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बिहागड़ा
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गुरमुखि मनहु न वीसरै हरि जीउ करता पुरखु मुरारी राम ॥
गुरमुखि मनहु न वीसरै हरि जीउ करता पुरखु मुरारी राम ॥
दूखु रोगु न भउ बिआपै जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥
संत प्रसादि तरे भवजलु पूरबि लिखिआ पाइआ ॥
वजी वधाई मनि सांति आई मिलिआ पुरखु अपारी ॥
बिनवंति नानकु सिमरि हरि हरि इछ पुंनी हमारी ॥4॥3॥
दूखु रोगु न भउ बिआपै जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥
संत प्रसादि तरे भवजलु पूरबि लिखिआ पाइआ ॥
वजी वधाई मनि सांति आई मिलिआ पुरखु अपारी ॥
बिनवंति नानकु सिमरि हरि हरि इछ पुंनी हमारी ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: (हे नानक ! गुरू की शरण पड़ना चाहिए) गुरू की शरण पड़ने से सर्व-व्यापक करतार प्रभू मन से नहीं भूलता। जिन मनुष्यों ने (सदा) परमात्मा का सिमरन किया है उन पर कोई रोग। कोई दुख। कोई डर अपना जोर नहीं डाल सकता। उन्होंने गुरू की कृपा से ये संसार-समुंद्र तैर लिया (समझो)।पूर्बले जनम की कमाई के मुताबिक (माथे पर भक्ति का) लिखा लेख उनको प्राप्त हो गया। उनके अंदर चढ़दीकला प्रबल हो गई। उनके मन शीतल हो गए। उन्हें बेअंत प्रभू मिल गया। नानक विनती करता है। परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के मेरी भी (प्रभू-मिलाप वाली चिरों की) आस पूरी हो गई है। 4। 3।
वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥
बिहागड़ा महला 5 घरु 2
ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥
घटु दुख नीदड़ीए परसउ सदा पगा ॥
पग धूरि बांछउ सदा जाचउ नाम रसि बैरागनी ॥
प्रिअ रंगि राती सहज माती महा दुरमति तिआगनी ॥
गहि भुजा लीन॑ी प्रेम भीनी मिलनु प्रीतम सच मगा ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा रहउ चरणह संगि लगा ॥1॥
मेरी सखी सहेलड़ीहो प्रभ कै चरणि लगह ॥
मनि प्रिअ प्रेमु घणा हरि की भगति मंगह ॥
हरि भगति पाईऐ प्रभु धिआईऐ जाइ मिलीऐ हरि जना ॥
मानु मोहु बिकारु तजीऐ अरपि तनु धनु इहु मना ॥
बड पुरख पूरन गुण संपूरन भ्रम भीति हरि हरि मिलि भगह ॥
बिनवंति नानक सुणि मंत्रु सखीए हरि नामु नित नित नित जपह ॥2॥
हरि नारि सुहागणे सभि रंग माणे ॥
रांड न बैसई प्रभ पुरख चिराणे ॥
नह दूख पावै प्रभ धिआवै धंनि ते बडभागीआ ॥
सुख सहजि सोवहि किलबिख खोवहि नाम रसि रंगि जागीआ ॥
मिलि प्रेम रहणा हरि नामु गहणा प्रिअ बचन मीठे भाणे ॥
बिनवंति नानक मन इछ पाई हरि मिले पुरख चिराणे ॥3॥
तितु ग्रिहि सोहिलड़े कोड अनंदा ॥
मनि तनि रवि रहिआ प्रभ परमानंदा ॥
हरि कंत अनंत दइआल स्रीधर गोबिंद पतित उधारणो ॥
प्रभि क्रिपा धारी हरि मुरारी भै सिंधु सागर तारणो ॥
जो सरणि आवै तिसु कंठि लावै इहु बिरदु सुआमी संदा ॥
बिनवंति नानक हरि कंतु मिलिआ सदा केल करंदा ॥4॥1॥4॥
ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥
घटु दुख नीदड़ीए परसउ सदा पगा ॥
पग धूरि बांछउ सदा जाचउ नाम रसि बैरागनी ॥
प्रिअ रंगि राती सहज माती महा दुरमति तिआगनी ॥
गहि भुजा लीन॑ी प्रेम भीनी मिलनु प्रीतम सच मगा ॥
बिनवंति नानक धारि किरपा रहउ चरणह संगि लगा ॥1॥
मेरी सखी सहेलड़ीहो प्रभ कै चरणि लगह ॥
मनि प्रिअ प्रेमु घणा हरि की भगति मंगह ॥
हरि भगति पाईऐ प्रभु धिआईऐ जाइ मिलीऐ हरि जना ॥
मानु मोहु बिकारु तजीऐ अरपि तनु धनु इहु मना ॥
बड पुरख पूरन गुण संपूरन भ्रम भीति हरि हरि मिलि भगह ॥
बिनवंति नानक सुणि मंत्रु सखीए हरि नामु नित नित नित जपह ॥2॥
हरि नारि सुहागणे सभि रंग माणे ॥
रांड न बैसई प्रभ पुरख चिराणे ॥
नह दूख पावै प्रभ धिआवै धंनि ते बडभागीआ ॥
सुख सहजि सोवहि किलबिख खोवहि नाम रसि रंगि जागीआ ॥
मिलि प्रेम रहणा हरि नामु गहणा प्रिअ बचन मीठे भाणे ॥
बिनवंति नानक मन इछ पाई हरि मिले पुरख चिराणे ॥3॥
तितु ग्रिहि सोहिलड़े कोड अनंदा ॥
मनि तनि रवि रहिआ प्रभ परमानंदा ॥
हरि कंत अनंत दइआल स्रीधर गोबिंद पतित उधारणो ॥
प्रभि क्रिपा धारी हरि मुरारी भै सिंधु सागर तारणो ॥
जो सरणि आवै तिसु कंठि लावै इहु बिरदु सुआमी संदा ॥
