अंग
55
राग Siree Raag
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੀਐ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਗੁਰ ਵਾਕਿ ॥
ਤਿਤੁ ਤਨਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਗਈ ਸਚ ਘਰਿ ਜਿਸੁ ਓਤਾਕੁ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਸਾਕੁ ॥੫॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸੇ ਸੁਖੀਏ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ॥
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਾਰਿ ਕੈ ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਲਾਹਾ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਿ ॥੬॥
ਸਾਚਉ ਵਖਰੁ ਲਾਦੀਐ ਲਾਭੁ ਸਦਾ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਬੈਸਈ ਭਗਤਿ ਸਚੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਪਤਿ ਸਿਉ ਲੇਖਾ ਨਿਬੜੈ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿ ॥੭॥
ਊਚਾ ਊਚਉ ਆਖੀਐ ਕਹਉ ਨ ਦੇਖਿਆ ਜਾਇ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਏਕੁ ਤੂੰ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਦਿਖਾਇ ॥
ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਣੀਐ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੮॥੩॥
ਤਿਤੁ ਤਨਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਗਈ ਸਚ ਘਰਿ ਜਿਸੁ ਓਤਾਕੁ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਸਾਕੁ ॥੫॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸੇ ਸੁਖੀਏ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ॥
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਾਰਿ ਕੈ ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਜਗ ਮਹਿ ਲਾਹਾ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਿ ॥੬॥
ਸਾਚਉ ਵਖਰੁ ਲਾਦੀਐ ਲਾਭੁ ਸਦਾ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਬੈਸਈ ਭਗਤਿ ਸਚੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਪਤਿ ਸਿਉ ਲੇਖਾ ਨਿਬੜੈ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿ ॥੭॥
ਊਚਾ ਊਚਉ ਆਖੀਐ ਕਹਉ ਨ ਦੇਖਿਆ ਜਾਇ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਏਕੁ ਤੂੰ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਦਿਖਾਇ ॥
ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਣੀਐ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੮॥੩॥
हरि जीउ सबदि पछाणीऐ साचि रते गुर वाकि ॥
तितु तनि मैलु न लगई सच घरि जिसु ओताकु ॥
नदरि करे सचु पाईऐ बिनु नावै किआ साकु ॥५॥
जिनी सचु पछाणिआ से सुखीए जुग चारि ॥
हउमै त्रिसना मारि कै सचु रखिआ उर धारि ॥
जग महि लाहा एकु नामु पाईऐ गुर वीचारि ॥६॥
साचउ वखरु लादीऐ लाभु सदा सचु रासि ॥
साची दरगह बैसई भगति सची अरदासि ॥
पति सिउ लेखा निबड़ै राम नामु परगासि ॥७॥
ऊचा ऊचउ आखीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥
जह देखा तह एकु तूं सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
जोति निरंतरि जाणीऐ नानक सहजि सुभाइ ॥८॥३॥
तितु तनि मैलु न लगई सच घरि जिसु ओताकु ॥
नदरि करे सचु पाईऐ बिनु नावै किआ साकु ॥५॥
जिनी सचु पछाणिआ से सुखीए जुग चारि ॥
हउमै त्रिसना मारि कै सचु रखिआ उर धारि ॥
जग महि लाहा एकु नामु पाईऐ गुर वीचारि ॥६॥
साचउ वखरु लादीऐ लाभु सदा सचु रासि ॥
साची दरगह बैसई भगति सची अरदासि ॥
पति सिउ लेखा निबड़ै राम नामु परगासि ॥७॥
ऊचा ऊचउ आखीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥
जह देखा तह एकु तूं सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
