अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठते हैं।उसको गुरू शबद के द्वारा डर नाश करने वाला परमात्मा मिल जाता है।वह मनुष्य सदा हरी-नाम को हृदय में बसाए रखता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की रजा को अपनी खेती बनाया है अपना व्यापार बनाया है।वह प्रभू की रजा में रह के।रजा को मन में बसा के (लोक-परलोक में) आदर हासिल करता है। हे भाई ! गुरू की मति पर चलने से ही परमात्मा की रजा को समझा जा सकता है।रजा में चलने से ही प्रभू-चरणों में मिलाप होता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू का शबद प्रभू की रजा में जोड़ता है आत्मिक अडोलता में लीन करता है वह अपार प्रभू को मिल जाता है। वह मनुष्य गुरू के माध्यम से सदा टिकी रहने वाला सम्मान प्राप्त कर लेता है।गुरू के माध्यम से ही सदा-स्थिर प्रभू को।सुंदर जीवन बनाने वाले प्रभू को मिल जाता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर स्वै भाव दूर कर लेता है वह हरेक डर को नाश करने वाले प्रभू से मिल लेता है।वह प्रभू-चरणों में लीन हो जाता है। हे नानक ! आप भी उस प्रभू का नाम सिमर जो माया के प्रभाव से रहित है जो अपहुँच है (मनुष्य की बुद्धि के पहुँच से परे है) जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती।और जो अपनी रजा अनुसार हर जगह व्यापक है। 4। 2।
वडहंसु महला 3 ॥ मन मेरिआ तू सदा सचु समालि जीउ ॥ आपणै घरि तू सुखि वसहि पोहि न सकै जमकालु जीउ ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचै सबदि लिव लाए ॥ सदा सचि रता मनु निरमलु आवणु जाणु रहाए ॥ दूजै भाइ भरमि विगुती मनमुखि मोही जमकालि ॥ कहै नानकु सुणि मन मेरे तू सदा सचु समालि ॥1॥ मन मेरिआ अंतरि तेरै निधानु है बाहरि वसतु न भालि ॥ जो भावै सो भुंचि तू गुरमुखि नदरि निहालि ॥ गुरमुखि नदरि निहालि मन मेरे अंतरि हरि नामु सखाई ॥ मनमुख अंधुले गिआन विहूणे दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु नावै को छूटै नाही सभ बाधी जमकालि ॥ नानक अंतरि तेरै निधानु है तू बाहरि वसतु न भालि ॥2॥ मन मेरिआ जनमु पदारथु पाइ कै इकि सचि लगे वापारा ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा अंतरि सबदु अपारा ॥ अंतरि सबदु अपारा हरि नामु पिआरा नामे नउ निधि पाई ॥ मनमुख माइआ मोह विआपे दूखि संतापे दूजै पति गवाई ॥ हउमै मारि सचि सबदि समाणे सचि रते अधिकाई ॥ नानक माणस जनमु दुलंभु है सतिगुरि बूझ बुझाई ॥3॥ मन मेरे सतिगुरु सेवनि आपणा से जन वडभागी राम ॥ जो मनु मारहि आपणा से पुरख बैरागी राम ॥ से जन बैरागी सचि लिव लागी आपणा आपु पछाणिआ ॥ मति निहचल अति गूड़ी गुरमुखि सहजे नामु वखाणिआ ॥ इक कामणि हितकारी माइआ मोहि पिआरी मनमुख सोइ रहे अभागे ॥ नानक सहजे सेवहि गुरु अपणा से पूरे वडभागे ॥4॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे मेरे मन ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा को आप सदा अपने अंदर बसाए रख। (इसकी बरकति से) आप अपनी अंतरात्मा में आनंद से टिका रहेगा।आत्मिक मौत आपके आगे अपना जोर नहीं डाल सकेगी। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू में।गुरू के शबद में।सुरति जोड़े रखता है।मौत (आत्मिक मौत) उसकी ओर देख भी नहीं सकती। उसका मन सदा-स्थिर प्रभू के रंग में सदा रंगा रह के पवित्र हो जाता है।उस मनुष्य के जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। पर। अपने मन के पीछे चलने वाली दुनिया माया के प्यार में माया की भटकना में दुखी होती रहती है।आत्मिक मौत ने उसे अपने मोह में फसा के रखा होता है। (इस वास्ते) नानक कहता है, हे मेरे मन ! (मेरी बात) सुन।