दूखु रोगु न भउ बिआपै जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥
संत प्रसादि तरे भवजलु पूरबि लिखिआ पाइआ ॥
वजी वधाई मनि सांति आई मिलिआ पुरखु अपारी ॥
बिनवंति नानकु सिमरि हरि हरि इछ पुंनी हमारी ॥4॥3॥
ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥
घटु दुख नीदड़ीए परसउ सदा पगा ॥
पग धूरि बांछउ सदा जाचउ नाम रसि बैरागनी ॥
प्रिअ रंगि राती सहज माती महा दुरमति तिआगनी ॥
गहि भुजा लीन॑ी प्रेम भीनी मिलनु प्रीतम सच मगा ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा रहउ चरणह संगि लगा ॥1॥
मेरी सखी सहेलड़ीहो प्रभ कै चरणि लगह ॥
मनि प्रिअ प्रेमु घणा हरि की भगति मंगह ॥
हरि भगति पाईऐ प्रभु धिआईऐ जाइ मिलीऐ हरि जना ॥
मानु मोहु बिकारु तजीऐ अरपि तनु धनु इहु मना ॥
बड पुरख पूरन गुण संपूरन भ्रम भीति हरि हरि मिलि भगह ॥
बिनवंति नानक सुणि मंत्रु सखीए हरि नामु नित नित नित जपह ॥2॥
हरि नारि सुहागणे सभि रंग माणे ॥
रांड न बैसई प्रभ पुरख चिराणे ॥
नह दूख पावै प्रभ धिआवै धंनि ते बडभागीआ ॥
सुख सहजि सोवहि किलबिख खोवहि नाम रसि रंगि जागीआ ॥
मिलि प्रेम रहणा हरि नामु गहणा प्रिअ बचन मीठे भाणे ॥
बिनवंति नानक मन इछ पाई हरि मिले पुरख चिराणे ॥3॥
तितु ग्रिहि सोहिलड़े कोड अनंदा ॥
मनि तनि रवि रहिआ प्रभ परमानंदा ॥
हरि कंत अनंत दइआल स्रीधर गोबिंद पतित उधारणो ॥
प्रभि क्रिपा धारी हरि मुरारी भै सिंधु सागर तारणो ॥
जो सरणि आवै तिसु कंठि लावै इहु बिरदु सुआमी संदा ॥
बिनवंति नानक हरि कंतु मिलिआ सदा केल करंदा ॥4॥1॥4॥
हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे नानक ! गुरू की शरण पड़ना चाहिए) गुरू की शरण पड़ने से सर्व-व्यापक करतार प्रभू मन से नहीं भूलता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।