला आ रहा अंश

पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥
धन बाली भोली पिरु सहजि रावै मिलिआ करम बिधाता ॥
जिनि हरि रसु चाखिआ सबदि सुभाखिआ हरि सरि रही भरपूरे ॥
नानक कामणि सा पिर भावै सबदे रहै हदूरे ॥2॥
सोहागणी जाइ पूछहु मुईए जिनी विचहु आपु गवाइआ ॥
पिर का हुकमु न पाइओ मुईए जिनी विचहु आपु न गवाइआ ॥
जिनी आपु गवाइआ तिनी पिरु पाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥
सदा रंगि राती सहजे माती अनदिनु नामु वखाणै ॥
कामणि वडभागी अंतरि लिव लागी हरि का प्रेमु सुभाइआ ॥
नानक कामणि सहजे राती जिनि सचु सीगारु बणाइआ ॥3॥
हउमै मारि मुईए तू चलु गुर कै भाए ॥
हरि वरु रावहि सदा मुईए निज घरि वासा पाए ॥
निज घरि वासा पाए सबदु वजाए सदा सुहागणि नारी ॥
पिरु रलीआला जोबनु बाला अनदिनु कंति सवारी ॥
हरि वरु सोहागो मसतकि भागो सचै सबदि सुहाए ॥
नानक कामणि हरि रंगि राती जा चलै सतिगुर भाए ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: वह प्रभू ही हरेक युग में (जीता-जागता) प्रसिद्ध है। जो जीव स्त्री बाल स्वभाव हो के भोले स्वभाव वाली बन के आत्मिक अडोलता में टिक के उस प्रभू पति को याद करती रहती है। उसे वह सृजनहार मिल जाता है। हे जीवात्मा ! जिस जीव-स्त्री ने हरी-नाम का स्वाद चख लिया है। जिसने गुरू के शबद के माध्यम से उस प्रभू की सिफत सालाह करनी शुरू कर दी। वह उस सरोवर-प्रभू में हर समय डुबकी लगाए रखती है। हे नानक ! (कहें) वही जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी लगती है जो गुरू के शबद द्वारा हर वक्त उसके चरणों में जुड़ी रहती है। 2। हे आत्मिक मौत सह रही जीवात्मा ! जा के (उन) सुहागनों से (जीवन-जुगति) पूछें। जिन्होंने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लिया है। पर जिन्होंने अपने अंदर से स्वै भाव दूर नहीं किया उन्होंने प्रभू की रजा (में चलने की जाच) नहीं सीखी। जिन्होंने स्वै भाव दूर कर लिया। उन्होंने (अपने अंदर ही) प्रभू-पति को पा लिया। प्रभू-पति प्रेम से उन्हें अपने मिलाप के आनंद में रखता है। जो जीव-स्त्री सदा प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। वह हर समय प्रभू-पति का नाम सिमरती रहती है। वह जीव-स्त्री बहुत भाग्यशाली है। उसके हृदय में प्रभू-चरणों की लगन बनी रहती है। उसको प्रभू का प्यार अच्छा लगता है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने सदा-स्थिर प्रभू के नाम को अपनी जिंदगी का श्रृंगार बना लिया है वह सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहती है। 3। हे आत्मिक मौत सह रही जीव स्त्री ! आप (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करें। और गुरू के अनुसार चलें (जीवन चलाएँ)। (अगर आप गुरू के मुताबिक चलेंगी। तो) प्रभू की हजूरी में निवास हासिल करके आप सदा के लिए प्रभू-पति के मिलाप का आनंद लेती रहेंगी। हे जीवात्मा ! जो जीव-स्त्री अपने दिल में गुरू शबद बसा लेती है। वह प्रभू की हजूरी में जगह प्राप्त कर लेती है। वह सदा के लिए भाग्यशाली हो जाती है (उसे समझ आ जाती है कि) प्रभू-पति ही आनंद का स्रोत है। प्रभू-पति का यौवन सदा कायम रहने वाला है। उस जीव-स्त्री को प्रभू-कंत ने सदा के लिए सुंदर जीवन वाली बना दिया। उसको प्रभू-पति सोहाग मिल जाता है। उसके माथे पर भाग्य जाग जाते हैं। गुरू के शबद के माध्यम से वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो के सोहाने आत्मिक जीवन वाली बन जाती है। हे नानक ! जब जीव स्त्री गुरू के अनुसार चलती है। तब वह प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी जाती है। 4।