आप सदा स्थिर प्रभू को सदा अपने अंदर बसाए रख। 1। हे मेरे मन ! (सारे सुखों का) खजाना (परमात्मा) आपके अंदर बस रहा है।आप इस पदार्थ को बाहर (जंगल आदि में) ना ढूँढता फिर। हे मन ! परमात्मा की रजा को अपनी खुराक बना।और गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदों की निगाह की तरफ देख। हे मेरे मन ! गुरमुखों वाली नजर से देख।आपके अंदर ही आपको हरी-नाम-मित्र (मिल जाएगा)। आत्मिक जीवन की समझ से वंचित।माया के मोह में अंधे हुए।अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों को माया के मोह के कारण परेशानियां ही होतीं हैं। हे नानक ! (कह) आत्मिक मौत ने सारी दुनिया को (अपने जाल में) बांध रखा है।परमात्मा के नाम के बिना कोई जीव (इस जाल में से) खलासी हासिल नहीं कर सकता। (हे मन !) आपके अंदर ही नाम-खजाना मौजूद है।आप इस खजाने को बाहर (जंगल आदि में) ना ढूँढता फिर। 2। हे मेरे मन ! कई (भाग्यशाली ऐसे) हैं जो इस कीमती मानस जन्म को हासिल करके सदा-स्थिर परमात्मा के सिमरन के व्यापार में लग जाते हैं। वे अपने गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं।और।बेअंत प्रभू की सिफत सालाह का शबद अपने हृदय में बसाते हैं। वह मनुष्य बेअंत हरी की सिफत सालाह की बाणी अपने अंदर बसाते हैं।परमात्मा का नाम उनको प्यारा लगता है।प्रभू के नाम में ही उन्होंने (जैसे।दुनिया के) नौ खजाने प्राप्त कर लिए होते हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया के मोह में फसे रहते हैं।दुख में (ग्रसे हुए) व्याकुल हुए रहते हैं।माया के मोह में फंस के उन्होंने अपनी इज्जत गवा ली होती है। वे मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके सदा स्थिर हरी की सिफत-सालाह के शबद में लीन रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों को सतिगुरू ने ये समझ बख्श दी होती है कि मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है।वे मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के प्रेम-रंग में) खूब रंगे रहते हैं। 3। हे मेरे मन ! वे मनुष्य अति भाग्यशाली होते हैं जो अपने गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं। जो अपने मन को वश में रखते हैं।वे मनुष्य (दुनियावी कार्य-व्यवहार करते हुए भी माया की ओर से) निर्मोह रहते हैं। वे मनुष्य दुनिया की ओर से विरक्त रहते हैं।सदा स्थिर प्रभू में उनकी सुरति जुड़ी रहती है।अपने आत्मिक जीवन को वह (सदा) पड़तालते रहते हैं (आत्म चिंतन करते रहते हैं)। गुरू की शरण पड़ कर उनकी मति (माया से) अडोल रहती है।प्रेम रंग में गूढ़ी रंगी रहती है।आत्मिक अडोलता में टिक के वे परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं।(पर। हे मन !) कई ऐसे बद्-नसीब होते हैं जो (काम के वश हो के) स्त्री से (ही) हित करते हैं जो माया के मोह में ही मगन रहते हैं जो अपने मन के पीछे चलते हुए (गफ़लत की नींद में) सोए रहते हैं। हे नानक ! (कह) वे मनुष्य अति भाग्यशाली होते हैं जो आत्मिक अडोलता में टिक के अपने गुरू की बताई हुई सेवा करते रहते हैं। 4। 3।
वडहंसु महला 3 ॥ रतन पदारथ वणजीअहि सतिगुरि दीआ बुझाई राम ॥ लाहा लाभु हरि भगति है गुण महि गुणी समाई राम ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श दी (उसके हृदय-नगर में सदा परमात्मा की सिफत सालाह के) कीमती रत्नों का व्यापार होता रहता है। उसको परमात्मा की भक्ति की कमाई प्राप्त होती रहती है।परमात्मा की सिफत सालाह में जुड़ के उसकी लीनता गुणों के मालिक प्रभू में हो जाती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।