जोति निरंतरि जाणीऐ नानक सहजि सुभाइ ॥८॥३॥
हिन्दी अर्थ: सदा कायम रहने वाले प्रभू (के नाम) में रंगे हुए गुरू के वाक्य द्वारा~शब्द के द्वारा परमात्मा के साथ जान-पहिचान पड़ सकती है। (गुरू के द्वारा) जिस मनुष्य की बैठक सदा स्थिर प्रभू के घर में (चरणों में) हो जाती है~ उस के शरीर में (माया की) मैल नहीं लगती। वह सदा स्थिर प्रभू जिस पर मेहर की निगाह करता है~ उसीको उसकी प्राप्ति होती है। उसका नाम सिमरने के बिना उस से संबंध नहीं बन सकता।5। जिन लोगों ने सदा स्थिर प्रभू के साथ सांझ डाल ली है~ वह सदा ही आत्मिक आनंद में रहते हैं। वह अपने अहम् और (माया वाली) तृष्णा मार के सदा स्थिर प्रभू (के नाम) को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। जगत में (आने का) परमात्मा का एक नाम ही लाभ है (जो मनुष्य को कमाना चाहिए~ और यह नाम) गुरू की बताई हुई शिक्षा से ही मिल सकता है।6। (हे व्यापारी जीव!) सदा स्थिर रहने वाली (नाम की) राशि-पूँजी ही जोड़नी चाहिए~ (इसमें वह) नफा (पड़ता है जो) सदा (कायम रहता है)। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की भक्ति करता है~ (उसके आगे) अरदास करता है~ वह उसकी सदा स्थिर हजूरी में बैठता है। उसका (जीवन सफर का) लेखा (बा-इज्जत) साफ हो जाता है (क्योंकि~ उसके अंदर) प्रभू का नाम उजागर हो जाता है।7। परमात्मा सबसे ऊँचा है~ परमात्मा सबसे ऊूंचा है, (हर ओर से) यही कहा जाता है~ मैं (भी) कहता हूं (कि परमात्मा सबसे ऊूंचा है~ पर निरा कहने से) उसका दर्शन नहीं किया जा सकता। जब सत्गुरू ने मुझे~ (हे प्रभू! तेरा) दर्शन करा दिया~ तो अब मैं जिधर देखता हूँ~ तू ही तू दिखाई देता है। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ के) आत्मिक अडोलता वाली अवस्था में टिक के प्रेम में जुड़ के ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की ज्योति एक-रस हर जगह मौजूद है।8।3।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਛੁਲੀ ਜਾਲੁ ਨ ਜਾਣਿਆ ਸਰੁ ਖਾਰਾ ਅਸਗਾਹੁ ॥
ਅਤਿ ਸਿਆਣੀ ਸੋਹਣੀ ਕਿਉ ਕੀਤੋ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਕੀਤੇ ਕਾਰਣਿ ਪਾਕੜੀ ਕਾਲੁ ਨ ਟਲੈ ਸਿਰਾਹੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਇਉ ਸਿਰਿ ਜਾਣਹੁ ਕਾਲੁ ॥
ਜਿਉ ਮਛੀ ਤਿਉ ਮਾਣਸਾ ਪਵੈ ਅਚਿੰਤਾ ਜਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਬਾਧੋ ਕਾਲ ਕੋ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਾਲੁ ਅਫਾਰੁ ॥
ਸਚਿ ਰਤੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਦੁਬਿਧਾ ਛੋਡਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ॥੨॥
ਸੀਚਾਨੇ ਜਿਉ ਪੰਖੀਆ ਜਾਲੀ ਬਧਿਕ ਹਾਥਿ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹੋਰਿ ਫਾਥੇ ਚੋਗੈ ਸਾਥਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਚੁਣਿ ਸੁਟੀਅਹਿ ਕੋਇ ਨ ਸੰਗੀ ਸਾਥਿ ॥੩॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਆਖੀਐ ਸਚੇ ਸਚਾ ਥਾਨੁ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚਾ ਮੰਨਿਆ ਤਿਨ ਮਨਿ ਸਚੁ ਧਿਆਨੁ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸੂਚੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨਾ ਗਿਆਨੁ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ਕਰਿ ਸਾਜਨੁ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਾਜਨਿ ਮਿਲਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਮਦੂਤ ਮੁਏ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਨਾਵੈ ਅੰਦਰਿ ਹਉ ਵਸਾਂ ਨਾਉ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੫॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਗੁਬਾਰੁ ਹੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਪਰਗਾਸੁ ਹੋਇ ਸਚਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਤਿਥੈ ਕਾਲੁ ਨ ਸੰਚਰੈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਇ ॥੬॥
