इस पृष्ठ पर
अंग
560
वडहंस
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश
गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥
गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥
सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥
गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥
गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥2॥
गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥
गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥3॥
गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥
गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥4॥6॥
सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥
गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥
गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥2॥
गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥
गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥3॥
गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥
गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥4॥6॥
हिन्दी अर्थ: हे मन ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सदा याद करता रह। ये नाम ही आपके साथ जाने वाला है साथ निभाने वाला है।रहाउ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर वह सदा स्थिर हरी का नाम-सिमरन ऊँची जाति व ऊँची कुल (का मूल) है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर परमात्मा आ बसता है। और उसका (सदा का) साथी बन जाता है। 2। पर वही मनुष्य गुरू के सन्मुख हो सकता है जिसको परमात्मा स्वयं (इस लायक) बनाता है। वह परमात्मा खुद मनुष्य को गुरू के सन्मुख करके सम्मान बख्शता है। 3। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी (हृदय में) संभाल। यही करने योग्य काम है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपने परिवार के वास्ते भी आसरा देने के काबिल हो जाता है। 4। 6।
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥
वडहंसु महला 3 ॥
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥
मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥1॥
सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥
आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥
मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥2॥
देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥
नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥3॥
नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥
गुर की बाणी सहज बैरागु ॥4॥7॥
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥
मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥1॥
सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥
आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥
मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥2॥
देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥
नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥3॥
नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥
गुर की बाणी सहज बैरागु ॥4॥7॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य की) जीभ परमात्मा के नाम के स्वाद में लगती है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। प्रभू-प्रेम में जुड़ जाता है। परमात्मा का नाम सिमर के उसका मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। 1। जिसके सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह में जुड़ने से विचारवान हो जाते हैं। और सदैव आत्मिक आनंद मिला रहता है। मैं अपने गुरू से सदा कुर्बान जाता हूँ।1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण की बरकति से) एक परमात्मा में सुरति जोड़ के मनुष्य की आँखें (पराए रूप से) तृप्त हो जाती हैं। (अंदर से) माया का प्यार दूर करके मनुष्य का मन (तृष्णा की ओर से) संतुष्ट हो जाता है। 2। (हे भाई ! गुरू के) शबद की बरकति से परमात्मा के नाम में जुड़ने से शरीर में आनंद पैदा होता है। (गुरू की मेहर से) आत्मिक जीवन की सुगंधि देने वाला हरी-नाम मनुष्य के हृदय में सदा टिका रहता है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर उच्च भाग्य जागते हैं वह मनुष्य गुरू की बाणी में जुड़ता है (जिसकी बरकति से उसके अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा करने वाला वैराग उपजता है। 4। 7।
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
वडहंसु महला 3 ॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
सचै सबदि सचि समाइ ॥1॥
ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥
आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥
निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥2॥
भरमे भूला फिरै संसारु ॥
मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥3॥
नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥
गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥4॥8॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
सचै सबदि सचि समाइ ॥1॥
ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥
आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥
निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥2॥
भरमे भूला फिरै संसारु ॥
मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥3॥
नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥
गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥4॥8॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! पूरे गुरू से (ही) परमात्मा का नाम (-खजाना) मिल सकता है। (जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुरू शबद में जुड़ता है। वह) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हो जाता है। 1। हे मेरे मन !गुरू से) नाम-खजाना हासिल कर। (और।) आप अपने गुरू के हुकम में चल। 1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य) गुरू के शबद में (जुड़ता है। वह अपने) अंदर से (विकारों की) मैल दूर कर लेता है। परमात्मा का पवित्र नाम (उसके) मन में आ बसता है। 2। (हे भाई ! गुरू से टूट के) जगत भटकना के कारण (जीवन के सही रास्ते से) भूला फिरता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। यम-राज इसको सदा दुखी करता है। 3। हे नानक !वे भाग्यशाली हो गए परमात्मा का नाम सिमरना शुरू किया। जिन मनुष्यों ने गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम अपने मन में बसाया। 4। 8।
हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥
वडहंसु महला 3 ॥
हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥
हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥1॥
हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥
हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ ॥
हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥
हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥2॥
हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥
हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥3॥
नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥
सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥4॥9॥12॥
हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥
हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥1॥
हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥
हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ ॥
हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥
हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥2॥
हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥
हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥3॥
नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥
सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥4॥9॥12॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! अहंकार का परमात्मा के नाम के साथ वैर है। ये दोनों इकट्ठे (हृदय में) नहीं रह सकते। अहंकार में रह कर परमात्मा की सेवा-भक्ति नहीं हो सकती (जब मनुष्य) अहंकार में रह के भक्ति करता है तब (उसका) मन खाली हो जाता है। 1। हे मेरे मन ! आप (अपने अंदर) गुरू का शबद बसाने की कमाई करें और परमात्मा का नाम सिमरते रहें। अगर आप (गुरू का) हुकम मानेंगे। तो आपको परमात्मा मिल जाएगा। तो आपके अंदर से अहंकार दूर हो जाएगा। 1।रहाउ। हे भाई ! शरीर (धारने का ये) सारा (सिलसिला) अहंकार के कारण ही है। अहंकार के कारण जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। (मनुष्य के आत्मिक जीवन के रास्ते में) अहंकार बहुत बड़ा घोर अंधकार है। अहंकार (के घुप अंधेरे में) कोई मानव (आत्मिक जीवन का रास्ता) समझ नहीं सकता। 2। हे भाई ! अहंकार (के घोर अंधेरे) में परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। परमात्मा की रजा समझी नहीं जा सकती। अहंकार (के घोर अंधकार में) जीवात्मा के वास्ते (आत्मिक जीवन के राह में) रुकावटें बनी रहती हैं। (और इसी कारण) परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ के नहीं बस सकता। 3। (पर) हे नानक ! अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। तब सदा स्थिर प्रभू आदमी के मन में आ बसता है। तब आदमी सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। सदा-स्थिर हरी-नाम में टिका रहता है। सेवा-भगती कर के सदा-स्थिर हरी में लीन हो जाता है। 4। 9।
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥
वडहंसु महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥
गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥1॥
मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥
गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥1॥
मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे माँ ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का हृदय) एक (ऐसी) सेज है (जिस पर) ठाकुर प्रभू ही (सदा बसता है)। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुखों के समुंद्र हरी को (सदा) अपने हृदय में बसाए रखता है। 1। (हे मेरी माँ !) मेरे मन में प्रभू से मिलने के लिए कसक है आस है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 560 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।