अंग 54

अंग
54
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਣਤ ਗਣਾਵਣਿ ਆਈਆ ਸੂਹਾ ਵੇਸੁ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ਪਾਖੰਡਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਨ ਪਾਈਐ ਖੋਟਾ ਪਾਜੁ ਖੁਆਰੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਇਉ ਪਿਰੁ ਰਾਵੈ ਨਾਰਿ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵਨਿ ਸੋਹਾਗਣੀ ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਲੈਹਿ ਸਵਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੀਗਾਰੀਆ ਤਨੁ ਮਨੁ ਪਿਰ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥
ਦੁਇ ਕਰ ਜੋੜਿ ਖੜੀ ਤਕੈ ਸਚੁ ਕਹੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਲਾਲਿ ਰਤੀ ਸਚ ਭੈ ਵਸੀ ਭਾਇ ਰਤੀ ਰੰਗਿ ਰਾਸਿ ॥੨॥
ਪ੍ਰਿਅ ਕੀ ਚੇਰੀ ਕਾਂਢੀਐ ਲਾਲੀ ਮਾਨੈ ਨਾਉ ॥
ਸਾਚੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਤੁਟਈ ਸਾਚੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਉ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੀ ਮਨੁ ਵੇਧਿਆ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੩॥
ਸਾ ਧਨ ਰੰਡ ਨ ਬੈਸਈ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥
ਪਿਰੁ ਰੀਸਾਲੂ ਨਉਤਨੋ ਸਾਚਉ ਮਰੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਿਤ ਰਵੈ ਸੋਹਾਗਣੀ ਸਾਚੀ ਨਦਰਿ ਰਜਾਇ ॥੪॥
ਸਾਚੁ ਧੜੀ ਧਨ ਮਾਡੀਐ ਕਾਪੜੁ ਪ੍ਰੇਮ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਚੰਦਨੁ ਚੀਤਿ ਵਸਾਇਆ ਮੰਦਰੁ ਦਸਵਾ ਦੁਆਰੁ ॥
ਦੀਪਕੁ ਸਬਦਿ ਵਿਗਾਸਿਆ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਉਰ ਹਾਰੁ ॥੫॥
ਨਾਰੀ ਅੰਦਰਿ ਸੋਹਣੀ ਮਸਤਕਿ ਮਣੀ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਸਾਚੈ ਪ੍ਰੇਮਿ ਅਪਾਰ ॥
ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਪੁਰਖੁ ਨ ਜਾਣਈ ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੬॥
ਨਿਸਿ ਅੰਧਿਆਰੀ ਸੁਤੀਏ ਕਿਉ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਅੰਕੁ ਜਲਉ ਤਨੁ ਜਾਲੀਅਉ ਮਨੁ ਧਨੁ ਜਲਿ ਬਲਿ ਜਾਇ ॥
ਜਾ ਧਨ ਕੰਤਿ ਨ ਰਾਵੀਆ ਤਾ ਬਿਰਥਾ ਜੋਬਨੁ ਜਾਇ ॥੭॥
ਸੇਜੈ ਕੰਤ ਮਹੇਲੜੀ ਸੂਤੀ ਬੂਝ ਨ ਪਾਇ ॥
ਹਉ ਸੁਤੀ ਪਿਰੁ ਜਾਗਣਾ ਕਿਸ ਕਉ ਪੂਛਉ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਭੈ ਵਸੀ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੇਮੁ ਸਖਾਇ ॥੮॥੨॥
गणत गणावणि आईआ सूहा वेसु विकारु ॥
पाखंडि प्रेमु न पाईऐ खोटा पाजु खुआरु ॥१॥
हरि जीउ इउ पिरु रावै नारि ॥
तुधु भावनि सोहागणी अपणी किरपा लैहि सवारि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर सबदी सीगारीआ तनु मनु पिर कै पासि ॥
दुइ कर जोड़ि खड़ी तकै सचु कहै अरदासि ॥
लालि रती सच भै वसी भाइ रती रंगि रासि ॥२॥
प्रिअ की चेरी कांढीऐ लाली मानै नाउ ॥
साची प्रीति न तुटई साचे मेलि मिलाउ ॥
सबदि रती मनु वेधिआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥३॥
सा धन रंड न बैसई जे सतिगुर माहि समाइ ॥
पिरु रीसालू नउतनो साचउ मरै न जाइ ॥
नित रवै सोहागणी साची नदरि रजाइ ॥४॥