गुरु अमर दास जी · छंत · राग वडहंस

गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥

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वडहंसु महला 3 ॥
गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥
अनदिनु नामु वखाणीऐ लाहा हरि रसु पीजै राम ॥
लाहा हरि रसु लीजै हरि रावीजै अनदिनु नामु वखाणै ॥
गुण संग्रहि अवगण विकणहि आपै आपु पछाणै ॥
गुरमति पाई वडी वडिआई सचै सबदि रसु पीजै ॥
नानक हरि की भगति निराली गुरमुखि विरलै कीजै ॥1॥
गुरमुखि खेती हरि अंतरि बीजीऐ हरि लीजै सरीरि जमाए राम ॥
आपणे घर अंदरि रसु भुंचु तू लाहा लै परथाए राम ॥
लाहा परथाए हरि मंनि वसाए धनु खेती वापारा ॥
हरि नामु धिआए मंनि वसाए बूझै गुर बीचारा ॥
मनमुख खेती वणजु करि थाके त्रिसना भुख न जाए ॥
नानक नामु बीजि मन अंदरि सचै सबदि सुभाए ॥2॥
हरि वापारि से जन लागे जिना मसतकि मणी वडभागो राम ॥
गुरमती मनु निज घरि वसिआ सचै सबदि बैरागो राम ॥
मुखि मसतकि भागो सचि बैरागो साचि रते वीचारी ॥
नाम बिना सभु जगु बउराना सबदे हउमै मारी ॥
साचै सबदि लागि मति उपजै गुरमुखि नामु सोहागो ॥

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! अगर गुरू के माध्यम से आत्मिक अडोलता में टिक के (हरी-नाम का) व्यापार किया जाए। तो ये सारा व्यापार मनुष्य के लिए फलदायक होता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम हर वक्त उचारना चाहिए। प्रभू के नाम का रस पीना चाहिए- यही है मानस जन्म की कमाई। हरी-नाम का स्वाद लेना चाहिए। हरी नाम हृदय में बसाना चाहिए- यही मानस जन्म का लाभ है। जो मनुष्य हर वक्त प्रभू का नाम उचारता है। वह (अपने अंदर आत्मिक) गुण एकत्र करके अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है। (इस तरह उसके सारे) अवगुण दूर हो जाते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की शिक्षा हासिल कर ली। उसे बड़ा आदर मिला। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के हरी-नाम-रस पीना चाहिए। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति एक आश्चर्यजनक दाति है (कृपा है)।पर किसी दुर्लभ मनुष्य ने ही गुरू की शरण पड़ कर ही भगती की है। 1। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रह के हरी-नाम की खेती अपने मन में बीजनी चाहिए। हरी-नाम बीज अपने हृदय में उगाना चाहिए। हे भाई ! आप अपने हृदय में हरी-नाम का स्वाद चखा करें। और, इस तरह परलोक का लाभ कमाएँ। जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने मन में बसाता है वह परलोक का लाभ (भी) कमा लेता है। उसकी नाम-खेती उसका नाम-व्यापार सराहनीय है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। जो हरी-नाम अपने मन में बसाता है वह गुरू शबद की विचार की बरकति से (आत्मिक जीवन को) समझ लेता है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य निरी संसारिक खेती निरा दुनियावी व्यापार करके थक जाते हैं। उनकी माया की तृष्णा नहीं मिटती। माया की भूख दूर नहीं होती। हे नानक ! (कहें, हे भाई !) आप प्रेम से सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के अपने मन में परमात्मा का नाम-बीज बीजा करें। 2। हे भाई ! हरी-नाम सिमरन के व्यापार में वही मनुष्य लगते हैं जिनके माथे पर अहो भाग्य की मणि चमक पड़ती है। गुरू की मति की बरकति से उनका मन प्रभू की हजूरी में टिक जाता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद के द्वारा उनको हरी नाम की लगन लग जाती है। जिन मनुष्यों के मुंह पर माथे पर भाग्य जाग जाते हैं। सदा स्थिर हरी में उनकी लगन लग जाती है। सदा-स्थिर प्रभू (के प्रेम-रंग) में रंगे हुए वे विचारवान बन जाते हैं। पर। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना सारा जगत (अहंकार में) बावरा हुआ फिरता है (ये) अहंकार गुरू के शबद के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के (मनुष्य के अंदर उच्च) बुद्धि का प्रकाश हो जाता है। गुरू की शरण पड़ने से हरी-नाम का सोहाग प्राप्त हो जाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 568 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।