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अंग 55

अंग
55
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि जीउ सबदि पछाणीऐ साचि रते गुर वाकि ॥
तितु तनि मैलु न लगई सच घरि जिसु ओताकु ॥
नदरि करे सचु पाईऐ बिनु नावै किआ साकु ॥5॥
जिनी सचु पछाणिआ से सुखीए जुग चारि ॥
हउमै त्रिसना मारि कै सचु रखिआ उर धारि ॥
जग महि लाहा एकु नामु पाईऐ गुर वीचारि ॥6॥
साचउ वखरु लादीऐ लाभु सदा सचु रासि ॥
साची दरगह बैसई भगति सची अरदासि ॥
पति सिउ लेखा निबड़ै राम नामु परगासि ॥7॥
ऊचा ऊचउ आखीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥
जह देखा तह एकु तूं सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
जोति निरंतरि जाणीऐ नानक सहजि सुभाइ ॥8॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सदा कायम रहने वाले प्रभू (के नाम) में रंगे हुए गुरू के वाक्य द्वारा, शब्द के द्वारा परमात्मा के साथ जान-पहिचान पड़ सकती है। (गुरू के द्वारा) जिस मनुष्य की बैठक सदा स्थिर प्रभू के घर में (चरणों में) हो जाती है, उस के शरीर में (माया की) मैल नहीं लगती। वह सदा स्थिर प्रभू जिस पर मेहर की निगाह करता है, उसीको उसकी प्राप्ति होती है। उसका नाम सिमरने के बिना उस से संबंध नहीं बन सकता।5। जिन लोगों ने सदा स्थिर प्रभू के साथ सांझ डाल ली है, वह सदा ही आत्मिक आनंद में रहते हैं। वह अपने अहम् और (माया वाली) तृष्णा मार के सदा स्थिर प्रभू (के नाम) को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। जगत में (आने का) परमात्मा का एक नाम ही लाभ है (जो मनुष्य को कमाना चाहिए, और यह नाम) गुरू की बताई हुई शिक्षा से ही मिल सकता है।6। (हे व्यापारी जीव!) सदा स्थिर रहने वाली (नाम की) राशि-पूँजी ही जोड़नी चाहिए, (इसमें वह) नफा (पड़ता है जो) सदा (कायम रहता है)। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की भक्ति करता है, (उसके आगे) अरदास करता है, वह उसकी सदा स्थिर हजूरी में बैठता है। उसका (जीवन सफर का) लेखा (बा-इज्जत) साफ हो जाता है (क्योंकि, उसके अंदर) प्रभू का नाम उजागर हो जाता है।7। परमात्मा सबसे ऊँचा है, परमात्मा सबसे ऊूंचा है, (हर ओर से) यही कहा जाता है, मैं (भी) कहता हूं (कि परमात्मा सबसे ऊूंचा है, पर निरा कहने से) उसका दर्शन नहीं किया जा सकता। जब सत्गुरू ने मुझे, (हे प्रभू! आपका) दर्शन करा दिया, तो अब मैं जिधर देखता हूँ, आप ही आप दिखाई देता है। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ के) आत्मिक अडोलता वाली अवस्था में टिक के प्रेम में जुड़ के ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की ज्योति एक-रस हर जगह मौजूद है।8।3।
सिरीरागु महला 1 ॥
मछुली जालु न जाणिआ सरु खारा असगाहु ॥
अति सिआणी सोहणी किउ कीतो वेसाहु ॥
कीते कारणि पाकड़ी कालु न टलै सिराहु ॥1॥
भाई रे इउ सिरि जाणहु कालु ॥
जिउ मछी तिउ माणसा पवै अचिंता जालु ॥1॥ रहाउ ॥
सभु जगु बाधो काल को बिनु गुर कालु अफारु ॥
सचि रते से उबरे दुबिधा छोडि विकार ॥
हउ तिन कै बलिहारणै दरि सचै सचिआर ॥2॥
सीचाने जिउ पंखीआ जाली बधिक हाथि ॥
गुरि राखे से उबरे होरि फाथे चोगै साथि ॥
बिनु नावै चुणि सुटीअहि कोइ न संगी साथि ॥3॥
सचो सचा आखीऐ सचे सचा थानु ॥
जिनी सचा मंनिआ तिन मनि सचु धिआनु ॥
मनि मुखि सूचे जाणीअहि गुरमुखि जिना गिआनु ॥4॥
सतिगुर अगै अरदासि करि साजनु देइ मिलाइ ॥
साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ ॥
नावै अंदरि हउ वसां नाउ वसै मनि आइ ॥5॥
बाझु गुरू गुबारु है बिनु सबदै बूझ न पाइ ॥
गुरमती परगासु होइ सचि रहै लिव लाइ ॥
तिथै कालु न संचरै जोती जोति समाइ ॥6॥
तूंहै साजनु तूं सुजाणु तूं आपे मेलणहारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥
तिथै कालु न अपड़ै जिथै गुर का सबदु अपारु ॥7॥
हुकमी सभे ऊपजहि हुकमी कार कमाहि ॥
हुकमी कालै वसि है हुकमी साचि समाहि ॥