साचु धड़ी धन माडीऐ कापड़ु प्रेम सीगारु ॥
चंदनु चीति वसाइआ मंदरु दसवा दुआरु ॥
दीपकु सबदि विगासिआ राम नामु उर हारु ॥५॥
नारी अंदरि सोहणी मसतकि मणी पिआरु ॥
सोभा सुरति सुहावणी साचै प्रेमि अपार ॥
बिनु पिर पुरखु न जाणई साचे गुर कै हेति पिआरि ॥६॥
निसि अंधिआरी सुतीए किउ पिर बिनु रैणि विहाइ ॥
अंकु जलउ तनु जालीअउ मनु धनु जलि बलि जाइ ॥
जा धन कंति न रावीआ ता बिरथा जोबनु जाइ ॥७॥
सेजै कंत महेलड़ी सूती बूझ न पाइ ॥
हउ सुती पिरु जागणा किस कउ पूछउ जाइ ॥
सतिगुरि मेली भै वसी नानक प्रेमु सखाइ ॥८॥२॥

हिन्दी अर्थ: पर~ जो अपने श्रृंगार का दिखावा मान करती हैं उनका गाढ़ा लाल पहिरावा भी विकार (ही) पैदा करता है। क्योकि~ दिखावा करने से प्रभू का प्यार नहीं मिलता। (अंदर खोट हो और बाहर से प्रेम का दिखावा हो) यह खोटा दिखावा खुआर (नाश) ही करता है।1। हे प्रभू जी ! वह जीव-सि्त्रयां सुहाग भाग वालियां हैं जो तुझे अच्छी लगती हैं। जिनको तू अपनी मेहर से खुद सुचज्जियां बना लेता है, यह श्रद्धा धारी प्रभु पति जीव-सि्त्रयों को प्यार करता है।1।रहाउ। पर~ जो जीव स्त्री गुरू के शबद के द्वारा (अपने जीवन को) संवारती है~ जिसका शरीर पति प्रभु के हवाले है~ जिसका मन पति प्रभू के हवाले है (भाव~ जिसका मन और जिसकी ज्ञानेद्रियां प्रभू की याद से अलग कुराहे नहीं जाते)~ जो दोनों हाथ जोड़ के पूरी श्रद्धा से (प्रभू पति का आसरा ही) देखती है~ जो सदा स्थिर प्रभू को ही याद करती है और उसके दर पे अरजोईयां करती है~ वह प्रभू प्रीतम (के प्यार) में रंगी रहती है। वह सदा स्थिर प्रभू के डर अदब में टिकी रहती है~ वह प्रभू के प्रेम में रंगी रहती है~ तथा उस के रंग में रसी रहती है।2। जो (प्रभू चरणों की) सेविका प्रभू के नाम को मानती है (प्रभू के नाम को ही अपनी जिंदगी का आसरा बनाती है) वह प्रभू पति की दासी कही जाती है~ प्रभू के साथ उसकी प्रीति सदा कायम रहती है, कभी टूटती नहीं~ सदा स्थिर प्रभू की संगति में (चरणों में) उसका मिलाप बना रहता है। प्रभू की सिफति सलाह के शबद में वह रंगी रहती है~ उसका मन परोया रहता है। मैं ऐसी जीव स्त्री से कुर्बान हूँ।3। अगर~ जीव स्त्री गुरू (के शबद) में सुरति जोड़ के रखे~ तो वह कभी विधवा (हो के) नहीं बेठती। (भाव~ खसम सांई का हाथ सदा उसके सिर पर टिका रहता है~ फिर वह) खसम (भी ऐसा है जो) आनंद का स्रोत है (जिसका प्यार नित्य) नया है~ (जो) सदा कायम रहने वाला (है~ जो) ना मरता है ना पैदा होता है। वह अपनी सदा स्थिर मेहर की नजर से अपनी रजा के मुताबिक सदा उस सुहागन जीव स्त्री को प्यार करता है।4। जो जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू (की याद अपने हृदय में टिकाती है~ यह मानो~ पति प्रभू को प्रसन्न करने के लिए) केसों की लटें संवारती है~ प्रभू के प्यार को (सुंदर) कपड़ा और (गहनों का) श्रृंगार बनाती है~ जिसने प्रभू को अपने चिक्त में बसाया है (और यह जैसे उसके माथे पर) चंदन (का टीका लगाया) है~ जिसने अपने दसवें द्वार (दिमाग~ चिक्त-आकाश) को (पति प्रभू के रहने के लिए) सुंदर घर बनाया है। जो गुरू के शबद द्वारा (अपने हृदय को) हिलोरों में ले आई है। (और यह जैसे~ उसके हृदय में) दीआ (जलाया है)~ जिसने परमात्मा के नाम को अपने गले का हार बना लिया है।