ਤੂੰਹੈ ਸਾਜਨੁ ਤੂੰ ਸੁਜਾਣੁ ਤੂੰ ਆਪੇ ਮੇਲਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਤਿਥੈ ਕਾਲੁ ਨ ਅਪੜੈ ਜਿਥੈ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰੁ ॥੭॥
ਹੁਕਮੀ ਸਭੇ ਊਪਜਹਿ ਹੁਕਮੀ ਕਾਰ ਕਮਾਹਿ ॥
ਹੁਕਮੀ ਕਾਲੈ ਵਸਿ ਹੈ ਹੁਕਮੀ ਸਾਚਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥੀਐ ਇਨਾ ਜੰਤਾ ਵਸਿ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥੮॥੪॥
ਮਛੁਲੀ ਜਾਲੁ ਨ ਜਾਣਿਆ ਸਰੁ ਖਾਰਾ ਅਸਗਾਹੁ ॥
ਅਤਿ ਸਿਆਣੀ ਸੋਹਣੀ ਕਿਉ ਕੀਤੋ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਕੀਤੇ ਕਾਰਣਿ ਪਾਕੜੀ ਕਾਲੁ ਨ ਟਲੈ ਸਿਰਾਹੁ ॥੧॥
ਭਾਈ ਰੇ ਇਉ ਸਿਰਿ ਜਾਣਹੁ ਕਾਲੁ ॥
ਜਿਉ ਮਛੀ ਤਿਉ ਮਾਣਸਾ ਪਵੈ ਅਚਿੰਤਾ ਜਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਬਾਧੋ ਕਾਲ ਕੋ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕਾਲੁ ਅਫਾਰੁ ॥
ਸਚਿ ਰਤੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਦੁਬਿਧਾ ਛੋਡਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਹਉ ਤਿਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ॥੨॥
ਸੀਚਾਨੇ ਜਿਉ ਪੰਖੀਆ ਜਾਲੀ ਬਧਿਕ ਹਾਥਿ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਹੋਰਿ ਫਾਥੇ ਚੋਗੈ ਸਾਥਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਚੁਣਿ ਸੁਟੀਅਹਿ ਕੋਇ ਨ ਸੰਗੀ ਸਾਥਿ ॥੩॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਆਖੀਐ ਸਚੇ ਸਚਾ ਥਾਨੁ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚਾ ਮੰਨਿਆ ਤਿਨ ਮਨਿ ਸਚੁ ਧਿਆਨੁ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸੂਚੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨਾ ਗਿਆਨੁ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ਕਰਿ ਸਾਜਨੁ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਸਾਜਨਿ ਮਿਲਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਮਦੂਤ ਮੁਏ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਨਾਵੈ ਅੰਦਰਿ ਹਉ ਵਸਾਂ ਨਾਉ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੫॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਗੁਬਾਰੁ ਹੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਪਰਗਾਸੁ ਹੋਇ ਸਚਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਤਿਥੈ ਕਾਲੁ ਨ ਸੰਚਰੈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਇ ॥੬॥
ਤੂੰਹੈ ਸਾਜਨੁ ਤੂੰ ਸੁਜਾਣੁ ਤੂੰ ਆਪੇ ਮੇਲਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਤਿਥੈ ਕਾਲੁ ਨ ਅਪੜੈ ਜਿਥੈ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰੁ ॥੭॥
ਹੁਕਮੀ ਸਭੇ ਊਪਜਹਿ ਹੁਕਮੀ ਕਾਰ ਕਮਾਹਿ ॥
ਹੁਕਮੀ ਕਾਲੈ ਵਸਿ ਹੈ ਹੁਕਮੀ ਸਾਚਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥੀਐ ਇਨਾ ਜੰਤਾ ਵਸਿ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥੮॥੪॥
सिरीरागु महला १ ॥
मछुली जालु न जाणिआ सरु खारा असगाहु ॥
अति सिआणी सोहणी किउ कीतो वेसाहु ॥
कीते कारणि पाकड़ी कालु न टलै सिराहु ॥१॥
भाई रे इउ सिरि जाणहु कालु ॥
जिउ मछी तिउ माणसा पवै अचिंता जालु ॥१॥ रहाउ ॥
सभु जगु बाधो काल को बिनु गुर कालु अफारु ॥
सचि रते से उबरे दुबिधा छोडि विकार ॥
हउ तिन कै बलिहारणै दरि सचै सचिआर ॥२॥
सीचाने जिउ पंखीआ जाली बधिक हाथि ॥
