मै अवगण भरपूरि सरीरे ॥
हउ किउ करि मिला अपणे प्रीतम पूरे ॥2॥
जिनि गुणवंती मेरा प्रीतमु पाइआ ॥
से मै गुण नाही हउ किउ मिला मेरी माइआ ॥3॥
हउ करि करि थाका उपाव बहुतेरे ॥
नानक गरीब राखहु हरि मेरे ॥4॥1॥
मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥
हउ हरि प्रभ छोडि दूजै लोभाणी ॥1॥
हउ किउ करि पिर कउ मिलउ इआणी ॥
जो पिर भावै सा सोहागणि साई पिर कउ मिलै सिआणी ॥1॥ रहाउ ॥
मै विचि दोस हउ किउ करि पिरु पावा ॥
तेरे अनेक पिआरे हउ पिर चिति न आवा ॥2॥
जिनि पिरु राविआ सा भली सुहागणि ॥
से मै गुण नाही हउ किआ करी दुहागणि ॥3॥
नित सुहागणि सदा पिरु रावै ॥
मै करमहीण कब ही गलि लावै ॥4॥
तू पिरु गुणवंता हउ अउगुणिआरा ॥
मै निरगुण बखसि नानकु वेचारा ॥5॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥
हउ जाइ पुछा अपने सतगुरै गुर पुछि मनु मुगधु समझावा ॥
भूला मनु समझै गुर सबदी हरि हरि सदा धिआए ॥
नानक जिसु नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि चरणी चितु लाए ॥1॥
हउ सभि वेस करी पिर कारणि जे हरि प्रभ साचे भावा ॥
सो पिरु पिआरा मै नदरि न देखै हउ किउ करि धीरजु पावा ॥
जिसु कारणि हउ सीगारु सीगारी सो पिरु रता मेरा अवरा ॥
नानक धनु धंनु धंनु सोहागणि जिनि पिरु राविअड़ा सचु सवरा ॥2॥
हउ जाइ पुछा सोहाग सुहागणि तुसी किउ पिरु पाइअड़ा प्रभु मेरा ॥
मै ऊपरि नदरि करी पिरि साचै मै छोडिअड़ा मेरा तेरा ॥
सभु मनु तनु जीउ करहु हरि प्रभ का इतु मारगि भैणे मिलीऐ ॥
आपनड़ा प्रभु नदरि करि देखै नानक जोति जोती रलीऐ ॥3॥
जो हरि प्रभ का मै देइ सनेहा तिसु मनु तनु अपणा देवा ॥
नित पखा फेरी सेव कमावा तिसु आगै पाणी ढोवां ॥
नित नित सेव करी हरि जन की जो हरि हरि कथा सुणाए ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पूरा गुरू ही (मुझे) मेरे प्रीतम (प्रभू से) मिला सकता है (इस वास्ते) मैं अपने गुरू से कुर्बान जाऊँगा।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।