5। जिसने अपने माथे पर प्रभू के प्यार का जड़ाऊ टिका लगाया हुआ है। जिसने सदा स्थिर रहने वाले बेअंत प्रभू के प्रेम में अपनी सुरति (जोड़ के) खबसूरति बना ली है (और~ इसको वह अपनी) शोभा समझती है। वह जीव स्त्री और जीव सि्त्रयों (जानी मानी) खूबसूरति है~ वह अपने गुरू के शबद के प्रेम प्यार में रह के सदा स्थिर सर्व-व्यापक प्रभू पति के बिना और किसी से जान-पहिचान नहीं डालती।6। माया के मोह की काली अंधियारी रात में सो रही जीव-स्त्री ! प्रभू पति के मिलाप के बगैर जिंदगी की रात आसान नहीं गुजर सकती। जल जाए वह हृदय और वह शरीर (जिसमें प्रभू की याद नहीं)। प्रभू की याद के बिना मन (विकारों में) जल-बल जाता है~ माया धन भी व्यर्थ ही जाता है। अगर~ जीव स्त्री को प्रभू पति ने प्यार नहीं किया~ तो उसकी जवानी व्यर्थ ही चली जाती है।7। भाग्यहीन जीव स्त्री खसम प्रभू की सेज पर सो रही है~ पर उसे ये समझ नहीं (कि हृदय सेज पर जीवात्मा और परमात्मा का इकट्ठा निवास है~ पर माया के मोह में ग्रसित जीवात्मा को इस की सार नहीं है)। हे प्रभू पति ! मैं जीव-स्त्री (माया की मोह की नींद में) सोई रहती हूँ~ तू पति सदा जागता है (तुझे माया व्याप नहीं सकती); मैं किससे जा के पूछूँ (कि मैं किस तरह माया की नींद में से जाग के तुझे मिल सकती हूँ) ? हे नानक! जिस जीव-स्त्री को सतिगुरू ने (प्रभू के चरणों में) मिला लिया है~ वह परमात्मा के भय-अदब में रहती है~ परमात्मा का प्यार उसका (जीवन) साथी बन जाता है।8।2।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣ ਆਪੇ ਕਥੈ ਆਪੇ ਸੁਣਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਆਪੇ ਰਤਨੁ ਪਰਖਿ ਤੂੰ ਆਪੇ ਮੋਲੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਸਾਚਉ ਮਾਨੁ ਮਹਤੁ ਤੂੰ ਆਪੇ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਰਤਾ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ਤੂੰ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਆਚਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਹੀਰਾ ਨਿਰਮਲਾ ਆਪੇ ਰੰਗੁ ਮਜੀਠ ॥
ਆਪੇ ਮੋਤੀ ਊਜਲੋ ਆਪੇ ਭਗਤ ਬਸੀਠੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹਣਾ ਘਟਿ ਘਟਿ ਡੀਠੁ ਅਡੀਠੁ ॥੨॥
ਆਪੇ ਸਾਗਰੁ ਬੋਹਿਥਾ ਆਪੇ ਪਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਸਾਚੀ ਵਾਟ ਸੁਜਾਣੁ ਤੂੰ ਸਬਦਿ ਲਘਾਵਣਹਾਰੁ ॥
ਨਿਡਰਿਆ ਡਰੁ ਜਾਣੀਐ ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਗੁਬਾਰੁ ॥੩॥
ਅਸਥਿਰੁ ਕਰਤਾ ਦੇਖੀਐ ਹੋਰੁ ਕੇਤੀ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਆਪੇ ਨਿਰਮਲੁ ਏਕੁ ਤੂੰ ਹੋਰ ਬੰਧੀ ਧੰਧੈ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਸਾਚੇ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੪॥