गुरि राखे से उबरे होरि फाथे चोगै साथि ॥
बिनु नावै चुणि सुटीअहि कोइ न संगी साथि ॥३॥
सचो सचा आखीऐ सचे सचा थानु ॥
जिनी सचा मंनिआ तिन मनि सचु धिआनु ॥
मनि मुखि सूचे जाणीअहि गुरमुखि जिना गिआनु ॥४॥
सतिगुर अगै अरदासि करि साजनु देइ मिलाइ ॥
साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ ॥
नावै अंदरि हउ वसां नाउ वसै मनि आइ ॥५॥
बाझु गुरू गुबारु है बिनु सबदै बूझ न पाइ ॥
गुरमती परगासु होइ सचि रहै लिव लाइ ॥
तिथै कालु न संचरै जोती जोति समाइ ॥६॥
तूंहै साजनु तूं सुजाणु तूं आपे मेलणहारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥
तिथै कालु न अपड़ै जिथै गुर का सबदु अपारु ॥७॥
हुकमी सभे ऊपजहि हुकमी कार कमाहि ॥
हुकमी कालै वसि है हुकमी साचि समाहि ॥
नानक जो तिसु भावै सो थीऐ इना जंता वसि किछु नाहि ॥८॥४॥
मछुली जालु न जाणिआ सरु खारा असगाहु ॥
अति सिआणी सोहणी किउ कीतो वेसाहु ॥
कीते कारणि पाकड़ी कालु न टलै सिराहु ॥१॥
भाई रे इउ सिरि जाणहु कालु ॥
जिउ मछी तिउ माणसा पवै अचिंता जालु ॥१॥ रहाउ ॥
सभु जगु बाधो काल को बिनु गुर कालु अफारु ॥
सचि रते से उबरे दुबिधा छोडि विकार ॥
हउ तिन कै बलिहारणै दरि सचै सचिआर ॥२॥
सीचाने जिउ पंखीआ जाली बधिक हाथि ॥
गुरि राखे से उबरे होरि फाथे चोगै साथि ॥
बिनु नावै चुणि सुटीअहि कोइ न संगी साथि ॥३॥
सचो सचा आखीऐ सचे सचा थानु ॥
जिनी सचा मंनिआ तिन मनि सचु धिआनु ॥
मनि मुखि सूचे जाणीअहि गुरमुखि जिना गिआनु ॥४॥
सतिगुर अगै अरदासि करि साजनु देइ मिलाइ ॥
साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ ॥
नावै अंदरि हउ वसां नाउ वसै मनि आइ ॥५॥
बाझु गुरू गुबारु है बिनु सबदै बूझ न पाइ ॥
गुरमती परगासु होइ सचि रहै लिव लाइ ॥
तिथै कालु न संचरै जोती जोति समाइ ॥६॥
तूंहै साजनु तूं सुजाणु तूं आपे मेलणहारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥
तिथै कालु न अपड़ै जिथै गुर का सबदु अपारु ॥७॥
हुकमी सभे ऊपजहि हुकमी कार कमाहि ॥
हुकमी कालै वसि है हुकमी साचि समाहि ॥
नानक जो तिसु भावै सो थीऐ इना जंता वसि किछु नाहि ॥८॥४॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ भोली (नादान) मछली ने जाल को नहीं समझा (कि जाल उसकी मौत का कारण बनता है) और ना ही उसने गहरे खारे समुंद्र को ही समझा (कि समुंद्र में टिके रहने से ही उसकी जिंदगी कायम रह सकती है)। (देखने को मछली) बड़ी सुंदर और अकलमंद लगती है~ पर उसको जाल पर एतबार नहीं करना चाहिए था। (जाल पर) ऐतबार करने के कारण ही वह पकड़ी जाती है~ और उस के सिर पर से मौत नहीं टलती। (जीव यह भूल जाता है कि जिंदगी के अथाह समुंद्र प्रभू में लीन रहने से ही आत्मिक जीवन कायम रहता है। आदमी मोहनी माया का ऐतबार कर बैठता है और आत्मिक मौत सहता है~ मौत का सहम हर वक्त इसके सिर पे सवार रहता है)।1। हे भाई ! अपने सिर पर मौत को ऐसे समझो जैसे मछली को अचनचेत (मछुआरे का) जाल आ पड़ता है~ वैसे ही मनुष्यों के सिर पर अचानक मौत आ पड़ती है।1।रहाउ। सारा जगत मौत के डर में बंधा हुआ है। गुरू की शरण आने के बिना मौत का सहम (हरेक के सिर पर) अमिट है। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के प्यार) में रंगे रहते हैं~ वह विकार छोड़ के मन की माया की ओर डावांडोल हालत छोड़ के मौत के सहम से बच जाते हैं। मैं उनसे सदके जाता हूँ~ जो (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू के दर पर सुर्खरू होते हैं।