बिनवंति नानक हरि कंतु मिलिआ सदा केल करंदा ॥4॥1॥4॥
हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 घरु 2 सति नामु गुर प्रसादि ॥ हे आत्मिक आनंद देने वाली सुंदर (जीवन की) रात्रि ! आप लंबी होती जाएँ। (ता कि मेरे हृदय में) प्यारे का प्रेम बना रहे। हे दुखदाई कोझी (गफ़लत की) नींद ! आप घटती जाएँ। (ता कि) मैं (आपसे बची रहूँ। और) हमेशा (जागती रहूँ और) प्रभू के चरण छूती रहूँ। मैं (प्रभू के) चरणों की धूड़ की तमन्ना रखती हूँ। मैं सदा (उसके दर से यही) माँगती हूँ कि उसके नाम के स्वाद में (दुनिया से) विरक्त बनी रहूँ। प्यारे के प्रेम रंग में रंगी हुई। आत्मिक अडोलता के (आनंद में) मस्त मैं इस बड़ी (बैरनि) बुरी मति का त्याग किए रहूँ। (प्रभू ने मेरी) बाँह पकड़ के मुझे अपनी बना लिया है। मैं उसके प्रेम रस में भीग गई हूँ। सदा कायम रहने वाले प्रीतम को मिलना ही (जिंदगी का सही) रास्ता है। नानक विनती करता है (हे प्रभू !) कृपा करें। मैं सदा आपके चरणों से जुड़ा रहूँ। 1। हे मेरी सखियो ! हे मेरी प्यारी सहेलियो ! आएँ। हम प्रभू के चरणों में जुड़ें। (मेरे) मन में प्यारे का बहुत प्रेम बस रहा है। आएँ हम (उससे) भक्ति का दान माँगें। हे सहेलियो ! जा के हरी के संत-जनों को मिलना चाहिए (उनकी सहायता से) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (इस तरह) परमात्मा की भक्ति प्राप्त होती है। हे सखियो ! अपना ये मन ये शरीर ये धन (सब कुछ) भेटा करके (अपने अंदर से) अहंकार। माया का मोह। विकार दूर कर देना चाहिए। हे सहेलियो ! जो प्रभू सबसे बड़ा है। सर्व व्यापक है। सारे गुणों से भरपूर है। उसको मिल के (उससे दूरी बनाने वाली अपने अंदर से) भटकना की दीवार गिरा दें। नानक विनती करता है, हे मेरी सहेली ! मेरी सलाह सुनें। आएँ सदा ही सदा ही परमात्मा का नाम जपते रहें। 2। जो जीव-स्त्री अपने आप को प्रभू-पति के हवाले कर देती है वह भाग्यशाली बन जाती है। वह सारे आनंद पाती है वह कभी पति-हीन नहीं होती। (उसके सिर पर) आदि से पति-प्रभू (हाथ रखे रहता है)। उस जीव-स्त्री को कोई दुख नहीं व्याप्तता वह सदा प्रभू-पति का ध्यान धरती है। जो जीव-स्त्रियाँ प्रभू के नाम के स्वाद में प्रभू के प्रेम में (टिक के। माया के मोह की नींद में पड़ने से) सुचेत रहती हैं वे मुबारक हैं वे अति भाग्यशाली हैं वे आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में लीन रहती हैं। वे (अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर लेती हैं। जो जीव-स्त्रियाँ (साध-संगति में) प्रेम से मिल के रहती हैं। प्रभू का नाम जिनकी जिंदगी का श्रृंगार बना रहता है। जिनको प्रीतम प्रभू की सिफत सालाह के बोल मीठे लगते हैं। अच्छे लगते हैं। नानक विनती करता है,उनकी (चिरों की) मनोकामना पूरी हो जाती है (भाव) उनको आदि का पति-प्रभू मिल जाता है। 3। सबसे श्रेष्ठ आनंद का मालिक प्रभू जिस मन में जिस हृदय में आ बसता है। उस हृदय-घर में (मानो) खुशी के गीत (गाए जा रहे हैं) रंग-तमाशे (हो रहे हैं)।आनंद (हो रहा है)। प्रभू-पति बेअंत है। सदा दया का घर है। लक्ष्मी का आसरा है। सृष्टि की सार लेने वाला है। विकारियों को विकार से बचाने वाला है। उस मुरारी प्रभू ने जिस जीव पर मेहर की निगाह कर दी। उस जीव को अनेकों सहम भरे संसार से पार लंघा लिया। मालिक प्रभू का ये आदि कुदरती स्वभाव (बिरद) है कि जो जीव उसकी शरण आता है उसको वह अपने गले से लगा लेता है। नानक विनती करता है,वह सदा चोज-तमाशे करने वाला प्रभू (उस शरण आए को) मिल लेता है। 4। 1। 4।
हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥
बिहागड़ा महला 5 ॥
हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥
हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥
हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 ॥ हे मेरे मन ! परमात्मा के चरण (जैसे) सुंदर सा तालाब है। उसमें आप (सदा) टिका रह।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 544 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।