सिरीरागु महला १ ॥
आपे गुण आपे कथै आपे सुणि वीचारु ॥
आपे रतनु परखि तूं आपे मोलु अपारु ॥
साचउ मानु महतु तूं आपे देवणहारु ॥१॥
हरि जीउ तूं करता करतारु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं हरि नामु मिलै आचारु ॥१॥ रहाउ ॥
आपे हीरा निरमला आपे रंगु मजीठ ॥
आपे मोती ऊजलो आपे भगत बसीठु ॥
गुर कै सबदि सलाहणा घटि घटि डीठु अडीठु ॥२॥
आपे सागरु बोहिथा आपे पारु अपारु ॥
साची वाट सुजाणु तूं सबदि लघावणहारु ॥
निडरिआ डरु जाणीऐ बाझु गुरू गुबारु ॥३॥
असथिरु करता देखीऐ होरु केती आवै जाइ ॥
आपे निरमलु एकु तूं होर बंधी धंधै पाइ ॥
गुरि राखे से उबरे साचे सिउ लिव लाइ ॥४॥

हिन्दी अर्थ: श्रीरागु महला १ ॥ प्रभू खुद ही (अपने) गुण है~ खुद ही (अपने गुणों को) बयान करता है~ खुद ही (अपनी सिफति सलाह) सुन के उस को विचारता है (उस में सुरति जोड़ता है)। हे प्रभू तू खुद ही (अपना नाम रूप) रत्न है। तू स्वयं ही उस रत्न का मुल्य डालने वाला है~ तू स्वयं ही (अपने नाम रूपी रत्न का) बेअंत मूल्य है। तू स्वयं ही सदा कायम रहने वाला गर्व है~ बड़प्पन है~ तू स्वयं ही (जीवों को आदर सत्कार) देने वाला है।1। हे प्रभू जी! (हरेक चीज को) पैदा करने वाला तू स्वयं ही है। हे प्रभु! जैसे तूझे ठीक लगे~ मुझे (अपने नाम में जोड़ के) रख। हे हरि! (मेहर कर) मुझे तेरा नाम मिल जाए। तेरा नाम ही मेरे वास्ते (बढ़िया से बढ़िया) कर्तव्य है।1।रहाउ। हे प्रभू ! तू खुद ही चमकता हीरा है~ तू खंद ही मजीठ का रंग है~ तू खुद ही चमकता मोती है~ तू खुद ही (अपने) भक्तों का विचोला है। सत्गुरू के शबद से तेरी सिफत सलाह हो सकती है। हरेक शरीर में तू ही दिखाई दे रहा है और तू ही अदृष्ट है।2। हे प्रभू! (यह संसार-) समुंद्र तू खुद ही है~ (इस में से पार लंघाने वाला) जहाज़ भी तू खुद ही है। (इस संसार-समुंद्र का) इस पार का और उसपार का छोर भी तू स्वयं ही है। (हे प्रभू! तेरी भक्ति-रूप) मार्ग भी तू स्वयं ही है~ तू सब कुछ जानता है। गुरू शबद के द्वारा (इस संसार समुंद्र में से भक्ति द्वारा) पार लंघाने वाला भी तू ही है। गुरू की शरण के बिना (ये जीवन-यात्रा~ जीवों के लिए) घोर अंधेरा है। हे प्रभू ! जो जीव तेरा डर-भय नही रखते~ उनको दुनिया का सहम सहना पड़ता है।3। (इस जगत में) एक करतार ही सदा स्थिर रहने वाला दिखाई देता है~ और बेअंत सृष्टि पैदा होती मरती रहती है। हे प्रभू ! एक तू ही (माया के मोह की) मैल से साफ है~ बाकी सारी दुनिया (माया के मोह के) बंधन में बंधी हुई है। जिनको गुरू ने (इस मोह से) बचा लिया है~ वह सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में सुरति जोड़ के बच गए हैं।4।

संदर्भ: यह अंग 54 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 54” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 55 →, पीछे का: ← अंग 53

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।