इकना मेलि सतिगुरु महलि बुलाए इकि भरमि भूले फिरदिआ ॥
अंतु तेरा तूंहै जाणहि तूं सभ महि रहिआ समाए ॥
सचु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि वरतै धरम निआए ॥1॥
आवहु मिलहु सहेलीहो मेरे लाल जीउ हरि हरि नामु अराधे राम ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू मेरे लाल जीउ जम का मारगु साधे राम ॥
मारगु बिखड़ा साधि गुरमुखि हरि दरगह सोभा पाईऐ ॥
जिन कउ बिधातै धुरहु लिखिआ तिन॑ा रैणि दिनु लिव लाईऐ ॥
हउमै ममता मोहु छुटा जा संगि मिलिआ साधे ॥
जनु कहै नानकु मुकतु होआ हरि हरि नामु अराधे ॥2॥
कर जोड़िहु संत इकत्र होइ मेरे लाल जीउ अबिनासी पुरखु पूजेहा राम ॥
बहु बिधि पूजा खोजीआ मेरे लाल जीउ इहु मनु तनु सभु अरपेहा राम ॥
मनु तनु धनु सभु प्रभू केरा किआ को पूज चड़ावए ॥
जिसु होइ क्रिपालु दइआलु सुआमी सो प्रभ अंकि समावए ॥
भागु मसतकि होइ जिस कै तिसु गुर नालि सनेहा ॥
जनु कहै नानकु मिलि साधसंगति हरि हरि नामु पूजेहा ॥3॥
दह दिस खोजत हम फिरे मेरे लाल जीउ हरि पाइअड़ा घरि आए राम ॥
हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ मेरे लाल जीउ हरि तिसु महि रहिआ समाए राम ॥
सरबे समाणा आपि सुआमी गुरमुखि परगटु होइआ ॥
मिटिआ अधेरा दूखु नाठा अमिउ हरि रसु चोइआ ॥
जहा देखा तहा सुआमी पारब्रहमु सभ ठाए ॥
जनु कहै नानकु सतिगुरि मिलाइआ हरि पाइअड़ा घरि आए ॥4॥1॥
अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥
सुंदर सोभा लाल गोपाल दइआल की अपर अपारा राम ॥
गोपाल दइआल गोबिंद लालन मिलहु कंत निमाणीआ ॥
नैन तरसन दरस परसन नह नीद रैणि विहाणीआ ॥
गिआन अंजन नाम बिंजन भए सगल सीगारा ॥
नानकु पइअंपै संत जंपै मेलि कंतु हमारा ॥1॥
लाख उलाहने मोहि हरि जब लगु नह मिलै राम ॥
मिलन कउ करउ उपाव किछु हमारा नह चलै राम ॥
चल चित बित अनित प्रिअ बिनु कवन बिधी न धीजीऐ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जगत में जीवों का) पैदा होना मरना उसी परमात्मा ने बनाया है जिसने ये जगत पैदा किया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।