2। जैसे बाज और शिकारी के हाथ में पकड़ी हुई जाली पंछियों के वास्ते (मौत का संदेशा है~ वैसे ही माया का मोह मनुष्यों के लिए आत्मिक मौत का कारण है)~ जिनकी गुरू ने रक्षा की~ वह माया जाल में से बच निकले~ बाकी सारे माया के चोगे के साथमोह की जाली में फंस गए। जिन्हों के पल्ले नाम नहीं वह चुन-चुन के माया जाल में फेंके जाते हैं~ उनका कोई भी ऐसा संगी-साथी नहीं बनता (जो उन्हें इस जाल में से निकाल सके)।3। (मौत के सहम और आत्मिक मौत से बचने के लिए~ हे भाई!) उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को सिमरना चाहिए जिसका तख्त अटॅल है। जिनका मन सिमरन में लग जाता है~ उनके मन में परमात्मा की याद की लिव लग जाती है। गुरू की शरण पड़ के जिन के मन में और मुंह में परमात्मा के साथ गहरी सांझ टिक जाती है~ वह लोग पवित्र समझे जाते हैं।4। (हे मेरे मन! सज्जन प्रभू को मिलने के वास्ते सदा अपने) गुरू के आगे अरदास करता रह~ (गुरू) सज्जन प्रभू मिला देता है। अगर सज्जन प्रभू मिल जाए तो आत्मिक आनंद मिल जाता है। जमदूत तो (यूँ समझो कि) जहर खा के मर जाते हैं (भाव~ यमदूत नजदीक भी नहीं फटकते)। (अगर~ सज्जन प्रभू मिल जाए तो) मैं उसके नाम में सदा टिका रह सकता हूँ। उसका नाम (सदा के लिए) मेरे मन में आ बसता है।5। गुरू की शरण पड़े बिना (जीव वास्ते चारों तरफ माया के मोह का) घोर अंधकार (रहता) है। गुरू के शबद के बिना समझ नहीं पड़ती (कि मैं माया के मोह में फंसा हुआ हूँ)। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू की शिक्षा के साथ आत्मिक प्रकाश होता है~ वह सदा स्थिर प्रभू में अपनी सुरति जोड़ के रखता है। उस आत्मिक अवस्था में मौत का डर पहुँचता ही नहीं~ (क्योंकि) जीव की ज्योति परमात्मा की ज्योति में लीन रहती है।6। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को सतिगुरू ने (प्रभू के चरणों में) मिला लिया है~ वह परमात्मा के भय-अदब में रहती है~ परमात्मा का प्यार उसका (जीवन) साथी बन जाता है।8।2। गुरू के शबद के द्वारा ही तेरी सिफत सलाह की जा सकती है। (वैसे तो) तेरे गुणों का अंत~ तेरे गुणों के इस पार उस पार का छोर नहीं ढूंढा जा सकता। जिस हृदय में गुरू का शबद टिका हुआ है~ बेअंत प्रभू स्वयं टिका हुआ है वहां परमात्मा का डर पहुँच नहीं सकता।7। (माया के मोह जाल में से निकलना जीवों के बस की बात नहीं है) परमात्मा के हुकम में सारे जीव पैदा होते हैं। उसके हुकम में ही कार-व्यवहार करते हैं। प्रभू के हुकम में ही सृष्टि मौत के डर के अधीन है। हुकम अनुसार ही जीव सदा स्थिर प्रभू की याद में टिकते हैं। हे नानक ! वही कुछ होता है जो उस परमात्मा को ठीक लगता है। इन जीवों के बस में कुछ भी नहीं।8।4।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨਿ ਜੂਠੈ ਤਨਿ ਜੂਠਿ ਹੈ ਜਿਹਵਾ ਜੂਠੀ ਹੋਇ ॥
ਮਨਿ ਜੂਠੈ ਤਨਿ ਜੂਠਿ ਹੈ ਜਿਹਵਾ ਜੂਠੀ ਹੋਇ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
मनि जूठै तनि जूठि है जिहवा जूठी होइ ॥
मनि जूठै तनि जूठि है जिहवा जूठी होइ ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला १ ॥ अगर~ जीव का मन (विकारों की छूह से) जूठा हो चुका है~ तो उसके शरीर में भी जूठ ही जूठ है (सारी ज्ञानेद्रियां विकारों की ओर ही दौड़ती हैं) उसकी जीभ (खाने के चस्को के साथ) जूठी हुई रहती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 55 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 55” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 56 →, पीछे का: ← अंग 54।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।