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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 542 · बिहागड़ा

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अंग
542
बिहागड़ा
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  1. आवणु त जाणा तिनहि कीआ जिनि मेदनि सिरजीआ ॥
  2. अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥

आवणु त जाणा तिनहि कीआ जिनि मेदनि सिरजीआ ॥

अंग 541 से चला आ रहा अंश

आवणु त जाणा तिनहि कीआ जिनि मेदनि सिरजीआ ॥
इकना मेलि सतिगुरु महलि बुलाए इकि भरमि भूले फिरदिआ ॥
अंतु तेरा तूंहै जाणहि तूं सभ महि रहिआ समाए ॥
सचु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि वरतै धरम निआए ॥1॥
आवहु मिलहु सहेलीहो मेरे लाल जीउ हरि हरि नामु अराधे राम ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू मेरे लाल जीउ जम का मारगु साधे राम ॥
मारगु बिखड़ा साधि गुरमुखि हरि दरगह सोभा पाईऐ ॥
जिन कउ बिधातै धुरहु लिखिआ तिन॑ा रैणि दिनु लिव लाईऐ ॥
हउमै ममता मोहु छुटा जा संगि मिलिआ साधे ॥
जनु कहै नानकु मुकतु होआ हरि हरि नामु अराधे ॥2॥
कर जोड़िहु संत इकत्र होइ मेरे लाल जीउ अबिनासी पुरखु पूजेहा राम ॥
बहु बिधि पूजा खोजीआ मेरे लाल जीउ इहु मनु तनु सभु अरपेहा राम ॥
मनु तनु धनु सभु प्रभू केरा किआ को पूज चड़ावए ॥
जिसु होइ क्रिपालु दइआलु सुआमी सो प्रभ अंकि समावए ॥
भागु मसतकि होइ जिस कै तिसु गुर नालि सनेहा ॥
जनु कहै नानकु मिलि साधसंगति हरि हरि नामु पूजेहा ॥3॥
दह दिस खोजत हम फिरे मेरे लाल जीउ हरि पाइअड़ा घरि आए राम ॥
हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ मेरे लाल जीउ हरि तिसु महि रहिआ समाए राम ॥
सरबे समाणा आपि सुआमी गुरमुखि परगटु होइआ ॥
मिटिआ अधेरा दूखु नाठा अमिउ हरि रसु चोइआ ॥
जहा देखा तहा सुआमी पारब्रहमु सभ ठाए ॥
जनु कहै नानकु सतिगुरि मिलाइआ हरि पाइअड़ा घरि आए ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: (जगत में जीवों का) पैदा होना मरना उसी परमात्मा ने बनाया है जिसने ये जगत पैदा किया है। कई जीवों को गुरू मिला के प्रभू अपनी हजूरी में टिका लेता है (ठिकाना दे देता है)।और। कई जीव कुर्माग पड़ कर भटकते फिरते हैं। हे प्रभू ! अपने (गुणों का) अंत आप खुद ही जानते हैं। आप सारी सुष्टि में व्यापक हैं। हे संत जनो ! सुनो। नानक एक अटल नियम बताता है (कि) परमात्मा धर्म अनुसार न्याय के मुताबक दुनिया की कार चला रहा है। 1। हे मेरे प्यारे ! (कह) हे संत-जन सहेलियो ! आएँ। मिल के संत-संग में बैठो। (जो मनुष्य सत्संगियों में मिल के बैठता है वह) परमात्मा का नाम सदा सिमरता है। हे मेरे प्यारे ! गुरू को अभॅुल मान के गुरू की शरण पड़ो (जो इस तरह गुरू की शरण पड़ता है वह) जम के रास्ते को (आत्मक मौत लाने वाले जीवन-राह को) अच्छा बना लेता है। गुरू की शरण पड़ कर मुश्किल जीवन राह को (सुंदर व) आसान बना के परमात्मा की हजूरी में शोभा कमाई जा सकती है। (पर) जिन मनुष्यों के माथे पर अपनी हजूरी से विधाता ने (भक्ति का लेख) लिख दिया है। उन मनुष्यों की सुरति दिन-रात (प्रभू चरनों में) लगी रहती है। जब मनुष्य गुरू की संगति में मिलता है तब उसके अंदर से अहंकार ममता (अपनत्व) दूर हो जाते हैं। मोह समाप्त हो जाता है। दास नानक कहता है कि सदा परमात्मा का नाम सिमर के मनुष्य (अहंकार, ममता। मोह आदि के प्रभाव से) स्वतंत्र हो जाता है। 2। हे मेरे प्यारे ! (कह) हे संत जनों ! (साध-संगत में) एकत्र हो के परमात्मा के आगे दोनों हाथ जोड़ा करो। और। उस नाश रहित सर्व व्यापक परमात्मा की भक्ति किया करो। हे मेरे प्यारे ! मैंने और कई किस्मों की पूजा-भेटा तलाश के देखी है (पर। सबसे श्रेष्ठ पूजा ये है कि) अपना ये मन ये शरीर सब भेटा कर देना चाहिए। (फिर भी। गुमान किस बात का।) ये मन। ये शरीर। ये धन सब परमात्मा का दिया हुआ है। (सो।) कोई मनुष्य (अपनी मल्कियत की) कौन सी चीज भेटा कर सकता है। जिस मनुष्य पर प्रभू मालिक कृपाल होता है दयावान होता है वह उस परमात्मा के चरणों में लीन हो जाता है (बस ! यही भेटा और पूजा)। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जाग उठते हैं। उसका अपने गुरू के साथ प्यार बन जाता है। दास नानक कहता है, (हे संत जनों !) साध-संगत में मिल के परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। 3। हे मेरे प्यारे ! (परमात्मा को ढूँढने के लिए) हम दसों दिशाओं में तलाश करते फिरे। पर उस परमात्मा को अब हृदय घर में ही आ के ढूँढ लिया है। हे मेरे प्यारे ! (इस मनुष्य शरीर को) परमात्मा ने अपना निवास स्थान बनाया हुआ है। परमात्मा इस (शरीर घर) में टिका रहता है। मालिक प्रभू स्वयं ही सारे जीवों में व्यापक हो रहा है। पर उसके इस अस्तित्व की समझ गुरू की शरण पड़ने से ही आती है। (गुरू जिस मनुष्य के मुँह में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल नाम-रस चोआ देता है। (उसके अंदर से माया के मोह का) अंधकार मिट जाता है। उसका सारा दुख दूर हो जाता है। (गुरू की कृपा से अब) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मुझे मालिक परमात्मा हर जगह बसता दिखाई देता है। दास नानक कहता है, गुरू ने मुझे परमात्मा मिला दिया है। मैंने परमात्मा को अपने हृदय-घर में ढूँढ लिया है। 4। 1।

अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥

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रागु बिहागड़ा महला 5 ॥
अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥
सुंदर सोभा लाल गोपाल दइआल की अपर अपारा राम ॥
गोपाल दइआल गोबिंद लालन मिलहु कंत निमाणीआ ॥
नैन तरसन दरस परसन नह नीद रैणि विहाणीआ ॥
गिआन अंजन नाम बिंजन भए सगल सीगारा ॥
नानकु पइअंपै संत जंपै मेलि कंतु हमारा ॥1॥
लाख उलाहने मोहि हरि जब लगु नह मिलै राम ॥
मिलन कउ करउ उपाव किछु हमारा नह चलै राम ॥
चल चित बित अनित प्रिअ बिनु कवन बिधी न धीजीऐ ॥

हिन्दी अर्थ: रागु बिहागड़ा महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा बहुत ही प्यारा लगने वाला है। सबके मन को मोह लेने वाला है। सब शरीरों में सुशोभित है। सब के जीवन का सहारा है। उस दया के घर गोपाल प्यारे की सुंदर शोभा (पसर रही) है। बड़ी बेअंत शोभा है। हे दयालु गोबिंद ! हे गोपाल ! हे प्यारे कंत ! मुझ निमाणी को मिल। मेरी आँखें आपके दर्शनों की छूह (झलक) पाने के लिए तरसती रही हैं। मेरी जिंदगी की रात गुजरती जा रही है। (पर। मुझे आपके मिलाप से पैदा होने वाली) शांति नहीं मिल रही। जिसको गुरू के बख्शे ज्ञान का सुरमा मिल गया। जिसको (आत्मक जीवन का) भोजन हरी-नाम मिल गया। उसके सारे (आत्मिक) श्रृंगार सफल हो गए। नानक संत जनों की चरण पड़ता है। संत-जनों के आगे अरजोई करता है। कि मुझे मेरा प्रभू-पति मिलाओ। 1। जब तक परमात्मा नहीं मिलता। तब तक (मेरी भूलों के) मुझे लाखों उलाहमें मिलते हैं। मैं परमात्मा को मिलने के लिए अनेकों यतन करती हूँ। पर मेरी कोई पेश नहीं पड़ती। प्यारे प्रभू के मिलाप के बिना किसी तरह भी मन को धैर्य नहीं आता। चित्त (धन की खातिर) हर वक्त भागा फिरता है। और। धन भी सदा साथ नहीं निभता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 542 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।