राग: Bihaagraa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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खान पान सीगार बिरथे हरि कंत बिनु किउ जीजीऐ ॥ आसा पिआसी रैनि दिनीअरु रहि न सकीऐ इकु तिलै ॥ नानकु पइअंपै संत दासी तउ प्रसादि मेरा पिरु मिलै ॥2॥ सेज एक प्रिउ संगि दरसु न पाईऐ राम ॥ अवगन मोहि अनेक कत महलि बुलाईऐ राम ॥ निरगुनि निमाणी अनाथि बिनवै मिलहु प्रभ किरपा निधे ॥ भ्रम भीति खोईऐ सहजि सोईऐ प्रभ पलक पेखत नव निधे ॥ ग्रिहि लालु आवै महलु पावै मिलि संगि मंगलु गाईऐ ॥ नानकु पइअंपै संत सरणी मोहि दरसु दिखाईऐ ॥3॥ संतन कै परसादि हरि हरि पाइआ राम ॥ इछ पुंनी मनि सांति तपति बुझाइआ राम ॥ सफला सु दिनस रैणे सुहावी अनद मंगल रसु घना ॥ प्रगटे गुपाल गोबिंद लालन कवन रसना गुण भना ॥ भ्रम लोभ मोह बिकार थाके मिलि सखी मंगलु गाइआ ॥ नानकु पइअंपै संत जंपै जिनि हरि हरि संजोगि मिलाइआ ॥4॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारे खाने-पीने श्रृंगार प्रभू-पति के बिना व्यर्थ हैं।प्रभू-पति के बिना जीवन के कोई मायने नहीं। प्रभू-पति के बिना (दुनियावी) आशाएं (व्याकुल किए रखती हैं) माया की तृष्णा दिन-रात लगी रहती है।रक्ती भर समय के लिए भी जीवात्मा ठहराव में नहीं आती। नानक विनती करता है, हे गुरू ! मैं (जीव-स्त्री) आपकी दासी आ बनी हूँ।आपकी कृपा से (ही) मेरा प्रभू पति (मुझे) मिल सकता है। 2। (मेरी इस) एक ही हृदय-सेज पर प्रभू-पति (मेरे) साथ (बसता) है।पर मुझे दर्शन प्राप्त नहीं होता ! मुझे प्रभू की हजूरी में बुलाया भी कैसे जाए।मेरे में तो अनेकों अवगुण हैं। गुण हीन।निमाणी। निआसरी (जीव-स्त्री) विनती करती है, हे कृपा के खजाने प्रभू ! मुझे मिल। हे नौ खजानों के मालिक प्रभू ! एक पलक मात्र आपके दर्शन करने से (आपसे विछुड़ने वाली) भटकना की दीवार दूर हैं जाती है।आत्मक अडोलता में लीनता हैं जाती है। जब जीव-स्त्री के हृदय-घर में प्यारा प्रभू-पति आ बसता है जब जीव-स्त्री प्रभू की हजूरी प्राप्त कर लेती है।तब प्रभू के साथ मिल के खुशी के गीत गाए जा सकते हैं। हे गुरू ! नानक आपके चरणों में आ पड़ा है।आपकी शरण आ गया है (मुझे नानक को) परमात्मा पति के दर्शन करवा दे। 3। सतिगुरू की कृपा से मैंने परमात्मा ढूंढ लिया है। मेरी (चिरों की) चाहत पूरी हो गई है। मेरे मन में ठण्ड पड़ गई है।(मेरे अंदर से तृष्णा की) तपश बुझ गई है। वह दिन (मेरे वास्ते) भाग्यशाली है वह रात सुहानी है (जब मुझे परमात्मा मिला।मिलाप के कारण मेरे अंदर) बहुत सारी खुशियां-आनंद-स्वाद बन गए हैं। (मेरे हृदय में) प्यारे गोपाल गोबिंद जी प्रगट हो गए हैं।मैं अपनी जीभ से (उस मिलाप के) कौन-कौन से गुण (लाभ) बताऊँ। (मेरे अंदर से) भटकना।लोभ।मोह आदि सारे विकार दूर हो गए हैं।मेरी ज्ञानेन्द्रियां मिल के सिफत-सालाह के गीत गा रही हैं। अब नानक गुरू के चरणों में गिर पड़ा है।गुरू के आगे ही अरजोई करता रहता है।क्योंकि उस गुरू ने मिलाप के लेख के द्वारा (मिलाप के लेख को उजागर करके) मुझे परमात्मा से मिला दिया है। 4। 2।