नानक जो तिसु भावै सो थीऐ इना जंता वसि किछु नाहि ॥8॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ भोली (नादान) मछली ने जाल को नहीं समझा (कि जाल उसकी मौत का कारण बनता है) और ना ही उसने गहरे खारे समुंद्र को ही समझा (कि समुंद्र में टिके रहने से ही उसकी जिंदगी कायम रह सकती है)। (देखने को मछली) बड़ी सुंदर और अकलमंद लगती है, पर उसको जाल पर एतबार नहीं करना चाहिए था। (जाल पर) ऐतबार करने के कारण ही वह पकड़ी जाती है, और उस के सिर पर से मौत नहीं टलती। (जीव यह भूल जाता है कि जिंदगी के अथाह समुंद्र प्रभू में लीन रहने से ही आत्मिक जीवन कायम रहता है। आदमी मोहनी माया का ऐतबार कर बैठता है और आत्मिक मौत सहता है, मौत का सहम हर वक्त इसके सिर पे सवार रहता है)।1। हे भाई ! अपने सिर पर मौत को ऐसे समझो जैसे मछली को अचनचेत (मछुआरे का) जाल आ पड़ता है, वैसे ही मनुष्यों के सिर पर अचानक मौत आ पड़ती है।1।रहाउ। सारा जगत मौत के डर में बंधा हुआ है। गुरू की शरण आने के बिना मौत का सहम (हरेक के सिर पर) अमिट है। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के प्यार) में रंगे रहते हैं, वह विकार छोड़ के मन की माया की ओर डावांडोल हालत छोड़ के मौत के सहम से बच जाते हैं। मैं उनसे सदके जाता हूँ, जो (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू के दर पर सुर्खरू होते हैं।2। जैसे बाज और शिकारी के हाथ में पकड़ी हुई जाली पंछियों के वास्ते (मौत का संदेशा है, वैसे ही माया का मोह मनुष्यों के लिए आत्मिक मौत का कारण है), जिनकी गुरू ने रक्षा की, वह माया जाल में से बच निकले, बाकी सारे माया के चोगे के साथमोह की जाली में फंस गए। जिन्हों के पल्ले नाम नहीं वह चुन-चुन के माया जाल में फेंके जाते हैं, उनका कोई भी ऐसा संगी-साथी नहीं बनता (जो उन्हें इस जाल में से निकाल सके)।3। (मौत के सहम और आत्मिक मौत से बचने के लिए, हे भाई!) उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को सिमरना चाहिए जिसका तख्त अटॅल है। जिनका मन सिमरन में लग जाता है, उनके मन में परमात्मा की याद की लिव लग जाती है। गुरू की शरण पड़ के जिन के मन में और मुंह में परमात्मा के साथ गहरी सांझ टिक जाती है, वह लोग पवित्र समझे जाते हैं।4। (हे मेरे मन! सज्जन प्रभू को मिलने के वास्ते सदा अपने) गुरू के आगे अरदास करता रह, (गुरू) सज्जन प्रभू मिला देता है। अगर सज्जन प्रभू मिल जाए तो आत्मिक आनंद मिल जाता है। जमदूत तो (यूँ समझो कि) जहर खा के मर जाते हैं (भाव, यमदूत नजदीक भी नहीं फटकते)। (अगर, सज्जन प्रभू मिल जाए तो) मैं उसके नाम में सदा टिका रह सकता हूँ। उसका नाम (सदा के लिए) मेरे मन में आ बसता है।5। गुरू की शरण पड़े बिना (जीव वास्ते चारों तरफ माया के मोह का) घोर अंधकार (रहता) है। गुरू के शबद के बिना समझ नहीं पड़ती (कि मैं माया के मोह में फंसा हुआ हूँ)। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू की शिक्षा के साथ आत्मिक प्रकाश होता है, वह सदा स्थिर प्रभू में अपनी सुरति जोड़ के रखता है।(क्योंकि) जीव की ज्योति परमात्मा की ज्योति में लीन रहती है।6। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को सतिगुरू ने (प्रभू के चरणों में) मिला लिया है, वह परमात्मा के भय-अदब में रहती है, परमात्मा का प्यार उसका (जीवन) साथी बन जाता है।8।2। गुरू के शबद के द्वारा ही आपकी सिफत सलाह की जा सकती है। (वैसे तो) आपके गुणों का अंत, आपके गुणों के इस पार उस पार का छोर नहीं ढूंढा जा सकता। जिस हृदय में गुरू का शबद टिका हुआ है, बेअंत प्रभू स्वयं टिका हुआ है वहां परमात्मा का डर पहुँच नहीं सकता।7। (माया के मोह जाल में से निकलना जीवों के बस की बात नहीं है) परमात्मा के हुकम में सारे जीव पैदा होते हैं। उसके हुकम में ही कार-व्यवहार करते हैं। प्रभू के हुकम में ही सृष्टि मौत के डर के अधीन है। हुकम अनुसार ही जीव सदा स्थिर प्रभू की याद में टिकते हैं। हे नानक ! वही कुछ होता है जो उस परमात्मा को ठीक लगता है। इन जीवों के बस में कुछ भी नहीं।8।4।
सिरीरागु महला 1 ॥
मनि जूठै तनि जूठि है जिहवा जूठी होइ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ अगर, जीव का मन (विकारों की छूह से) जूठा हो चुका है, तो उसके शरीर में भी जूठ ही जूठ है (सारी ज्ञानेद्रियां विकारों की ओर ही दौड़ती हैं) उसकी जीभ (खाने के चस्को के साथ) जूठी हुई रहती है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा कायम रहने वाले प्रभू (के नाम) में रंगे हुए गुरू के वाक्य द्वारा, शब्द के द्वारा परमात्मा के साथ जान-पहिचान पड़ सकती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।