बिहागड़ा महला 5 ॥ करि किरपा गुर पारब्रहम पूरे अनदिनु नामु वखाणा राम ॥ अंम्रित बाणी उचरा हरि जसु मिठा लागै तेरा भाणा राम ॥ करि दइआ मइआ गोपाल गोबिंद कोइ नाही तुझ बिना ॥ समरथ अगथ अपार पूरन जीउ तनु धनु तुम॑ मना ॥ मूरख मुगध अनाथ चंचल बलहीन नीच अजाणा ॥ बिनवंति नानक सरणि तेरी रखि लेहु आवण जाणा ॥1॥ साधह सरणी पाईऐ हरि जीउ गुण गावह हरि नीता राम ॥ धूरि भगतन की मनि तनि लगउ हरि जीउ सभ पतित पुनीता राम ॥ पतिता पुनीता होहि तिन॑ संगि जिन॑ बिधाता पाइआ ॥ नाम राते जीअ दाते नित देहि चड़हि सवाइआ ॥ रिधि सिधि नव निधि हरि जपि जिनी आतमु जीता ॥ बिनवंति नानकु वडभागि पाईअहि साध साजन मीता ॥2॥ जिनी सचु वणंजिआ हरि जीउ से पूरे साहा राम ॥ बहुतु खजाना तिंन पहि हरि जीउ हरि कीरतनु लाहा राम ॥ कामु क्रोधु न लोभु बिआपै जो जन प्रभ सिउ रातिआ ॥ एकु जानहि एकु मानहि राम कै रंगि मातिआ ॥ लगि संत चरणी पड़े सरणी मनि तिना ओमाहा ॥ बिनवंति नानकु जिन नामु पलै सेई सचे साहा ॥3॥ नानक सोई सिमरीऐ हरि जीउ जा की कल धारी राम ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 ॥ हे सबसे बड़े ! हे सर्व गुण संपन्न प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं हर वक्त आपका नाम सिमरता रहूँ। आत्मिक जीवन देने वाली आपकी बाणी उचारता रहूँ।मैं आपकी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ।मुझे आपकी रजा मीठी लगती रहे। हे गोपाल ! हे गोबिंद ! (मेरे पर) दया कर।तरस कर।आपके बिना मेरा और कोई सहारा नहीं। हे सब ताकतों के मालिक ! हे अकॅथ ! हे बेअंत ! मेरी ये जीवात्मा।मेरा ये मन ये शरीर।ये धन- सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! मैं मूर्ख हूँ बहुत मूर्ख हूँ।निआसरा हूँ।चंचल।कमजोर।नीच और अंजान हूँ। नानक विनती करता है,मैं आपकी शरण आया हूँ।मुझे जनम-मरण के चक्कर से बचा ले। 1। (हे भाई !) गुरमुखों की शरण पड़ने से परमात्मा मिल जाता है।और।हम सदा परमात्मा के गुण गा सकते हैं। हे प्रभू जी ! (मेहर कर) आपके भक्तजनों के चरणों की धूड़ मेरे मन में मेरे माथे पर लगती रहे (भक्तजनों के चरणों की धूड़ की बरकति से) विकारों में गिरे हुए मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं जिन मनुष्यों ने करतार पा लिया उनकी संगति में विकारी लोग स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं। परमात्मा के नाम-रंग से रंगे हुए लोग आत्मिक जीवन की दातें देने योग्य हो जाते हैं। वे ये दातें नित्य देते हैं और ये बढ़ती ही रहतीं हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जप के अपने मन को वश में कर लिया।सब करामाती ताकतें व दुनियां के नौ खजाने उनको मिल जाते हैं। हे भाई ! नानक विनती करता है कि गुरमुख सज्जन मित्र बड़ी किस्मत से ही मिलते हैं। 2। जिन मनुष्यों ने (सदा) सदा-स्थिर रहने वाले हरि-नाम का व्यापार किया है वह भरे भण्डारे वाले शाहूकार हैं। उनके पास (हरी-नाम का) बहुत खजाना है।वह (इस व्यापार में) परमात्मा की सिफत सालाह (की) कमाई करते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के साथ रंगे रहते हैं।उन पर ना काम।ना क्रोध।ना लोभ।कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकता। वे एक परमात्मा के साथ गहरी साँझ बनाए रखते हैं।वे एक परमात्मा को ही (पक्का साथी) मानते हैं।वे परमात्मा के प्रेम-रंग में मस्त रहते हैं। वे मनुष्य गुरू के चरण लग के परमात्मा की शरण में पड़े रहते हैं।उनके मन में (परमात्मा के मिलाप की) उमंग बनी रहती है। नानक विनती करता है।जिन मनुष्यों के पास परमात्मा का नाम-धन है वही ऐसे हैं जो सदा के लिए शाहूकार बने रहते हैं। 3। हे नानक ! (सदा) उस परमात्मा का सिमरन करना चाहिए (सारे संसार में) जिसकी सक्ता काम कर रही है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारे खाने-पीने श्रृंगार प्रभू-पति के बिना व्यर्थ हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।